प. बंगाल में जानबूझकर भड़काई जा रही हिंसा! नेता-पार्टियों की क्या है भूमिका?
वक्फ कानून ने देशभर में हलचल मचाई है लेकिन प. बंगाल में, खासकर मुर्शिदाबाद जैसे मुस्लिम-बहुल इलाकों में, इसको लेकर मचा हंगामा सबसे ज्यादा खतरनाक साबित हुआ

पश्चिम बंगाल की सियासत इन दिनों एक खतरनाक मोड़ पर खड़ी है. अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले एक डरावना सवाल सामने आ रहा है- क्या सियासी दल जानबूझकर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को हवा दे रहे हैं? एक तरफ बहुसंख्यक समुदाय की आशंकाओं को भड़काया जा रहा है, तो दूसरी तरफ अल्पसंख्यक समुदाय की चिंताओं का सियासी फायदा उठाया जा रहा है.
इस तनाव का केंद्र बना है बंगाल का पूर्वी जिला मुर्शिदाबाद, जहां हाल ही में संसद से पारित और राष्ट्रपति की मंजूरी प्राप्त वक्फ (संशोधन) विधेयक के खिलाफ विरोध प्रदर्शन हिंसक बवाल में बदल गए. कम से कम तीन लोगों की मौत हो चुकी है, 150 से ज्यादा लोग गिरफ्तार किए गए हैं, और कई जिले सांप्रदायिक उन्माद और प्रशासनिक चूक की वजह से अराजकता की चपेट में हैं.
वक्फ विधेयक ने देशभर में हलचल मचाई है लेकिन बंगाल में, खासकर मुर्शिदाबाद जैसे मुस्लिम-बहुल इलाकों में, यह हंगामा सबसे ज्यादा खतरनाक साबित हुआ है. आलोचकों का कहना है कि यह कानून धार्मिक स्वायत्तता पर हमला है और नियमन व पारदर्शिता के नाम पर अल्पसंख्यक संस्थानों को कमजोर करने की साजिश है.
बंगाल पर नजर रखने वाले मानते हैं कि जो कुछ वहां हुआ, उसे महज नागरिक विरोध कहकर खारिज नहीं किया जा सकता. मुर्शिदाबाद, मालदा, दक्षिण 24 परगना और हुगली जैसे जिलों में प्रदर्शन कानून-व्यवस्था को ठेंगा दिखाने वाले उपद्रव में बदल गए. प्रदर्शनकारियों ने पुलिस की गाड़ियों में आग लगा दी, सड़कें जाम कर दीं और सुरक्षाकर्मियों पर हमले किए.
मुर्शिदाबाद के सूती कस्बे में पुलिस की गोलीबारी में एक 16 साल का लड़का मारा गया. उसी जिले के समसेरगंज में एक 70 साल के बुजुर्ग और उनके बेटे की उनके घर में हत्या कर दी गई.
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इस वक्फ विधेयक का खुलकर विरोध कर रही हैं. उन्होंने ऐलान किया है कि उनकी सरकार न तो इस कानून का समर्थन करती है और न ही इसे बंगाल में लागू करेगी. यह रुख तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के कोर वोटर बेस, यानी मुस्लिम समुदाय, के साथ तो जुड़ता है, लेकिन प्रशासन की इस अस्थिर स्थिति को भांपने और रोकथाम की पुलिसिंग से नियंत्रित करने में नाकामी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं.
शुरुआती संकेत, जैसे पुरुलिया के रघुनाथपुर में सड़क जाम और आसपास के इलाकों में छिटपुट झड़पें, को शायद नजरअंदाज कर दिया गया. जब जलते बसों और पुलिस के साथ भीड़ की झड़प की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हुईं, तब जाकर राज्य ने केंद्र से मदद मांगी. लेकिन तब तक हालात काबू से बाहर हो चुके थे.
विधानसभा में विपक्ष के नेता बीजेपी के सुवेंदु अधिकारी ने एक याचिका दायर की, जिसके जवाब में कलकत्ता हाई कोर्ट ने मुर्शिदाबाद के जंगीपुर और अन्य इलाकों में जरूरत पड़ने पर केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की तैनाती को मंजूरी दी. कोर्ट का यह दखल कानून-व्यवस्था की मशीनरी के लिए एक जोरदार चेतावनी था.
सियासी दलों ने इस संकट को अपनी-अपनी कहानी में फिट करने में देर नहीं की. बीजेपी ने टीएमसी पर अल्पसंख्यक तुष्टिकरण का आरोप लगाया और कहा कि ममता सरकार ने वोटों के लिए दंगाइयों की अनदेखी की. अगले साल बंगाल में विधानसभा चुनाव होने हैं. दूसरी तरफ, कांग्रेस नेता राशिद अल्वी ने बीजेपी की अगुवाई वाली केंद्र सरकार को कठघरे में खड़ा किया और कहा कि वक्फ विधेयक ही सांप्रदायिक तनाव भड़काने के लिए बनाया गया था.
लेकिन बीजेपी का नैतिक रुख भी सवालों के घेरे में है. हाल के महीनों में पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने सांप्रदायिक रूप से भड़काऊ बयान दिए हैं. सबसे शर्मनाक तौर पर, मार्च में सुवेंदु अधिकारी ने कहा था कि अगर बीजेपी 2026 में राज्य का चुनाव जीतती है, तो टीएमसी के सभी मुस्लिम विधायकों को विधानसभा से बाहर फेंक दिया जाएगा. उनके खिलाफ कोई कानूनी या प्रशासनिक कार्रवाई नहीं हुई, जिससे यह आरोप लगा कि सत्तारूढ़ दल ने इस सांप्रदायिक बयानबाजी को सियासी फायदे के लिए बढ़ने दिया.
यही वजह है कि अब एक डरावनी आशंका सामने आ रही है—क्या यह सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की सुनियोजित सियासी रणनीति है? एक पक्ष बहुसंख्यक समुदाय की आशंकाओं को हवा दे रहा है, तो दूसरा अल्पसंख्यक समुदाय की चिंताओं का सियासी लाभ उठा रहा है. यह आपसी दुश्मनी अशांति भड़काने और चुनावी फायदा कमाने का मुफीद मैदान बन सकती है.
हिंसा ने खुद एक खतरनाक रुख ले लिया. शांतिपूर्ण विरोध लोकतंत्र का अहम हिस्सा है, लेकिन यहां जिस तरह की हरकतें हुईं—आगजनी, भीड़ का उन्माद, और चुन-चुनकर हत्याएं—उनका कोई बचाव नहीं हो सकता. सीमा सुरक्षा बल (BSF) ने आरोप लगाया कि उसके जवानों को पेट्रोल बम और छतों से गोलीबारी का सामना करना पड़ा. इससे पता चलता है कि यह विरोध सहज नहीं, बल्कि सुनियोजित था.
बीएसएफ का आत्मरक्षा में गोली चलाने का दावा सही है या नहीं, इसकी स्वतंत्र जांच होनी चाहिए. लेकिन प्रदर्शनकारियों के पास हथियारों का होना अपने आप में चिंताजनक है.
जैसे-जैसे मरने वालों की संख्या बढ़ी और तबाही की तस्वीरें फैलीं, प्रशासन ने प्रभावित इलाकों में इंटरनेट बंद कर दिया और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 163 के तहत कई तरह के प्रतिबंध लागू किए गए. बंगाल के पुलिस महानिदेशक राजीव कुमार को मुर्शिदाबाद भेजा गया, और जल्द ही गिरफ्तारियों की संख्या 150 के पार चली गई. लेकिन आलोचकों का कहना है कि ये कदम ज्यादातर जवाबी हैं और पर्याप्त भी नहीं हैं.
प्रशासन से जुड़े सूत्रों का दावा है कि राज्य की खुफिया इकाई को इस अशांति की आहट पहले ही मिल गई थी, लेकिन सरकार इसकी गंभीरता समझने में नाकाम रही. नाम न छापने की शर्त पर कुछ वरिष्ठ अधिकारियों ने इस बवाल के लिए नौकरशाही की सुस्ती और सियासी इच्छाशक्ति की कमी को जिम्मेदार ठहराया. यह आंतरिक असंतोष उस सरकार के लिए एक गंभीर आरोप है, जो अपनी जमीनी खुफिया जानकारी और हालात को तेजी से संभालने की अपनी क्षमता पर गर्व करती है.
ममता ने अब धार्मिक नेताओं और मौलवियों के साथ बातचीत शुरू की है, ताकि हालात को शांत किया जा सके. यह कदम स्वागतयोग्य है, लेकिन यह तब उठाया गया, जब नुकसान हो चुका था. इससे भी बड़ी बात, वक्फ कानून को लागू न करने की उनकी साफ घोषणा ने एक संवैधानिक बहस छेड़ दी है.
जब कोई विधेयक संसद से पारित होकर राष्ट्रपति की मंजूरी पा लेता है, तो क्या कोई राज्य इसे लागू करने से इनकार कर सकता है? यह संवैधानिक टकराव केंद्र और विपक्ष शासित राज्यों के बीच बढ़ते तनाव को दिखाता है, जो धर्म, पहचान, शासन और संघवाद जैसे मुद्दों पर बार-बार उभर रहा है.
मुर्शिदाबाद की हिंसा सियासी जोखिमबाजी, सांप्रदायिक उकसावे और प्रशासनिक लापरवाही का नतीजा है. धार्मिक आजादी की रक्षा के नाम पर हिंसा करने वाले प्रदर्शनकारी अपने ही मकसद को कमजोर करते हैं और विभाजन की आग भड़काने वाले सियासी नेता सार्वजनिक पद की जिम्मेदारी को धोखा देते हैं.
सबसे डरावना सच यह है कि अगर ध्रुवीकरण अब टकराव का मुद्दा नहीं बल्कि साझा रणनीति बन गया है, तो बंगाल का सियासी मिजाज भी हमेशा के लिए बदल चुका है. यह अब विचारधाराओं की जंग नहीं रही; यह सुनियोजित संकटों का रंगमंच बनने की राह पर है. बंगाल अपनी सैद्धांतिक प्रतिरोध की विरासत की ओर लौटेगा या इस खतरनाक रास्ते पर आगे बढ़ेगा, यह सिर्फ नेताओं पर नहीं, बल्कि इसके लोगों की सामूहिक चेतना पर निर्भर करेगा.
- अर्कमय दत्ता मजूमदार