नीतीश की विरासत और निशांत की परीक्षा : JDU के लिए क्या दांव पर लगा?

निशांत कुमार को भले ही उनके पिता के कारण बिहार का स्वास्थ्य मंत्री नियुक्त किया गया है लेकिन उनका मूल्यांकन पूरी तरह से उनके किए गए कामों के आधार पर किया जाएगा

निशांत कुमार, अपने पिता नीतीश कुमार के साथ (फाइल फोटो)
निशांत कुमार, अपने पिता नीतीश कुमार के साथ (फाइल फोटो)

नीतीश कुमार के बेटे निशांत को बिहार कैबिनेट में शामिल किए जाने को JDU में उत्तराधिकार प्रयोग की औपचारिक शुरुआत माना जा रहा है. यह नीतीश कुमार की समृद्ध राजनीतिक पूंजी को अगली पीढ़ी को हस्तांतरित करने की कोशिश है.

यह फैसला इसलिए चौंकाने वाला है क्योंकि निशांत कुमार राजनीति में बिल्कुल नए हैं और फिर भी उन्हें स्वास्थ्य विभाग जैसे भारी-भरकम मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी गई है. स्वास्थ्य विभाग में प्रतीकात्मक राजनीति के लिए कोई जगह नहीं होती बल्कि इसमें अच्छी प्रशासनिक विश्वसनीयता की आवश्यकता होती है.

निशांत ने राजनीति में अभी-अभी एंट्री की है. मार्च में वे JDU में शामिल हुए हैं. उनके पास न वोटों का आधार है, न संगठन का नियंत्रण, न ही प्रशासन चलाने का कोई अनुभव. फिर भी उन्हें सरकार के सबसे महत्वपूर्ण हिस्से में जगह मिल गई है. यह मेहनत से कमाया हुआ पद नहीं बल्कि राजनीतिक जरूरत के कारण दिया गया पद है. JDU चाहती है कि निशांत नीतीश कुमार के पुराने समर्थकों को जोड़ने का काम करें. उम्मीद है कि समय के साथ नीतीश का वोट बैंक धीरे-धीरे निशांत के साथ आ जाएगा.

यह उम्मीद बिल्कुल बेबुनियाद नहीं है. नीतीश कुमार ने अपने दशकों की राजनीति में एक खास वोट बैंक बनाया है. उनको चाहने वाले लोग स्थिर शासन, समाज में संतुलन और साफ-सुथरे प्रशासन को पसंद करते हैं. बिहार की राजनीति में लोग आमतौर पर किसी व्यक्ति के पीछे जाते हैं, न कि पार्टी के पीछे. JDU सोचती है कि चूंकि पार्टी में नीतीश के बराबर कोई और नेता नहीं है इसलिए उनका समर्थक वर्ग आसानी से निशांत के साथ जुड़ सकता है.

हालांकि राजनीति में बाप का बेटा होना सब कुछ नहीं होता. नीतीश का बेटा होने से शुरुआत में नाम, पहुंच और कुछ स्वीकृति मिल जाती है लेकिन असली नेतृत्व क्षमता और राजनीतिक समझबूझ महज इतने भर से नहीं आती है. नीतीश ने दशकों में गठबंधन, जाति और बदलती राजनीति के बीच अपनी ताकत बनाई थी. उनकी सत्ता खुद की कमाई हुई थी.

निशांत अपने पिता से ठीक उलटे छोर से राजनीति की शुरुआत कर रहे हैं. उन्हें पहचान तो मिल गई, लेकिन भरोसा अब भी कमाना है. इसीलिए स्वास्थ्य विभाग उनकी कहानी का केंद्र है. यह कोई आसान या दिखावटी मंत्रालय नहीं है. इसमें अस्पताल बनाना, दवाएं उपलब्ध कराना, डॉक्टर-स्टाफ की व्यवस्था, बीमारी के समय तुरंत कार्रवाई और करोड़ों लोगों की रोजमर्रा की स्वास्थ्य व्यवस्था संभालनी पड़ती है. यहां गलतियां आसानी से दिख जाती हैं और लोग माफ नहीं करते. सफलता धीरे-धीरे और बहुत मेहनत से मिलती है.

JDU ने निशांत को यह विभाग देकर उनकी राजनीतिक एंट्री को शानदार बना दिया है. अब वे राजनीतिक एंट्री के लिए सिर्फ इंतजार कर रहे उत्तराधिकारी नहीं हैं, बल्कि प्रशासक बन गए हैं. पार्टी ने उन्हें संगठन की आसान राजनीति में नहीं बल्कि असली शासन की कठिन परीक्षा में डाल दिया है.

यह फैसला चतुराई भरा है लेकिन इसमें जोखिम भी है. चतुराई इसलिए कि अगर निशांत स्वास्थ्य विभाग में अच्छा काम कर दिखाए तो वे नीतिश कुमार के बेटे के अलावा अपनी अलग पहचान बना लेंगे. जोखिम इसलिए कि स्वास्थ्य विभाग में असफलता महंगी पड़ सकती है. लोग स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर जल्दी नाराज हो जाते हैं. हर समस्या सीधे मंत्री के सिर पर आती है. नए व्यक्ति के लिए गलती करने का स्कोप स्वास्थ्य विभाग में बेहद कम है.

यह फैसला सिर्फ निशांत के बारे में नहीं, बल्कि JDU पार्टी के बारे में भी बहुत कुछ बताता है. पार्टी सालों से कहती रही है कि वह वंशवाद की राजनीति नहीं करती और सिर्फ अच्छे शासन पर जोर देती है. अब वह रास्ता बदल रही है. निशांत को इतनी जल्दी मंत्री बनाने से लगता है कि JDU को सबसे बड़ी चिंता नीतीश के बाद अपनी सर्वाइवल की है.

लंबे समय तक सत्ता में रहने के बावजूद JDU पार्टी में नीतीश जितना प्रभावशाली कोई दूसरा नेता नहीं तैयार हो सका. पूरी पार्टी नीतीश पर ही टिकी हुई है. इसलिए निशांत को लाना सिर्फ बेटे को आगे बढ़ाने की बात नहीं बल्कि पार्टी के भविष्य को बचाने की कोशिश है. इसमें एक तरफ भरोसा है कि निशांत के जरिए नीतीश की विरासत चलेगी, दूसरी तरफ डर भी है कि ऐसा न किया तो पार्टी बिखर जाएगी.

सम्राट सरकार के कैबिनेट में कई पूर्व मुख्यमंत्रियों के बेटे हैं जिससे लगता है कि वंशवाद को NDA गठबंधन में स्वीकार्य बना दिया गया है. जबकि पहले यह गठबंधन वंशवाद की आलोचना करता था. फिर भी निशांत का केस अलग है. वे सामान्य राजनेताओं के उत्तराधिकारी नहीं बल्कि दो दशक से बिहार की राजनीति में स्थापित हो चुके नेता के मुख्य उत्तराधिकारी के रूप में देखे जा रहे हैं.

ऐसे में अब मुख्य सवाल यही है कि क्या निशांत अपने पिता की विरासत में मिली लोकप्रियता को लंबे समय टिकने वाली अपनी राजनीतिक ताकत में बदल पाएंगे? उनकी शुरुआती कोशिशों और सार्वजनिक उपस्थिति से लगता है कि नीतीश का बेटा होने को लेकर सहानुभूति अपेक्षाकृत जल्दी हासिल की जा सकती है लेकिन राजनीतिक विरासत इतनी जल्दी हासिल करना कहीं ज्यादा मुश्किल है. यह फैसलों, प्रदर्शन और संघर्षों से निपटने की क्षमता के ज़रिए बनती है.

निशांत के मंत्री बनने से यह बदलाव और तेज हो गया है. अब उनके रोल को लेकर कोई दुविधा नहीं रही है. उन्हें सीधे सरकार की जिम्मेदारी में लगा दिया गया है. यह वह समय है जब वे सिर्फ संभावित नेता से आगे बढ़कर सक्रिय नेता बन चुके हैं. JDU के लिए भी यह बहुत बड़ा दांव है.

पार्टी उम्मीद कर रही है कि निशांत के जरिए उसकी निरंतरता बनी रहेगी और भविष्य सुरक्षित रहेगा. अगर निशांत अच्छा काम कर दिखाए तो पार्टी को नया मजबूत चेहरा मिल जाएगा. अगर वे असफल रहे तो नेतृत्व को लेकर अनिश्चितता और बढ़ जाएगी. 7 मई का यह फैसला शुरुआत भी है और कड़ी परीक्षा भी. निशांत को पद इसलिए मिला है कि वे नीतीश के बेटे हैं लेकिन अब उन्हें सिर्फ उनके काम के आधार पर आंका जाएगा.

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