तमाशबीन बना गांव, देर से जागी पुलिस : कई सवाल छोड़ गया नालंदा छेड़खानी मामला
नालंदा में महिला के साथ सरेआम यौन दुर्व्यवहार और उसके वायरल वीडियो का मामला हमारे समाज और सिस्टम की कई कड़वी सच्चाइयों को उजागर करता है

नालंदा के सार्वजनिक छेड़खानी वाले मामले में देर से ही सही, आखिरकार पुलिस ने कार्रवाई शुरू कर दी है. आठ आरोपी गिरफ्तार किए गए हैं. मुख्य आरोपी ने खुद आत्मसमर्पण कर दिया है. पीड़िता के घर के बाहर सुरक्षा के लिए पुलिस की तैनाती कर दी गई है. बिहार पुलिस ने वीडियो वायरल करने वालों के खिलाफ कार्रवाई भी शुरू कर दी है. मगर पूरे देश में अपने कृत्य की वजह से बदनामी बटोरने वाला यह मामला अपने पीछे कई सवाल छोड़ गया है.
नालंदा के नूरसराय के एक गांव में शाम छह से सात बजे के बीच हुई यह घटना इसलिए भी क्रूर और वीभत्स मानी गई, क्योंकि गांव के बीच से गुजरने वाली सड़क पर मनचले युवक उस महिला के साथ लगातार यौन दुर्व्यवहार कर रहे थे और उसका वीडियो बना रहे थे. मगर गांव में किसी ने उन्हें रोका नहीं. 26 मार्च को घटी इस घटना की शिकायत 27 मार्च को ही कर दी गई थी.
मगर पुलिस तब सक्रिय हुई जब 30 मार्च को इसका वीडियो वायरल हुआ. जानकारों का मानना है कि पुलिस की कार्रवाई में ढिलाई की वजह से पूरा मामला खराब हुआ. ऐसे में यह सवाल उठता है कि आखिर पुलिस ने इस मामले में कार्रवाई करने में इतनी देर क्यों लगाई? वह वीडियो वायरल होने पर ही क्यों सक्रिय हुई?
पुलिस ने कार्रवाई में देर क्यों की? इसका क्या असर हुआ?
टाटा सामाजिक संस्थान के पूर्व प्राध्यापक पुष्पेंद्र कहते हैं, “पुलिस ने अगर तत्काल कार्रवाई की होती तो वह आरोपियों को पकड़कर वीडियो भी जब्त कर सकती थी और उसे डिलीट भी करवा सकती थी. पुलिस की ढिलाई की वजह से ही वीडियो वायरल हुआ और पूरे देश में लोगों ने उस वीडियो में महिला को परेशान हाल में देखा. यह वीडियो पीड़ित महिला और उसके परिवार के लिए हमेशा के लिए ट्रॉमा बन गया होगा. इस वीडियो ने बिहार की कानून व्यवस्था और पुलिस के कामकाज को भी कटघरे में खड़ा किया है. आगे पुलिस को समझना होगा कि ऐसे मामलों में वह त्वरित कार्रवाई करे.”
यह भी उतना ही सच है कि स्थानीय पुलिस की लापरवाही का खामियाजा अब पुलिस हेडक्वार्टर को भुगतना पड़ रहा है. जो मामला वहीं का वहीं समाप्त हो सकता था, उसके लिए आईजी और डीजीपी तक को सक्रिय होना पड़ रहा है.
यह पुलिस की विफलता तो है ही, एक समाज के रूप में उस गांव की भी विफलता है, जिसने अपने सामने ऐसी वारदात को होने दिया. वीडियो वायरल होने के बाद कई मीडियाकर्मी गांव पहुंचे. वहां पहुंचकर पत्रकार यह जानकर हैरत में पड़ गए कि स्थानीय लोगों की सहानुभूति उस पीड़ित महिला के प्रति न होकर गिरफ्तार लोगों के प्रति थी. कई लोग यह शिकायत कर रहे थे कि कुछ लोगों को बेवजह पकड़ लिया गया है.
कई लोगों ने दावा किया कि दरअसल वह महिला एक गैर पुरुष के साथ एक कमरे में आपत्तिजनक अवस्था में मिली थी. तब गांव के युवकों ने उसे पकड़कर घुमाना शुरू किया था और इसी दरमियान ऐसी घटना घटी.
इंडिया टुडे समूह के चैनल ‘बिहार तक’ के संवाददाता अनिकेत ने जब पीड़ित महिला से बात की तो उसने बताया कि वह अपनी बेटी के खाते में पैसे ट्रांसफर कराने उस युवक के पास गई थी. उन्हें साथ देखकर स्थानीय युवकों ने उन दोनों को कमरे में बंद कर दिया. बाद में जब वे दोनों खिड़की के रास्ते बाहर निकले तो युवकों ने उन्हें पकड़ लिया. इसी दौरान उनके साथ यौन दुर्व्यवहार किया गया और मंदिर के पास ले जाकर शादी कराने की कोशिश करने लगे, जबकि वह पहले से शादीशुदा है. बाद में उस महिला ने सवाल भी उठाया कि अगर उसने गलती की है तो इसकी सजा उसका पति देगा, समाज को उसे सजा देने का क्या हक है?
समाज नैतिकता के नाम पर सजा देने आगे क्यों आ जाता है?
उस महिला ने यह भी बताया कि पूरा गांव उसके खिलाफ है. वह अकेले अपने बच्चों और बीमार सास के साथ रहती है. उसका पति रोजगार के लिए बिहार से बाहर रहता है.
हालांकि वह महिला किसी पुरुष के साथ अपने किसी भी तरह के विवाहेतर संबंध से इनकार कर रही है, मगर मुमकिन है कि गांव के लोगों ने इसी बात को आधार बनाकर उसके साथ सार्वजनिक दुर्व्यवहार का विरोध नहीं किया होगा. मगर क्या समाज का यह व्यवहार उचित है?
वर्ल्ड साइकाएट्रिक एसोसिएशन के बोर्ड मेंबर डॉ. विनय कुमार, जो लेखक भी हैं, इस बारे में पूछे जाने पर कहते हैं, “एक बार हम अगर मान लें कि महिला किसी अन्य पुरुष के साथ रिश्ते में थी, तो भी समाज का यह व्यवहार परेशान करता है. ऐसा नहीं है कि पहले गांवों में ऐसे मामले नहीं होते थे. मगर पहले हमने ऐसा नहीं सुना कि किसी महिला के साथ कथित तौर पर चरित्रहीन होने के आरोप में इस तरह की बदतमीजी की गई हो. पहले लोग ऐसे मामलों में पुरुषों को दंडित करने का प्रयास करते थे. कुछ मामलों में तो समाज आंखें मूंद भी लेता था. अभी जो कुछ हो रहा है, वह हमारे बदले समाज की निशानी है, जो मोबाइल और सोशल मीडिया के संपर्क में आने के बाद अधिक हिंसक और अधिक बेशर्म हुआ है.”
वहीं पुष्पेंद्र कहते हैं, “अगर समाज को ऐसा लगा भी तो उसे इस मामले को परिपक्व तरीके से डील करना चाहिए था. यह मामला तो मूल रूप से पति-पत्नी और इसमें शामिल तीसरे व्यक्ति का था. उन्हें और गांव के बड़े-बुजुर्गों को मिल-बैठकर इसका समाधान करना चाहिए था. अगर इसके बाद भी मामला न सुलझे तो फैमिली कोर्ट की शरण ली जा सकती थी. मगर हमारा समाज आज भी अपने देश के कानून पर बहुत भरोसा नहीं करता. उसमें खुद फैसला करने की प्रवृत्ति रहती है. समाज ही नहीं, हमारी राजनीति भी कानून को हाथ में लेकर फैसले करने की प्रवृत्ति को प्रोत्साहित करती है.”
मगर उससे बड़ा सवाल उन मनचले युवकों का है, जो कथित तौर पर न्याय करने सामने आए और खुद महिला के साथ यौन दुर्व्यवहार करने लगे.
सार्वजनिक छेड़खानी करनेवाले युवकों का क्या इलाज है?
यह पूछे जाने पर डॉ. विनय कहते हैं, “दरअसल हमारे समाज के कुछ पुरुषों में एक खास तरह की प्रवृत्ति है. वे जब किसी भी महिला-पुरुष के विवाहेतर संबंध को देखते हैं तो उनके मन में पहला ख्याल यह आता है कि इस मामले में शामिल स्त्री यौन संबंध के लिए आसानी से उपलब्ध है. वे सोचते हैं कि अगर यह स्त्री किसी एक व्यक्ति के साथ संबंध बना रही है, तो उनके साथ क्यों नहीं बना सकती. इसी भावना से प्रेरित होकर वे इस तरह के कदम उठाते हैं. इसी वजह से हमने कई बार रेप पीड़िताओं को फिर से रेप का शिकार बनने की घटनाएं सुनी हैं. यहां तक कि ऐसी पीड़ित महिलाओं के साथ पुलिस थाने में भी उत्पीड़न की घटनाएं होती रही हैं.”
वहीं बिहार में स्त्री अधिकारों के लिए काम करने वाली शाहीना परवीन कहती हैं, “दरअसल हाल के वर्षों में देश की तमाम सामाजिक संस्थाओं और सरकार ने महिलाओं के साथ तो खूब काम किया है, लेकिन पुरुषों के साथ नहीं के बराबर काम हुआ है. ऐसे में हमारे पुरुषों की मनोवृत्ति मध्यकालीन ही रह गई है. इस मामले में जो युवक कम्युनिटी पुलिसिंग करते नजर आ रहे हैं, वही उस स्त्री का उत्पीड़न भी कर रहे हैं. यही युवक वैलेंटाइन डे के मौके पर समाज में नैतिकता स्थापित करने का अभियान चलाते हैं और स्कूल, कॉलेज या काम पर जाती महिलाओं के साथ छेड़खानी करने वाले भी यही हैं. गांव की जो पंचायत अपनी यौन आजादी का दावा करने वाली औरतों को अक्सर दंडित करती है, वह कभी छेड़खानी करने वाले युवकों को दंडित करती हो, ऐसा हमने नहीं सुना. इसलिए यह जरूरी है कि हम अपने समाज के पुरुषों की मनोवृत्ति बदलने पर गंभीरता से काम करें.”
शाहीना बताती हैं कि उनकी संस्था ‘हंगर प्रोजेक्ट’ ने हाल के दिनों में इस दिशा में काम शुरू किया है. उनके साथ जुड़ी किशोरियां अब अपने भाइयों को शपथ दिलाती हैं कि वे किसी भी स्त्री के साथ छेड़खानी नहीं करेंगे, उनके साथ बुरा व्यवहार नहीं करेंगे और कभी स्त्री के नाम की गाली नहीं देंगे.
हालांकि इस मामले में पीड़ित महिला ने साफ इनकार किया है कि उसके किसी पुरुष के साथ संबंध थे. मगर इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि हाल के वर्षों में बिहार के ग्रामीण इलाकों में ऐसे संबंधों की संख्या काफी बढ़ी है. ऐसे में यह सवाल भी उठता है कि इन मामलों में समाज की क्या भूमिका हो, बजाय नैतिकता के नाम पर महिलाओं का उत्पीड़न करने के.
क्या भारतीय समाज में स्त्रियों ने सेक्सुएलिटी क्लेम करना शुरू कर दिया है?
शाहीना कहती हैं, “निश्चित तौर पर बिहार के गांवों में ऐसे संबंधों की बाढ़ आई हुई है. रोज का अखबार देखने से ही यह समझ आता है. मगर इसकी भी वजहें हैं. शादी और बच्चे पैदा करना महिलाओं के जीवन के सबसे महत्वपूर्ण सवालों में से रहे हैं, लेकिन आज तक कभी परिवार ने उन्हें इन फैसलों में शामिल नहीं किया और न ही उनकी मर्जी पूछी. बिना मर्जी के थोपे गए विवाह में रहते हुए पहली बार अब महिलाएं समझने लगी हैं कि विवाह के बंधन में रहना उनकी बाध्यता नहीं है. निश्चित तौर पर इसमें सोशल मीडिया की भी भूमिका है. अब महिलाएं सेक्सुअलिटी को समझ भी रही हैं और उसे क्लेम भी कर रही हैं. भले ही कई मामलों में उन्हें सही रास्ता नहीं मिल पा रहा, मगर वे आगे बढ़ रही हैं.”
पहले ऐसे रिश्ते पुरुषों की वजह से बनते थे, अब महिलाएं अपनी सहमति से ऐसे रिश्तों में आ रही हैं. समाज इस बदलाव को देखकर भौचक है और वह क्रूरता से इसका दमन करने की कोशिश करता है.
इन बातों का हवाला देते हुए शाहीना कहती हैं, “इसलिए आप देखेंगे कि ऑनर किलिंग की घटनाएं भी लगातार बढ़ रही हैं. अब आप इसी मामले में देख लें, समाज उस महिला के खिलाफ तो है, मगर छेड़खानी करने वाले पुरुषों को लेकर उसमें उतनी नाराजगी नहीं है. ऐसे में समाज को अब स्त्रियों को लेकर अपना नजरिया बदलना पड़ेगा. सबसे जरूरी है यह मानना कि स्त्री भी एक स्वतंत्र जीव है. उसके जीवन के हर फैसले- चाहे पढ़ाई हो, नौकरी हो या शादी- उससे पूछकर लिए जाएं. पंचायतों को भी सोचना होगा कि किसी जोड़े को साथ देखने का मतलब यह नहीं कि जबरन उसकी शादी करवा दें. हर रिश्ता शादी के लिए नहीं बनता.”