महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव : कांग्रेस के तीन पूर्व मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री कैसे बना रहे जीत का फॉर्मूला?
महाराष्ट्र में 20 नवंबर को होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस ने वहां तीन पूर्व मुख्यमंत्री और तीन उपमुख्यमंत्रियों सहित 13 लोगों की टीम भेजी है

हरियाणा में मिली अप्रत्याशित हार के बाद और 20 नवंबर को होने वाले महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव को देखते हुए कांग्रेस अपनी भीतरी कमियों को दुरुस्त करने की कोशिश कर रही है. यह हार पार्टी के लिए चेतावनी और मार्गदर्शक दोनों का काम करती है, क्योंकि उसे महाराष्ट्र की जंग को जीतने के लिए काफी मुश्किल राजनीतिक चुनौतियों का सामना करना होगा. कांग्रेस को न सिर्फ अपने अंदरूनी मतभेदों से निपटना होगा, बल्कि महाविकास अघाड़ी (एमवीए) गठबंधन की जटिलताओं को भी पटरी पर लाने की जिम्मेदारी होगी.
बहरहाल, कांग्रेस ने पहले ही पूरे राज्य में अभियान शुरू कर दिया है. इसके तहत, पार्टी के कई वरिष्ठ नेता और चुनाव पर्यवेक्षक अलग-अलग इलाकों का प्रबंधन करने के लिए पूरे राज्य भर में फैल चुके हैं. इस अभियान की कमान महाराष्ट्र के प्रभारी और ऑल इंडिया कांग्रेस कमिटी (एआईसीसी) के महासचिव रमेश चेन्निथला के हाथों में है. वे राज्य इकाई के अध्यक्ष नाना पटोले और बालासाहेब थोराट और शशिकांत सेंथिल जैसे अन्य प्रमुख नेताओं के साथ मुंबई में लंबी रणनीतिक बैठकें कर रहे हैं. महाराष्ट्र के रण को जीतने के लिए वहां पर्यवेक्षक के रूप में 13 सदस्यीय बाहरी टीम को भेजा गया है जिनमें तीन मुख्यमंत्री, तो तीन उपमुख्यमंत्री रह चुके हैं.
इनमें राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और कर्नाटक के पूर्व उपमुख्यमंत्री डॉ. जी. परमेश्वर मुंबई और कोंकण इलाकों की चुनावी रणनीति की देखरेख करेंगे. ये इलाके अपने शहरी और अर्ध-शहरी मतदाता आधार की वजह से पार्टी के लिए राजनीतिक रूप से अहम हैं. वहीं विदर्भ क्षेत्र, जो कांग्रेस पारंपरिक गढ़ माना जाता है और जहां महाराष्ट्र की कुल 288 विधानसभा सीटों में से 62 मौजूद है, वहां पार्टी ने अपने पर्यवेक्षक के तौर पर छत्तीसगढ़ के पूर्व सीएम भूपेश बघेल, पंजाब के पूर्व सीएम चरणजीत सिंह चन्नी और मध्य प्रदेश के नेता उमंग सिंघार को तैनात किया है.
इसके अलावा, कांग्रेस ने राज्य के मराठवाड़ा इलाके में राजस्थान के पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट और तेलंगाना राज्य कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष उत्तम कुमार रेड्डी को चुनाव प्रभारी की भूमिका सौंपी है. इधर, आर्थिक रूप से अहम क्षेत्र पश्चिमी महाराष्ट्र में चुनावी कैंपेन की जिम्मेदारी छत्तीसगढ़ के पूर्व उपमुख्यमंत्री टीएस सिंहदेव और कर्नाटक के नेता एमबी पाटिल पर है. उत्तर महाराष्ट्र भी पार्टी के लिए एक अहम इलाका है. इसकी देखरेख की कमान राज्यसभा सांसद सैयद नसीर हुसैन और तेलंगाना की पूर्व विधायक डी. अनसूया सीथक्का के हाथों में है.
पार्टी ने राज्य के मूल निवासी और वरिष्ठ नेता मुकुल वासनिक और अविनाश पांडे को राज्य के वरिष्ठ समन्वयक के रूप में नियुक्त किया गया है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि अभियान पूरे महाराष्ट्र में सुचारू रूप से संचालित हो. इन सभी नियुक्तियों का मकसद यही है कि राज्य के विविध राजनीतिक परिदृश्यों को प्रभावी ढंग से मैनेज किया जा सके. इससे पार्टी क्षेत्रीय जटिलताओं को समझकर उस हिसाब से आगे बढ़ सकेगी और हरियाणा में जो भीतरी मतभेदों की वजह से जो बुरे नतीजे मिले, उस नुकसान को दोहराने से बचा जा सकेगा.
बहरहाल, चेन्नथिला और सेंथिल सहित यह 13 सदस्यों की एक बाहरी टीम है. इस दल का पूरा फोकस राज्य में आम सहमति बनाने पर केंद्रित है. इस टीम की नियुक्ति से एक दिन पहले राहुल गांधी ने महाराष्ट्र के सभी शीर्ष नेताओं को दिल्ली बुलाया था, जहां आम सहमति की अहमियत पर जोर दिया गया. इसी महीने की शुरुआत में हरियाणा में कांग्रेस की हार पार्टी के लिए एक बड़ा झटका थी, जो बड़ी उम्मीदों के साथ चुनाव में उतरी थी. यहां आंतरिक मतभेद, गुटबाजी और अति आत्मविश्वास पार्टी के लिए घातक साबित हुए.
हरियाणा चुनाव में वरिष्ठ कांग्रेस नेता भूपिंदर सिंह हुड्डा पर पार्टी को जीत दिलाने का दारोमदार था, लेकिन भीतरी कलह की वजह से वे एकजुट होकर अभियान की अगुआई नहीं कर पाए. महाराष्ट्र कांग्रेस में भी कुछ समय से यही समस्याएं देखने को मिली हैं. पार्टी के भीतर आंतरिक प्रतिद्वंद्विता और एकजुट नेतृत्व की कमी पनप रही हैं, जिससे उसके भीतर यह चिंता बढ़ रही है कि कहीं फिर से हरियाणा जैसा ही हाल यहां न हो जाए.
हालांकि, स्थानीय कांग्रेस के नेता इस बात पर जोर देते हैं कि उन्होंने हरियाणा की गलतियों से सबक सीखा है. नाना पटोले ने सार्वजनिक रूप से दावा किया है कि महाराष्ट्र में पार्टी अधिक एकजुट है. इसके अलावा, उन्होंने एमवीए के भीतर सीटों के बंटवारे पर सुचारू बातचीत और किसी भी बड़े आंतरिक कलह की गैरमौजूदगी की ओर इशारा किया. लेकिन पटोले और विजय वडेट्टीवार जैसे वरिष्ठ नेताओं के बीच भीतरी कलह की खबरें बताती हैं कि गुटबाजी अभी भी मौजूद है.
इसके अलावा वडेट्टीवार और कांग्रेस सांसद प्रतिभा धनोरकर से जुड़ी एक हालिया घटना भी, जिसमें क्षेत्रीय प्रभुत्व को लेकर दोनों के बीच टकराव देखने को मिला, इस बात पर फोकस डालती है कि वास्तव में वहां पार्टी के भीतर एकजुटता की कमी है. कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व ने तनाव को शांत करने के लिए दखल दिया है, हालांकि चुनाव का दबाव बढ़ने पर ये शांति वार्ता जारी रहेगी या नहीं, यह देखना बाकी है.
लेकिन अंदरूनी कलह की खबर सिर्फ यही भर नहीं है. विदर्भ और मराठवाड़ा में भी इसी तरह की दरार सामने आई है. यहां स्थानीय कांग्रेस नेता एक-दूसरे की खुलकर आलोचना करते रहे हैं. चेन्निथला के नेतृत्व में केंद्रीय नेतृत्व इन विवादों को सुलझाने के लिए लगातार काम कर रहा है, लेकिन अब चुनाव में सिर्फ एक महीने का ही समय बचा है और ऐसे में यहां अंदरूनी टकराव की कोई गुंजाइश नहीं बचती.
बहरहाल, भीतरी कलह के साथ-साथ कांग्रेस को एक और सिरदर्द का सामना करना पड़ सकता है, और वो ये कि एमवीए सहयोगियों के साथ अपने संबंधों को कैसे पटरी पर बनाए रखे.
एमवीए गठबंधन में कांग्रेस के अलावा शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) और शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी यानी एनसीपी शामिल हैं. एमवीए के भीतर सीट बंटवारे की बातचीत अभी तक खत्म नहीं हुई है. पटोले ने पुष्टि की कि कांग्रेस 110-115 सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए जोर दे रही है, जो गठबंधन सहयोगियों में सबसे ज्यादा है. शिवसेना (यूबीटी) और एनसीपी हरेक के लगभग 80-85 सीटों पर चुनाव लड़ने की उम्मीद है.
जबकि पटोले जोर देकर कहते हैं कि एमवीए के भीतर सीट बंटवारे पर चर्चा पटरी पर है, वहीं शिवसेना (यूबीटी) और एनसीपी दोनों दलों में असंतोष की सुगबुगाहट है. हाल की बैठकों में, उद्धव ठाकरे ने कथित तौर पर मुंबई और कोंकण जैसे शहरी क्षेत्रों में अपने प्रदर्शन का हवाला देते हुए शिवसेना को मौजूदा आवंटित 80-85 सीटों से अधिक पर चुनाव लड़ने के लिए दबाव डाला.
इधर, हालिया आम चुनावों में शानदार प्रदर्शन करने वाली कांग्रेस ने इन मांगों का विरोध किया है. उसने विदर्भ और मराठवाड़ा में अपने प्रभाव को 288 विधानसभा सीटों में से अधिक सीटों पर चुनाव लड़ने की वजह के रूप में पेश किया है. हालांकि, पार्टी के हरियाणा में खराब प्रदर्शन की वजह से इसकी मोलभाव करने की शक्ति में गिरावट हुई है. एमवीए के भीतर सहयोगी अब पूछ रहे हैं कि क्या कांग्रेस महाराष्ट्र में अपने मजबूत लोकसभा प्रदर्शन के बावजूद विधानसभा चुनाव में वही करिश्मा दोहरा सकती है.
इसके अलावा, कांग्रेस के भीतर इस बात की भी चिंता बढ़ रही है कि शिवसेना (यूबीटी) और एनसीपी बातचीत के अंतिम चरण में और अधिक दबाव डाल सकते हैं, जिससे संभावित रूप से टकराव की स्थिति पैदा हो सकती है. और जो गठबंधन की चुनावी संभावनाओं को नुकसान पहुंचा सकता है.
दरअसल, कांग्रेस को भीतर और बाहर दोनों तरफ से दोहरी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. भीतरी तौर पर जहां उसे अपने घर को व्यवस्थित रखना होगा, गुटबाजी को खत्म करना होगा और एकजुट मोर्चा बनाना होगा. वहीं, बाहरी तौर पर उसे एमवीए गठबंधन की नाजुक डोर को संभालना होगा और साथ ही राज्य पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए आतुर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के नेतृत्व वाले गठबंधन से भी निपटना होगा.
अगर वह अपने अंदरूनी गुटों को संभालने और गठबंधन की राजनीति को प्रभावी ढंग से संतुलित करने में विफल रहती है, तो पार्टी को 23 नवंबर को एक और बड़ा झटका लग सकता है. लेकिन अगर कांग्रेस अपनी पिछली गलतियों से सीख ले और एक सुसंगत और शानदार कहानी पेश कर सके, तो महाराष्ट्र उसके पुनरुत्थान के लिए लॉन्चपैड साबित हो सकता है.