'गरिमा के साथ मृत्यु' के अधिकार को लागू करने में महाराष्ट्र क्यों बना मिसाल?

महाराष्ट्र ने लिविंग विल के रजिस्ट्रेशन की व्यवस्था शुरू की है जिससे नागरिक अपनी पसंद और मान्यताओं के अनुसार जीवन के अंतिम चरण से जुड़े फैसले ले सकें

सांकेतिक तस्वीर

महाराष्ट्र भारत का पहला राज्य बन गया है जिसने औपचारिक रूप से 'लिविंग विल' पोर्टल स्थापित किया है. इसके जरिए नागरिक अपनी पसंद और आस्था के अनुसार जीवन के अंतिम चरण से जुड़े फैसले ले सकेंगे. 

राज्य सरकार ने 7 अप्रैल को नगर निगमों और नगर परिषदों समेत शहरी और स्थानीय निकायों में लिविंग विल के रजिस्ट्रेशन और संरक्षण के लिए एक व्यवस्थित तंत्र शुरू किया. इसके तहत लिविंग विल के रजिस्ट्रेशन, सत्यापन और सुरक्षित भंडारण के लिए MahaULB नाम का एक डिजिटल पोर्टल भी लॉन्च किया गया.

WillJini.com के संस्थापक जतिन पोपट कहते हैं कि जिस तरह लोग मृत्यु के बाद उपयोग होने वाली सामान्य वसीयत के जरिए अपनी संपत्ति और धन की योजना बनाते हैं, उसी तरह लिविंग विल व्यक्ति को यह तय करने की अनुमति देती है कि अगर उसकी मेडिकल कंडीशन में सुधार की कोई संभावना न हो तो वह किस प्रकार मृत्यु का सामना करना चाहता है.

वे कहते हैं कि जीवन के अंतिम चरण से जुड़े फैसले सबसे कठिन फैसलों में होते हैं. ऐसे में महाराष्ट्र का यह कदम लिविंग विल के संरक्षक की तरफ से इसके क्रियान्वयन से जुड़ी कई अस्पष्टताओं और प्रक्रियागत पहलुओं को स्पष्ट करने में मदद करेगा. भारत जैसे देश में यह और भी महत्वपूर्ण है, जहां ऐसे फैसले अक्सर सांस्कृतिक और पारिवारिक रिश्तों तथा भावनाओं से प्रभावित होते हैं.

लिविंग विल क्या है?

लिविंग विल एक कानूनी दस्तावेज है, जिसमें व्यक्ति स्वास्थ्य पेशेवरों के लिए अपनी प्राथमिकताएं दर्ज करता है कि जीवन के अंतिम चरण में उसके साथ किस तरह का इलाज किया जाए. विशेष रूप से तब, जब वह असाध्य बीमारी से ग्रस्त हो, ठीक होने की कोई संभावना न हो और वह स्वयं कोई निर्णय बताने की स्थिति में न हो.

लिविंग विल में दर्ज अधिकांश प्राथमिकताएं जीवन रक्षक चिकित्सा उपायों से संबंधित होती हैं. इनमें वेंटिलेटर सपोर्ट, ट्यूब फीडिंग, कार्डियोपल्मोनरी रिससिटेशन (CPR) और सर्जिकल प्रक्रियाएं शामिल हैं.

इन प्राथमिकताओं को पहले से तय करके व्यक्ति जीवन के अंतिम चरण में अपनी स्वायत्तता बनाए रख सकता है. साथ ही यह सुनिश्चित कर सकता है कि उसकी चिकित्सा देखभाल उसके व्यक्तिगत मूल्यों, मान्यताओं और प्राथमिकताओं के अनुरूप हो.

भारत में इच्छामृत्यु या यूथेनेशिया की व्यवस्था नहीं है. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले ‘कॉमन कॉज बनाम भारत संघ (2018)’ में यह माना था कि व्यक्तियों को चिकित्सा उपचार से इनकार करने और यह तय करने का अधिकार है कि वे किस प्रकार और कितनी चिकित्सा देखभाल प्राप्त करना चाहते हैं.

कानूनी फर्म LegaLogic Consulting के सह-संस्थापक विवेक साधले कहते हैं, "यह फैसला भारतीय संवैधानिक कानून में मरीजों की स्वायत्तता को मान्यता देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था. इस संदर्भ में स्वायत्तता का अर्थ केवल यह तय करना नहीं है कि व्यक्ति कैसे जीवन जिएगा, बल्कि यह भी है कि जीवन के अंतिम चरण में उसके साथ किस प्रकार का उपचार किया जाएगा."

लिविंग विल के महत्व को समझाते हुए वे कहते हैं कि ‘गरिमा के साथ मृत्यु का अधिकार’ वास्तव में गरिमा के साथ जीने के अधिकार का विस्तार है. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के संदर्भ में स्वायत्तता केवल उपचार प्राप्त करने के अधिकार तक सीमित नहीं है, बल्कि उपचार को अस्वीकार करने या सीमित करने के अधिकार को भी शामिल करती है.

साधले बताते हैं कि एक वैध लिविंग विल की आवश्यक शर्तों इस प्रकार हैं :

  • लिविंग विल एक कानूनी दस्तावेज है, जो लिखित रूप में होना चाहिए. इसे कोई वयस्क व्यक्ति पूरी मानसिक क्षमता के साथ, अपनी इच्छा से और बिना किसी दबाव के तैयार करे.
  • इसमें चिकित्सा उपचार संबंधी प्राथमिकताओं के बारे में स्पष्ट और विशिष्ट निर्देश होने चाहिए.
  • लिविंग विल पर दो वयस्क गवाहों की उपस्थिति में हस्ताक्षर किए जाने चाहिए.
  • लिविंग विल की समीक्षा और अनुमोदन डॉक्टरों द्वारा भी किया जाना चाहिए.
  • लिविंग विल बनाने वाले व्यक्ति को एक प्रतिनिधि (एजेंट) नियुक्त करना होगा, जो यह सुनिश्चित करेगा कि उसकी इच्छाओं का सम्मान किया जाए और उन्हें लागू किया जाए.
  • दस्तावेज तैयार होने के बाद इसे ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से या स्थानीय नगर निकाय कार्यालय जाकर रजिस्ट्रेशन के लिए जमा किया जा सकता है.
  • लिविंग विल जमा करने के बाद राज्य सरकार की तरफ से नियुक्त निर्धारित संरक्षक के समक्ष भौतिक सत्यापन अनिवार्य है.
  • ऑफलाइन प्रक्रिया में दस्तावेज बनाने वाले व्यक्ति को लिविंग विल की दो नोटरीकृत प्रतियों और एक शपथपत्र के साथ आवेदन भी जमा करना होगा. चाहे प्रक्रिया ऑनलाइन हो या ऑफलाइन, सत्यापन अनिवार्य है.
  • सत्यापन सफल होने पर लिविंग विल को औपचारिक रूप से प्रणाली में दर्ज किया जाता है और व्यक्ति को हस्ताक्षरित तथा मुहर लगी प्रति प्रदान की जाती है.
  • लिविंग विल में संशोधन या उसे निरस्त करना संभव है लेकिन इसके लिए संरक्षक के समक्ष निर्धारित औपचारिक प्रक्रिया का पालन करना होगा. अनौपचारिक बदलावों को कानूनी मान्यता नहीं मिल सकती.

यह समझना भी जरूरी है कि लिविंग विल का रजिस्ट्रेशन होने मात्र से उसका क्रियान्वयन स्वतः सुनिश्चित नहीं हो जाता. चिकित्सा पेशेवरों को सुप्रीम कोर्ट की तरफ से निर्धारित सुरक्षा उपायों का पालन करना होता है. इनमें मरीज की स्थिति का आकलन, मेडिकल बोर्डों की समीक्षा और आवश्यकता पड़ने पर न्यायिक निगरानी शामिल है.

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