मुसहर लड़कियों के क्लच में पिंक बसें!

बिहार की आधा दर्जन महादलित लड़कियां अब राज्य की पिंक बसों को चलाने के लिए तैयार हैं. वे 26 जनवरी की परेड में अपना हुनर दिखाएंगी

ये छह लड़कियां बिहार की पहली बस ड्राइवर बनेंगी (फोटो : पुष्यमित्र)
ये छह लड़कियां बिहार की पहली बस ड्राइवर बनेंगी (फोटो : पुष्यमित्र)

बिहार राज्य परिवहन निगम के परिसर में अनीता पिंक बस चलाती नजर आती हैं. वे और उनकी पांच और सहेलियां इन दिनों रोज यहां आकर बस चलाने का अभ्यास कर रही हैं. उन्हें 26 जनवरी को गांधी मैदान के गणतंत्र दिवस समारोह में पिंक बस चलाकर प्रदर्शन करना है और जब एक बार उनका अभ्यास पूरा हो जाएगा, फिर वे पटना की सड़कों पर पिंक बस चलाया करेंगी.

आरती, रागिनी, अनीता, सावित्री, गायत्री और बेबी, ये उन छह लड़कियों के नाम हैं, जिन्हें बिहार में बसें चलानी वाली पहली महिलाएं होने का एक साथ गौरव हासिल होने वाला है. दिलचस्प है कि ये सभी छह युवतियां बिहार के सबसे निर्धन और पिछड़ी मानी जाने वाली मुसहर जाति की हैं. यह जाति महादलित समुदाय में आती है.

पिछले साल मई में बिहार में जब पिंक बस सेवा की शुरुआत की गई थी, तब सरकार ने तय किया था कि इन बसों में सारी स्टाफ महिलाएं ही होंगी. मगर तब परिवहन विभाग को कंडक्टर के रूप में काम करने वाली महिलाएं तो मिल गईं, मगर बस चलाने वाली महिलाएं नहीं मिलीं. मजबूरन सरकार को यह योजना पुरुष ड्राइवरों के साथ ही शुरू करनी पड़ी. 

मगर इसके बाद विभाग ने औरंगाबाद के अपने ड्राइवर प्रशिक्षण संस्थान (IDTR) से संपर्क किया. संस्थान ने 2023 में कुछ लड़कियों को लाइट मोटर व्हीकल चलाने का प्रशिक्षण दिया था. फिर इस संस्थान ने उन लड़कियों की तलाश की और पहले बैच में ये छह लड़कियां निकलकर सामने आईं. इन्हें पहले IDTR में एक महीने का प्रशिक्षण दिया गया और अब ये पटना स्थित परिवहन निगम के परिसर में प्रशिक्षित ड्राइवरों के मार्गदर्शन में अभ्यास कर रही हैं.

अब ये लड़कियां परिवहन निगम परिसर में प्रशिक्षित ड्राइवरों के साथ अभ्यास कर रही हैं (फोटो : पुष्यमित्र)

हालांकि इन लड़कियों का बस ड्राइवर बनने का सफर इतना आसान नहीं था. क्योंकि एक तो ये लड़कियां अत्यंत निर्धन परिवारों से आती हैं. इनमें से ज्यादातर के माता-पिता मजदूरी करते हैं. दूसरा, इनके आसपास के समाज में जो लैंगिक पूर्वाग्रह है, वह भी इनकी राह में बाधक बनता था. 

पटना जिले के पुनपुन की रहने वाली अनीता कहती हैं, “लोग गजब-गजब ताने सुनाते थे. मेरे ससुराल वालों से कहते कि बहू को इधर-उधर भेज देते हो, पता नहीं क्या करेगी. अगल-बगल के जेंट्स (पुरुष) आकर कहते, हम तो बस चला नहीं पाते, ये लड़की होकर कैसे बस चला लेगी. वो भी 50-50 पैसेंजर बैठाकर.”

कुछ ऐसा ही अनुभव उनकी साथी रागिनी का भी रहा. वे बताती हैं, “मेरी तो शादी नहीं हुई है. लोग घरवालों को आकर कहते थे, बताओ शादी की उमर हो गई है और इसको ड्राइवरी सीखने भेज दिए हैं. देखना, वहीं किसी के साथ भाग न जाए.” सरस्वती के ससुराल में भी सब हंसते थे, गायत्री का भाई उसका मजाक उड़ाता था. बेबी की अलग समस्या है और वो इसे साझा करते हुए कहती हैं, “ मेरी हाइट जरा कम है, तो लोग कहते हैं, कैसे बस चलाओगी, एक्सीलेटर तक पांव पहुंच जाएगा तुम्हारा?”

मगर इन लड़कियों ने किसी ताने, किसी कमेंट की परवाह नहीं की और अवसर का फायदा उठाकर बस चलाना सीख लिया. रागिनी कहती है, “देखिए, अब जब हम लोग सीख लिए और हम लोगों को नौकरी लगने वाली है तो वही लोग जो ताना देते थे, अब आकर पूछते हैं, कैसे ट्रेनिंग होगा? हमारी बेटी या बहू का भी करवा दो.”

इन युवतियों को आगे बढ़ाने में मुसहर समुदाय के लिए काम करने वाली संस्था नारी गुंजन की बड़ी भूमिका रही है. इस संस्था की संचालिका पद्मश्री सुधा वर्गीज हैं. इस बारे में रागिनी बताती हैं, “हम लोग उन्हीं की संस्था में पढ़ते थे, दीदी ने एक रोज कहा तुम लोग गाड़ी चलाना सीखोगी. पहले तो हम सोचने लगे, फिर तैयार हो गए.” नारी गुंजन के ब्लॉक कोऑर्डिनेटर पप्पू चौधरी कहते हैं, “दरअसल उस साल बिहार पुलिस में महिला ड्राइवरों की वैकेंसी आई थी, वह खाली रह गई. तभी सुधा दीदी के मन में यह ख्याल आया कि क्यों न हम अपनी बच्चियों को ड्राइविंग सिखाएं.”

इस काम के लिए नारी गुंजन ने महिला विकास निगम का सहयोग लिया और अपने यहां की 18 लड़कियों को IDTR में लाइट मोटर व्हीकल ड्राइविंग का 21 दिनों का प्रशिक्षण दिलवाया. मगर वहां से ट्रेनिंग लेने के बाद भी इन लड़कियों को कोई काम नहीं मिला. अनीता कहती है, “2023 में हमारी ट्रेनिंग हुई थी, उसके बाद सुधा दीदी ने हम लोगों को अपनी एक कार दी ताकि हम उसे चलाने का अभ्यास कर सकें. हमने बारी-बारी से तीन महीने उस कार को चलाया. उसके बाद भी जब हम लोगों को काम नहीं मिला तो परिवहन विभाग के उस वक्त के सचिव ने हमसे टोटो (बैटरी रिक्शा) चलाने को कहा.” रागिनी बताती हैं, “हम एक बार पहले भी गांधी मैदान में ड्राइविंग कर चुके हैं. उस वक्त हमसे वहां टोटो चलवाया गया था. मगर तब भी उसका कोई रिजल्ट नहीं निकला.”

मगर 2025 में शुरू हुई पिंक बस सेवा इनके लिए नया अवसर लेकर आई. इंडिया टुडे से बातचीत में सुधा वर्गीज कहती हैं, “नारी गुंजन काफी समय से मुसहर लोगों की शिक्षा को लेकर काम करती रही है. मगर कुछ साल पहले मुझे समझ आया कि जब तक इन्हें रोजगार नहीं मिलेगा, तब तक इनकी स्थिति नहीं बदलेगी. इसलिए मैं अब इस समुदाय के लोगों के रोजगार और आजीविका के लिए भी काम कर रही हूं. मुझे खुशी है कि इन लड़कियों को पिंक बस में ड्राइवर का काम मिल गया है. हम लोग अब दूसरी लड़कियों को भी एचएमवी (हैवी मोटर व्हीकल) ड्राइविंग की ट्रेनिंग दिलाएंगे.”

परिवहन विभाग में पिंक बस सेवा की नोडल अधिकारी ममता कुमारी की देख-रेख में इन लड़कियों को नियमित अभ्यास कराया जा रहा है. जब इनकी नौकरी पक्की हो जाएगी तो 21 हजार रुपये प्रतिमाह का वेतन मिलेगा. दरअसल परिवहन निगम ने मौर्यन कार्स ऑटो सर्विस लिमिटेड को ड्राइवरों की नियुक्ति और देख-रेख के लिए रखा है. उसी एजेंसी में इन लड़कियों को नौकरी मिलेगी. ममता बताती हैं, “ एडवांस ट्रेनिंग के दौरान ये लड़कियां काफी अच्छे से अभ्यास कर रही हैं, इनमें काफी आत्मविश्वास दिख रहा है. 26 जनवरी की झांकी में ये लड़कियां गांधी मैदान में पिंक बस चलाती नजर आएंगी.” 

जब से इन लड़कियों के बस चलाने की खबरें सामने आई हैं, परिवहन विभाग भी लोगों से मिल रही प्रतिक्रिया से उत्साहित है. विभाग अब सभी पिंक बसों के लिए महिला ड्राइवर तैयार करने में जुट गया है. 

नई सरकार में परिवहन मंत्री श्रवण कुमार इंडिया टुडे से कहते हैं, “अभी पूरे राज्य में एक सौ पिंक बसें चलाई जा रही हैं. अगले बैच में IDTR में 21 लड़कियों को ड्राइविंग का प्रशिक्षण दिया जा रहा है. हमने विभाग को कह दिया है कि राज्य में जितनी भी महिलाएं ड्राइवर बनना चाहती हैं, उन्हें हम निशुल्क प्रशिक्षण देंगे. अभी तो हमें 225 से 250 महिला ड्राइवरों की जरूरत है.”   

दिलचस्प बात यह है कि पिंक बस सेवा में ड्राइविंग के लिए तैयारी कर रहीं अनीता ने बिहार पुलिस में ड्राइवर के पद की लिखित परीक्षा भी पास कर ली है. अब वे प्रैक्टिकल के लिए तैयारी कर रही हैं. 

इन महादलित लड़कियों ने हंसते-खेलते उत्साह के साथ बिहार की आधी आबादी के लिए कैरियर की नई राह खोली है. अब वे बसें और ट्रकें भी चलाएंगी. थोड़ा सा पांव नीचे कर एक्सीलेरेटर दबाती बेबी जब तीखे मोड़ पर आसानी से टर्न लेती हैं, तो उसका आत्मविश्वास देखते बनता है.

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