गुजरात की यूनिवर्सिटी में ‘मोदी तत्व’ की पढ़ाई पर क्यों छिड़ी बहस?
गुजरात की महाराजा सयाजीराव यूनिवर्सिटी में ‘मोदी तत्व’ समाजशास्त्र के एक हिस्से के तौर पर अगले अकादेमिक सत्र से पढ़ाया जाएगा

गुजरात की सबसे पुरानी इंग्लिश-मीडियम सरकारी यूनिवर्सिटी, महाराजा सयाजीराव यूनिवर्सिटी ऑफ बड़ौदा (MSUB) ने अपने समाजशास्त्र के सिलेबस में बड़ा बदलाव किया है. अब इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नेतृत्व शैली पर आधारित ‘मोदी तत्व’ नाम का मॉड्यूल और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी RSS पर पढ़ाई शामिल की जाएगी. नया सिलेबस अगले अकादेमिक सेशन से लागू होगा.
1881 में बड़ौदा कॉलेज के रूप में शुरू हुई यह यूनिवर्सिटी 30 अप्रैल 1949 को पूर्ण विश्वविद्यालय बनी थी. आज यहां 89 विभाग हैं, जो 6 कैंपस में फैले हुए हैं. नोबेल पुरस्कार विजेता वेंकटरमन रामकृष्णन भी इसी यूनिवर्सिटी के पूर्व छात्र रहे हैं. गुजरात की यह इकलौती सरकारी इंग्लिश-मीडियम यूनिवर्सिटी मानी जाती है, जहां फाइन आर्ट्स, परफॉर्मिंग आर्ट्स, मेडिसिन, साइंस, टेक्नोलॉजी और सोशल साइंस जैसे विषय पढ़ाए जाते हैं.
लंबे समय तक इस यूनिवर्सिटी को पश्चिमी भारत के सबसे खुले और विविध माहौल वाले कैंपसों में गिना जाता रहा है.
अगले सेशन से BA (समाजशास्त्र) के चौथे साल और MA (समाजशास्त्र) के पहले साल में तीन नए 4-क्रेडिट मॉड्यूल जोड़े जाएंगे. इनके नाम हैं : सोशियोलॉजी ऑफ भारत, हिंदू सोशियोलॉजी और सोशियोलॉजी ऑफ पेट्रियोटिज्म. इनमें सबसे ज्यादा चर्चा इस आखिरी मॉड्यूल की हो रही है. इसमें चार पेपर होंगे और हर पेपर के लिए 15 घंटे की पढ़ाई तय की गई है. ‘मोदी तत्व’ इसी मॉड्यूल का हिस्सा होगा. इसके साथ मीडिया और डिजिटल राष्ट्रवाद, नागरिकता और विरोध, ग्लोबलाइजेशन और पहचान की राजनीति जैसे विषय भी पढ़ाए जाएंगे.
इस मॉड्यूल में समाजशास्त्री मैक्स वेबर के ‘करिश्माई नेतृत्व’ वाले सिद्धांत के जरिए नरेंद्र मोदी की नेतृत्व शैली, चुनावी प्रदर्शन, जनता में उनकी छवि और नीतियों का अध्ययन कराया जाएगा. यानी मोदी को इतिहास के किसी पुराने नेता की तरह नहीं बल्कि एक मौजूदा केस स्टडी की तरह पढ़ाया जाएगा. इसके साथ RSS के इतिहास और उसके जमीनी कामकाज पर भी छात्रों से फील्डवर्क कराया जाएगा.
MSUB के समाजशास्त्र विभाग के प्रमुख और बोर्ड ऑफ स्टडीज के चेयरमैन डॉ. वीरेंद्र सिंह ने इसका बचाव करते हुए कहा, “ मोदी तत्व में ‘तत्व’ का मतलब ‘एलिमेंट’ है. ऐसा तत्व जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. हमने सोचा कि जो नेतृत्व अभी हमारे सामने मौजूद है, उसी का अध्ययन करना छात्रों के लिए ज्यादा आसान और समझने लायक होगा.”
उन्होंने यह भी कहा कि RSS पर मॉड्यूल जोड़ने का विचार तब आया जब MA के छात्र नीति आयोग की पब्लिक पॉलिसी मॉनिटरिंग के तहत गांवों में सर्वे कर रहे थे. वहां उन्हें RSS से जुड़े संगठन जमीनी स्तर पर सक्रिय दिखे. इसी वजह से इस पर समाजशास्त्रीय अध्ययन जरूरी लगा.
लेकिन यहीं से विवाद भी शुरू होता है. आलोचकों का कहना है कि डॉ. वीरेंद्र सिंह खुद नीति आयोग और ‘वडोदरा 2047’ जिला योजना से जुड़े रहे हैं. ऐसे में एक ऐसा व्यक्ति, जो सरकारी संस्थाओं से भी जुड़ा हो, अगर मौजूदा प्रधानमंत्री पर कोर्स तैयार करे तो यह हितों के टकराव का मामला बन सकता है. यूनिवर्सिटी ने अब तक इस सवाल का सीधा जवाब नहीं दिया है.
राजनीतिक विरोध भी तेज हुआ. कांग्रेस नेता तारिक अनवर ने इसे ‘दुर्भाग्यपूर्ण’ बताया और कहा कि जिन संगठनों को सिलेबस में शामिल किया जा रहा है, उनका भारत की आजादी की लड़ाई में कोई योगदान नहीं था.
यह बदलाव ऐसे समय में आया है जब यूनिवर्सिटी में पहले से ही तनावपूर्ण माहौल है. 2007 में फाइन आर्ट्स के छात्र श्रीलामंथुला चंद्रमोहन की कुछ कलाकृतियों पर कट्टर हिंदू संगठनों ने आपत्ति जताई थी और कैंपस में प्रदर्शन किया था. उस समय यूनिवर्सिटी प्रशासन ने अकादमिक स्वतंत्रता का समर्थन करने के बजाय फाइन आर्ट्स डीन शिवाजी पनिक्कर को सस्पेंड कर दिया था क्योंकि उन्होंने प्रदर्शनकारियों की मांग मानने से इनकार कर दिया था.
तब चंद्रमोहन को गिरफ्तार किया गया था लेकिन कैंपस में घुसकर हंगामा करने वालों के खिलाफ कोई FIR दर्ज नहीं हुई. उस समय के कुलपति मनोज सोनी बाद में मोदी सरकार में UPSC के चेयरमैन बने. हाल ही में उनके बाद आए कुलपति विजय कुमार श्रीवास्तव ने भी 2025 की शुरुआत में अपना कार्यकाल खत्म होने से एक महीने पहले इस्तीफा दे दिया था. उनकी नियुक्ति को लेकर गुजरात हाई कोर्ट में याचिका चल रही थी.
आलोचकों का कहना है कि आजादी के बाद भारत के इतिहास में शायद पहली बार ऐसा हो रहा है कि किसी मौजूदा प्रधानमंत्री की विचारधारा और नेतृत्व शैली को सरकारी यूनिवर्सिटी में परीक्षा वाले विषय के रूप में पढ़ाया जाएगा. अब असली सवाल यह है कि यह कोर्स सच में समाजशास्त्रीय अध्ययन होगा या फिर राजनीतिक विचारधारा को बढ़ावा देने का माध्यम बनेगा. इसका जवाब काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि यूनिवर्सिटी पढ़ाई की किताबें और परीक्षा का तरीका क्या तय करती है.