अब तृणमूल कांग्रेस को कौन चला रहा है?
तृणमूल कांग्रेस के विद्रोही नेताओं ने राष्ट्रीय कार्यकारी समिति का गठन कर ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी को पार्टी के सभी पदों से हटा दिया है

बंगाल विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) एक बार फिर सियासी उथल-पुथल में घिर गई है. विधानसभा में विपक्ष के नेता ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट ने 22 जून को कोलकाता में पार्टी का विशेष सत्र बुलाया.
इसमें पार्टी की नई राष्ट्रीय कार्यकारी समिति (नेशनल वर्किंग कमेटी) बनाने का ऐलान किया गया. इसके साथ ही पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी उन पदों से बाहर हो गए जिन पर वे अब तक बने हुए थे.
न्यू टाउन के एक होटल में बंद कमरे में हुई यह बैठक करीब 30 मिनट चली. ऋतब्रत गुट ने औपचारिक रूप से अभिषेक को निलंबित नहीं किया. इसके बजाय उसने राष्ट्रीय कार्यकारी समिति का पुनर्गठन किया. नई व्यवस्था में अभिषेक राष्ट्रीय महासचिव के पद पर नहीं रहे.
सत्र को संबोधित करते हुए ऋतब्रत ने कहा कि पार्टी संवैधानिक संकट का सामना कर रही है. उन्होंने TMC के संविधान के अनुच्छेद 20 का हवाला दिया जिसके अनुसार हर तीन साल में राष्ट्रीय कार्यकारी समिति का गठन होना अनिवार्य है. उनके मुताबिक पिछली समिति 12 फरवरी 2022 को गठित हुई थी और उसका विवरण चुनाव आयोग को भेजा गया था. पार्टी संविधान के अनुसार उसका कार्यकाल पिछले साल समाप्त हो गया था. इसलिए नई समिति का गठन जरूरी था.
बैठक में 10 सदस्यीय राष्ट्रीय कार्यकारी समिति का प्रस्ताव रखा गया. इसमें अरूप रॉय, फिरहाद हाकिम, अरूप विश्वास, बिप्लब मित्रा, अखरुज्जमान, जावेद खान, सबीना यास्मीन, संदीपन साहा, रथीन घोष और ऋतब्रत शामिल हैं. नई समिति ने बाद में अरूप रॉय को पार्टी अध्यक्ष चुना. उन्होंने ममता बनर्जी की जगह ली. वहीं ऋतब्रत, साहा और खान को महासचिव नियुक्त किया गया.
इन घटनाक्रमों को TMC पर संगठनात्मक नियंत्रण हासिल करने की दिशा में बागी गुट की अब तक की सबसे बड़ी कोशिश माना जा रहा है. हालांकि ममता के वफादार गुट ने इस कदम को पूरी तरह अवैध और राजनीतिक रूप से अप्रासंगिक बताया. तृणमूल विधायक कुणाल घोष ने बागी गुट पर पार्टी के कठिन समय में विश्वासघात करने का आरोप लगाया.
उन्होंने मीडिया से कहा, "जब हमारे पार्टी कार्यकर्ताओं पर अलग-अलग जगह हमले हो रहे हैं, तब उनके साथ खड़े होकर लड़ने के बजाय ये लोग सत्ता के लालच में दूसरों के हित साध रहे हैं. ये तृणमूल की पीठ में छुरा घोंप रहे हैं."
ममता गुट ने उनके कुछ पूर्व करीबी सहयोगियों जैसे फिरहाद हाकिम और अरूप विश्वास को भी पार्टी से बाहर कर दिया. साथ ही उन्होंने अपनी ओर से तैयार समिति की नई सूची चुनाव आयोग को भेज दी.
बागियों के इस दावे का मजाक उड़ाते हुए कि उन्होंने ममता को पार्टी से हटा दिया है, कुणाल घोष ने कहा, "यह सुनकर हमें सिर्फ हंसी आती है कि ममता बनर्जी को पार्टी से हटा दिया गया है. ममता बनर्जी किसी पद की मोहताज नहीं हैं. वे लोगों के दिलों की नेता हैं. ऋतब्रत को तो बहुत पहले ही पार्टी से निष्कासित किया जा चुका है. जिसे पार्टी से निकाला जा चुका हो, वह किसी और को पार्टी से नहीं निकाल सकता."
कुणाल घोष ने आरोप लगाया कि यह कदम एक बड़ी राजनीतिक साजिश का हिस्सा है. उन्होंने कहा, "उन्होंने पूरी तरह अवैध काम किया है और पर्दे के पीछे दूसरी ताकतों के एजेंडे को लागू कर रहे हैं. अगर आज भी ममता बनर्जी मुख्यमंत्री होतीं तो यही लोग जो पार्टी पर कब्जे का यह नाटक कर रहे हैं, पूरे दिन उनके पीछे-पीछे घूमते और उन्हें 'दीदी' कहते."
उन्होंने कहा, "जैसे ही चुनाव नतीजे बदले, इन्होंने वफादारी बदल ली और विश्वासघात की राजनीति शुरू कर दी. हम ममता बनर्जी के नेतृत्व के साथ खड़े थे और जीवनभर खड़े रहेंगे. ये लोग पांच सितारा होटलों में जितनी चाहें बैठकें कर लें, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता."
ऋतब्रत पर व्यक्तिगत हमला करते हुए कुणाल घोष ने कहा, "पार्टी ने ऋतब्रत को सब कुछ दिया और सम्मान दिया. कोई व्यक्ति कितना बड़ा गद्दार हो सकता है कि ऐसा व्यवहार करे? उसने उसी पार्टी खाते के पैसे से चुनाव लड़ा, जिसे अब वह चुनाव आयोग को लिखे पत्रों में अवैध बता रहा है. तब क्या वह पैसा खराब नहीं था? सत्ता जाने के बाद अचानक वह खराब हो गया?"
कुणाल घोष ने बागी गुट की फंडिंग पर भी सवाल उठाए. उन्होंने आरोप लगाया, "अगर उनमें सचमुच हिम्मत है तो अपनी ताकत पर लड़ें. किसी और के पैसे से पांच सितारा होटलों में बैठकें क्यों कर रहे हैं? इससे साफ पता चलता है कि इसके पीछे बड़ी साजिश है और कहीं और से आर्थिक मदद मिल रही है. वे दूसरे लोगों के दलाल बन गए हैं."
दोनों गुटों के बीच बढ़ते टकराव के बीच ममता गुट ने संकेत दिया है कि कोलकाता में बागी गुट की बैठक में लिए गए फैसलों के खिलाफ कानूनी विकल्पों पर विचार किया जा सकता है. हालांकि इस अभूतपूर्व टकराव ने TMC के भीतर संगठनात्मक लड़ाई को और गहरा कर दिया है. बागी गुट अब खुलकर पार्टी पर वैधता और नियंत्रण का दावा कर रहा है.