सीएम पद से रिटायर होकर क्या करेंगे नीतीश कुमार?
नीतीश कुमार अभी JDU के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और इस बात की संभावना कम है कि राज्यसभा जाने के बाद वे बिहार की राजनीति से गायब हो जाएंगे

मार्च की 30 तारीख को बिहार विधान परिषद से इस्तीफे के बाद जहां लोग इस बात की चर्चा कर रहे थे कि उनके बाद बिहार का सीएम कौन बनेगा. नीतीश कुमार खुद उस वक्त पटना विश्वविद्यालय के एक नवनिर्मित प्रशासनिक भवन का उद्घाटन कर रहे थे.
अभी 26 मार्च को ही उन्होंने अपनी समृद्धि यात्रा पूरी की है और इस दौरान उन्होंने बिहार के हर जिले में जाकर विभिन्न परियोजनाओं का शिलान्यास और उद्घाटन किया है और निर्माणाधीन परियोजनाओं का जायजा लिया है.
पिछले एक-सवा साल से वे लगातार इसी तरह सक्रिय हैं. नीतीश कुमार पटना में तभी रहते हैं, जब यहां उनकी जरूरत होती है, नहीं तो वे बिहार के अलग-अलग जिलों में जाकर सरकारी कामकाज में खुद को व्यस्त रखते हैं. ऐसे में यह सवाल उठने लगा है कि जब भी नीतीश सीएम का पद छोड़ देंगे, वे क्या करेंगे. खुद को कहां व्यस्त रखेंगे.
विधान परिषद की सदस्यता छोड़ते ही यह लगभग तय हो गया है कि अब नीतीश जल्द सीएम का पद छोड़ देंगे. वैसे तो उनके पास यह संवैधानिक अधिकार है कि वे बिहार के किसी सदन का सदस्य रहे बगैर भी छह महीने तक बिहार के मुख्यमंत्री बने रह सकते हैं. इस बात की पुष्टि बिहार विधानसभा के अध्यक्ष प्रेम कुमार ने भी की है. मगर उनके करीबी लोग बताते हैं कि नीतीश ऐसा कुछ नहीं करेंगे.
नौ अप्रैल को राज्यसभा के उन निवर्तमान सदस्यों का कार्यकाल पूरा होने वाला है, जिनकी जगह पर नीतीश कुमार को राज्यसभा के लिए चुना गया है. उनके कार्यकाल की समाप्ति के बाद वे राज्यसभा जाकर शपथ लेंगे और उसके बाद मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा भी दे देंगे. माना जा रहा है कि यह सब अधिकतम 12 अप्रैल तक पूरा हो जाएगा.
अब ऐसे में पिछले एक-सवा साल से प्रशासनिक मोर्चे पर अति सक्रिय और कभी घर पर न बैठने वाले, हर सुबह काम पर निकल जाने वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार उसके बाद क्या करेंगे, यह बड़ा सवाल है. क्या वे चुपचाप अपने घर बैठ जाएंगे या फिर उनकी सक्रियता किसी और काम में दिखेगी?
वैसे तो आधिकारिक रूप से यह तय है कि वे अब राज्यसभा के सदस्य होंगे और इस पद की जिम्मेदारियां उनके पास होंगी. जब सदन चलेगा तो उन्हें वहां सदन की कार्यवाहियों में भाग लेना होगा. मगर नीतीश कुमार जैसे व्यक्ति को इतनी सीमित जिम्मेदारियों में बांध पाना आसान नहीं होगा, यह उनके करीबी जानते हैं.
हाल-फिलहाल तक कहा जाता रहा है कि उन्हें केंद्र की राजनीति में सक्रिय किया जा सकता है. मसलन केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल कराया जा सकता है, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) का संयोजक बनाया जा सकता है या अति पिछड़ों के आरक्षण को एक चरण आगे बढ़ाने वाले रोहिणी आयोग की रिपोर्ट को लागू कराने में कोई महत्वपूर्ण भूमिका दी जा सकती है. यह भी कहा जाता रहा है कि उन्हें आने वाले समय में राष्ट्रपति, उप राष्ट्रपति जैसे किसी सम्मानजनक पद की जिम्मेदारी भी दी जा सकती है.
मगर पिछले दिनों जनता दल यूनाइटेड (JDU) के कार्यकारी अध्यक्ष संजय कुमार झा के बयान से यह साफ हो गया कि नीतीश की राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय होने की संभावना न्यूनतम है. उन्होंने कहा, “राज्यसभा जाने का अर्थ यह नहीं है कि नीतीश कुमार बिहार छोड़ देंगे. जब भी राज्यसभा का सत्र होगा, वे वहां जाएंगे. बाकी समय में पटना में ही रहेंगे और सरकार को मार्गदर्शन देंगे. आने वाली सरकार नीतीश कुमार के विचार और उनके सात निश्चय के हिसाब से ही चलेगी.”
संजय कुमार झा की बातों को इस वजह से भी पुष्टि मिलती है, क्योंकि कहा जा रहा है कि उनके लिए सर्कुलर रोड का सात नंबर का बंगला तैयार किया जा रहा है और वे पद छोड़ने के बाद वहीं शिफ्ट कर जाएंगे. उन्हें पूर्व मुख्यमंत्री के तौर पर यह बंगला दिया जाएगा. 2014 में जब उन्होंने इस्तीफा देकर जीतनराम मांझी को सीएम बनवाया था तब भी वे इसी बंगले में रहे थे.
मगर सवाल यह भी है कि पटना में रहकर वे क्या करेंगे? एक मुख्यमंत्री के तौर पर उनकी व्यस्तता ज्यादातर प्रशासनिक है, मगर एक पूर्व मुख्यमंत्री के तौर पर आने वाले दिनों में उनकी क्या व्यस्तता होगी, यह बड़ा सवाल है.
उनके एक बेहद करीबी बताते हैं, “पद छोड़ने के बाद वे राजनीतिक तौर पर सक्रिय रहेंगे. वे अपने लिए दो जिम्मेदारियों को मुख्य मानते हैं. पहला अपने पुत्र निशांत को बिहार की राजनीति में स्थापित करना और दूसरा अपनी पार्टी को मजबूत करना. पटना में रहते हुए इन दोनों कार्यों को अंजाम देना उनका लक्ष्य हो सकता है. इसके अलावा वे पूरे देश में घूमकर भी पार्टी और समाजवादी विचार को मजबूत करने का काम कर सकते हैं.”
नीतीश के राजनीतिक रूप से सक्रिय रहने की बात में दम लगता है, क्योंकि हाल ही में वे पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गए हैं. इसका अर्थ यह माना जा रहा है कि वे भले सीएम का पद छोड़ देंगे, मगर पार्टी की जिम्मेदारी अभी छोड़ने नहीं वाले. वे चाहते हैं कि JDU एक ऐसी पार्टी के रूप में तैयार हो जाए जो उनके बेटे निशांत के राजनीतिक करियर को भी लगातार ताकत दे सके. इस बीच इस तरह की चर्चाएं लगातार हैं कि नीतीश कुमार के बाद JDU कमजोर हो सकती है. विपक्षी दल BJP पर JDU को हड़प लेने के आरोप भी लगाते हैं. शायद इस बात से नीतीश चिंतित होते होंगे कि उनके बाद उनकी खड़ी की गई पार्टी का बुरा हाल न हो.
इस मसले पर राजनीतिक टिप्पणीकार फैजान अहमद कहते हैं, “नीतीश कुमार की पार्टी को तोड़ने के प्रयास पहले हुए हैं, मगर अभी तक उनकी पार्टी इसी वजह से बची रही, क्योंकि नीतीश सत्ता में रहे हैं. अगर वे सत्ता में नहीं रहते तो पार्टी टूट जाती. दूसरी बात उनके आसपास जो भी नेता हैं और आज JDU के कद्दावर नेता माने जाते हैं, वे सब इसलिए हैं क्योंकि नीतीश के पास पावर है और उस पावर से वे उन्हें सत्ता में हिस्सेदारी दे सकते हैं. ऐसे में पावर से बाहर रहकर वे पार्टी को किस तरह मजबूत कर पाएंगे यह कहना मुश्किल है. जाहिर सी बात है BJP की नजर भी जरूर उनकी पार्टी पर होगी. उनकी पार्टी में भी कई पावरफुल लोग BJP के करीबी माने जाते हैं.”
हालांकि JDU के कई नेता यह भी कह रहे हैं कि आने वाले दिनों में सीएम कोई भी बने, सरकार नीतीश के हिसाब से चलेगी. हाल ही में मंत्री विजय कुमार चौधरी ने भी कहा, “आगे जो भी सरकार बनेगी, वह इनके हिसाब से ही चलेगी क्योंकि जनादेश इनके नाम पर ही मिला है.” दिलचस्प है कि BJP नेता और उप मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने इस बात का समर्थन करते हुए कहा, “आगे भी इनके ही मार्गदर्शन में बिहार चलता रहेगा.”
कहा जा रहा है कि चूंकि इस चुनाव में जनादेश नीतीश के नाम पर ही मिला है, इसलिए सरकार उनके निर्देश और मार्गदर्शन से चलेगी. मगर क्या ऐसा होगा? अगर BJP बिहार में अपना सीएम बनाती है, जो उनका बिहार में पहला सीएम होगा, तो क्या BJP ऐसा चाहेगी कि वह नीतीश के हिसाब से चले?
इस सवाल पर टाटा सामाजिक संस्थान के पूर्व प्राध्यापक पुष्पेंद्र कहते हैं, “मुझे लगता है, यह सब शिष्टाचारवश कहा जा रहा है ताकि ऐसा न लगे कि जिस नीतीश के नाम पर चुनाव जीता गया, उसे महज तीन महीने में किनारा कर दिया गया है. इसलिए उनके प्रति आगे भी इस तरह की विनम्रता दिखाई जाएगी. किसी बड़े फैसले के वक्त उन्हें बुलाया जा सकता है या उनके आवास पर जाकर मार्गदर्शन लिया जा सकता है. यह कहा जाता रहेगा कि नीतीश के हिसाब से ही सरकार चल रही है, मगर यह सब प्रतीकात्मक रहेगा. उनका सरकार में कोई दखल होगा, ऐसा मुमकिन नहीं लगता.”
वे आगे कहते हैं, “एक फैक्टर यह भी है कि भले ही BJP नीतीश को हटाकर बिहार की सत्ता हासिल कर रही है, मगर वह बिहार में नीतीश के समर्थक मतदाताओं का भरोसा अब तक हासिल नहीं कर पाई है. इनमें अति पिछड़े, महिलाएं और उनकी अपनी जाति के लोग शामिल हैं. इसलिए अभी उनका सम्मान जारी रहेगा. एक बार जब उनके सोशल बेस का ट्रांसफर हो गया, तो फिर उनका यह सम्मान भी धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगा.”