पश्चिम बंगाल के SIR पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा जो TMC इसे अपनी जीत बता रही है?
ममता बनर्जी की पार्टी TMC का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट का निर्देश BJP और चुनाव आयोग के लिए एक करारा जवाब है

19 जनवरी को पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (SIR) को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को कई निर्देश दिए हैं. कोर्ट के इन निर्देशों को मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) अपनी जीत के तौर पर देख रही है.
दरअसल, चुनाव आयोग ने बंगाल SIR में 'logical discrepancies' यानी तार्किक विसंगतियों की कैटेगरी में करीब 1.25 करोड़ मतदाताओं को शामिल किया था. सुप्रीम कोर्ट ने इन सभी नामों को ग्राम पंचायत, ब्लॉक और वार्ड स्तर पर सार्वजनिक रूप से जारी करने के निर्देश दिए हैं.
अब चुनाव आयोग इन नामों को प्रकाशित करने की तैयारी कर रहा है. बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप प्रक्रिया में सुधार करने के आदेश भी दिए गए हैं.
TMC नेताओं ने SIR को लेकर याचिका दायर कर आपत्तियां दर्ज की थीं. इन्हीं आपत्तियों पर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को ये निर्देश दिए हैं. पश्चिम बंगाल चुनाव से पहले सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को TMC अपने पक्ष में देख रही है, खासकर चुनाव तारीखों की घोषणा से पहले. यह पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए मोरल बूस्ट की तरह काम कर रहा है.
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता में तीन-न्यायाधीशों वाली पीठ ने चुनाव आयोग को ये निर्देश दिए हैं. साथ ही, कोर्ट ने दावों और आपत्तियों के पारदर्शी निपटान को सुनिश्चित करने का आदेश भी दिया है. कोर्ट ने कहा कि मतदाता का अधिकृत प्रतिनिधि बूथ लेवल एजेंट (BLA) भी हो सकता है, लेकिन इसके लिए हस्ताक्षर या अंगूठे की छाप वाला प्राधिकार पत्र जरूरी होगा.
मुख्य निर्वाचन अधिकारी ग्राम पंचायत भवन, ब्लॉक कार्यालय या वार्ड कार्यालय को नामित करेगा. वोटर लिस्ट के प्रत्येक भाग के लिए मतदान केंद्र के भीतर या उसके निकट दस्तावेज जमा करने और सुनवाई की व्यवस्था होगी. प्रभावित मतदाता या उनके अधिकृत प्रतिनिधि नाम प्रदर्शित होने के बाद 10 दिन तक पंचायत भवन, ब्लॉक या वार्ड कार्यालय में दस्तावेज/आपत्तियां/दावे जमा कर सकते हैं.
इस आदेश में चुनाव आयोग को Class X (माध्यमिक परीक्षा) के एडमिट कार्ड को जन्म तिथि के प्रमाण के रूप में स्वीकार करने का भी निर्देश दिया गया है, क्योंकि इसमें जन्म तिथि अंकित होती है. चुनाव आयोग ने हाल ही में आदेश दिया था कि इस दस्तावेज को वैध प्रमाण के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता. अदालत ने कहा कि स्थानीय प्रशासनिक कार्यालयों सहित अन्य स्थानों पर ऐसी सूचियों को जारी करना पारदर्शिता बनाए रखने के लिए जरूरी है. साथ ही पुनरीक्षण प्रक्रिया से प्रभावित नागरिकों के चुनावी अधिकारों को संरक्षित करने के लिए भी ये जरूरी है.
सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों का स्वागत करते हुए इसे लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा करने वाला फैसला बताया है. साथ ही TMC इस फैसले को BJP और चुनाव आयोग के लिए करारा जवाब बता रही है. पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और लोकसभा सांसद अभिषेक बनर्जी ने कहा कि यह आदेश एक ऐतिहासिक है, जिसने TMC के जरिए राजनीतिक रूप से अन्यायपूर्ण बताई गई एक प्रक्रिया को करारा झटका दिया है.
अपने एक बयान में अभिषेक बनर्जी ने कहा कि न्यायालय के हस्तक्षेप से बहुत जरूरी पारदर्शिता आई है, खासकर उन मतदाताओं के लिए जिनके नाम तार्किक विसंगतियों के आधार पर चिह्नित किए गए थे. एक रैली में उन्होंने आगे कहा, "BJP का SIR खेल खत्म हो गया है. जिन एक करोड़ नामों को सूची से हटाने का लक्ष्य रखा गया था, उन्हें बचा लिया गया है. यह जीत बंगाल की जनता की है. हमारे मतदान के अधिकार खतरे में थे, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें करारा जवाब दिया है."
उन्होंने सुनवाई केंद्रों में BLA को शामिल होने की अनुमति देने की मांग को अदालत द्वारा स्वीकार किए जाने का स्वागत किया, जो पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान TMC की ओर से उठाया गया एक महत्वपूर्ण मुद्दा था. साथ ही उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश SIR प्रक्रिया के खिलाफ TMC द्वारा लड़ी गई लंबी कानूनी लड़ाई की सफलता है.
दरअसल, TMC SIR को मनमाना, प्रक्रियात्मक रूप से त्रुटिपूर्ण और वास्तविक मतदाताओं के मताधिकार छीनने वाला बताकर चुनौती दे रही है. सांसद डेरेक ओ'ब्रायन और डोला सेन सहित तृणमूल नेताओं ने याचिकाएं दायर कर आरोप लगाया था कि चुनाव आयोग ने SIR के दौरान पर्याप्त कानूनी आधार या पारदर्शिता के बिना 'तार्किक विसंगति' श्रेणी पेश की है.
TMC की ओर से कोर्ट में वकालत कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने तर्क दिया कि चुनाव आयोग के निर्देश अक्सर WhatsApp और मौखिक निर्देशों के माध्यम से दिए जाते हैं, जिससे औपचारिक लिखित आदेशों को दरकिनार किया जाता है. इससे ऑडिट के रिकॉर्ड कमजोर हो जाते हैं.
बंगाल में SIR प्रक्रिया बेहद विवादास्पद और राजनीतिक रूप से संवेदनशील रही है. TMC ने बार-बार चुनाव आयोग और BJP पर किसी ना किसी बहाने से वैध मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाने का आरोप लगाया है. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी SIR के जरिए बड़ी संख्या में वैध मतदाताओं के नाम हटाए जाने का आरोप चुनाव आयोग पर लगाया है.
चुनाव आयोग ने नाम हटाए जाने के दावों को खारिज कर दिया है और जोर देकर कहा है कि मतदाता सूची को जांच करने और सही मतदाताओं की पहचान के उद्देश्य से शुरू की गई SIR संवैधानिक प्रक्रिया का हिस्सा है.
SIR प्रक्रिया को लेकर आम जनताओं के मन में तरह-तरह की चिंताएं देखी जा रही हैं. SIR में सुधार को लेकर विभिन्न सामाजिक समूहों का मानना है कि सख्त कागजी आवश्यकताओं और सीमित समयसीमा के कारण गरीब लोगों को परेशानी हो रही है. जहां एक ओर TMC सुप्रीम कोर्ट के फैसले को अपनी जीत के रूप में देखकर जश्न मना रही है. वहीं, BJP ने TMC सरकार को लेकर आलोचना तेज कर दी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ममता सरकार को "जंगल राज" और अराजकता में डूबा हुआ बताया है.