नालंदा मंदिर हादसा : न बैरिकेडिंग, न पुलिस, भगवान भरोसे थी हजारों की भीड़!
बिहार में भगदड़ से बचने और निपटने के लिए एक चाक-चौबंद प्रक्रिया (SOP) बनी हुई है लेकिन नालंदा मंदिर में हुआ हादसा बताता है, यहां इसकी पूरी तरह अनदेखी हुई

31 मार्च की सुबह बिहारशरीफ से महज कुछ किमी की दूरी पर एक मंदिर में ग्रामीणों, खासकर महिलाओं की भारी भीड़ जुटी थी. मांघर गांव के इस शीतला माता मंदिर में हर साल की तरह इस बार भी चैत्र महीने का आखिरी मंगलवार होने के कारण काफी श्रद्धालु आए थे. मगर इस भीड़ को नियंत्रित करने और मंदिर के छोटे से गर्भगृह में लोगों की आवाजाही सुगम बनाने के लिए वहां न पुलिस थी, न ही कोई प्रशासनिक व्यवस्था.
इसके उलट इस जगह से बमुश्किल 25-30 किमी दूर नालंदा अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय के परिसर में 2500 से अधिक पुलिसकर्मी तैनात थे. वहां आयोजित दीक्षांत समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू शामिल होने पहुंची थीं. नालंदा जिला प्रशासन ने स्वाभाविक रूप से राष्ट्रपति की सुरक्षा को प्राथमिकता दी, लेकिन मांघर गांव के मंदिर में जुटी भारी भीड़ की अनदेखी करना उन पर भारी पड़ गया.
सुबह नौ बजे वहां भगदड़ मच गई और सरकारी आंकड़ों के अनुसार इसमें आठ लोगों की मौत हो गई, जबकि तीन गंभीर रूप से घायल हैं. हालांकि स्थानीय पत्रकारों के मुताबिक एक अन्य श्रद्धालु की भी जान गई है.
हादसे के प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि मंदिर में सुबह आठ से नौ बजे के बीच 20 से 25 हजार लोग जमा हो गए थे. पुलिस की अनुपस्थिति के कारण दर्शन कराने का जिम्मा मंदिर के पुजारी ने संभाल रखा था. वहां न तो कोई कतार थी और न ही बैरिकेडिंग की गई थी. लोगों ने आरोप लगाया कि पुजारी भीड़ का फायदा उठाकर कुछ श्रद्धालुओं से पैसे लेकर उन्हें पीछे के रास्ते से दर्शन करा रहे थे. इसी अव्यवस्था के बीच भगदड़ मची.
इस हादसे पर नालंदा के एसपी भारत सोनी ने कहा, “हमें इतनी भीड़ जुटने की पूर्व सूचना नहीं थी. वहां केवल चौकीदारों की तैनाती थी. आज सुबह ही हमें भीड़ अधिक होने की जानकारी मिली.” वहीं घटना की जांच के लिए पटना से पहुंचे एडीजी कुंदन कृष्णन ने इसका दोष मंदिर प्रशासन और स्थानीय दुकानदारों पर मढ़ दिया. उन्होंने कहा, “श्रद्धालु व्रत के कारण भूखे थे और धूप तेज थी. मंदिर प्रशासन का ध्यान श्रद्धालुओं की सुविधा से ज्यादा अपनी आय पर था. उन्हें पुलिस से मदद मांगनी चाहिए थी. परिसर में दुकानें होने के कारण उसे खाली कराने में भी दिक्कत हुई. वैसे धक्का-मुक्की कम, डिहाइड्रेशन से ज्यादा मौतें हुई हैं. इस घटना से हम सीख लेंगे.”
मगर क्या बिहार पुलिस और प्रशासन सचमुच ऐसी घटनाओं से सीख लेता है? यह एक बड़ा सवाल है. इस जगह से महज 60 किमी दूर बराबर पहाड़ियों पर स्थित वाणावर मंदिर में 2024 में ठीक इसी तरह की भगदड़ हुई थी, जिसमें सात श्रद्धालुओं की मौत हुई थी. तब भी यही कहा गया था कि प्रशासन इससे सबक लेगा ताकि भविष्य में ऐसे हादसे न हों.
हालांकि तब ऐसे हादसों को रोकने के लिए कार्ययोजना बनाने की कोशिश जरूर शुरू हुई थी. बिहार राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने भीड़ प्रबंधन (Crowd Management) के लिए मार्गदर्शिका तैयार की थी. उस गाइडलाइन में विशेष रूप से पटना के अदालतगंज (2012) और गांधी मैदान (2014) की भगदड़ का उल्लेख किया गया था, जिनमें क्रमशः 18 और 33 लोगों की जान गई थी. यदि इस मार्गदर्शिका का पालन किया जाता, तो इस बड़े हादसे को टाला जा सकता था.
इस मार्गदर्शिका में स्पष्ट लिखा है कि पुलिस और अन्य सरकारी एजेंसियों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि आयोजन सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन कर रहे हैं या नहीं. सुरक्षा मानकों में कोई कमी तो नहीं है. इसका अर्थ साफ है कि प्रशासन यह कहकर पल्ला नहीं झाड़ सकता कि आयोजकों ने उन्हें सूचित नहीं किया था.
घटना के बाद मौके पर पहुंची भाकपा-माले की टीम के नेताओं ने कहा, “मंघड़ा मंदिर में चैत्र के अंतिम मंगलवार को हर साल भारी भीड़ जुटती है. यहां नालंदा के अलावा नवादा, पटना और शेखपुरा जिलों से भी श्रद्धालु आते हैं. यह कोई नई बात नहीं है. जिला प्रशासन ने जरूरी तैयारियां नहीं की थीं. वहां न सुरक्षा बल थे, न मेडिकल टीम और न ही एंबुलेंस. सुरक्षा को पूरी तरह भगवान भरोसे छोड़ दिया गया था.”
पूर्व आईएएस और बिहार राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के पूर्व अध्यक्ष ब्यासजी कहते हैं, “प्रशासन यह कहकर जिम्मेदारी से नहीं बच सकता कि मंदिर प्रबंधन ने उन्हें सूचना नहीं दी थी. यह देखना प्रशासन का काम है कि कहां भीड़ जुट रही है. अगर नदियों और पोखरों के किनारे छठ पर भीड़ उमड़ती है, तो नदी पुलिस को सूचित करने नहीं जाती. जब वहां हर साल भीड़ जुटती है, तो स्थानीय प्रशासन का इंतजाम न करना उसकी बड़ी चूक है. जहां तक राष्ट्रपति महोदया के कार्यक्रम का सवाल है, वहां इंतजाम जरूरी हैं. लेकिन जिस प्रखंड और थाने में यह मंदिर आता है, वहां सुरक्षा व्यवस्था उपलब्ध कराना उनकी जिम्मेदारी है. कहीं भी भीड़ जुट रही है, तो वे हमारे लोग हैं और उनकी सुरक्षा हमारी जवाबदेही है.”
हादसे के बाद मुख्यमंत्री ने मुख्य सचिव को जांच के आदेश दिए हैं. स्थानीय दीपनगर थाना प्रभारी राजमणि को सस्पेंड कर दिया गया है. बिहार सरकार ने मृतकों के परिजनों को छह-छह लाख और केंद्र सरकार ने दो-दो लाख रुपए देने की घोषणा की है. मगर मूल प्रश्न वही है कि क्या बिहार प्रशासन वाकई इस बार सीख लेने को तैयार है? क्या अगली बार हमें ऐसे हादसे फिर नहीं देखने पड़ेंगे?
बिहार में साढ़े चार हजार से अधिक मंदिर और मठ बिहार राज्य मंदिर न्यास बोर्ड में पंजीकृत हैं. इनमें से कई मंदिरों में विशेष अवसरों पर भारी भीड़ उमड़ती है. न्यास बोर्ड के अध्यक्ष रणवीर नंदन कहते हैं, “विभिन्न धार्मिक अवसरों पर मंदिर प्रशासन और जिला प्रशासन मिलकर भीड़ का प्रबंधन करते हैं. ज्यादातर मौकों पर व्यवस्था शांतिपूर्ण रहती है, लेकिन कभी-कभी ऐसे हादसे हो जाते हैं. नालंदा के मंदिर में प्रशासन से क्या चूक हुई, हम इसकी जांच करा रहे हैं.”