महानदी जल विवाद : क्या BJP के दो सीएम सुलझा पाएंगे 53 साल पुराना विवाद?

ओडिशा दावा करता रहा है कि छत्तीसगढ़ दोनों राज्यों में बहने वाली महानदी के पानी का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल कर रहा है जिससे उसके क्षेत्र में पानी घटता जा रहा है

पार्वती नदी पर पुलिया गायब!(Photo: Umesh Mishra/ITG)
सांकेतिक तस्वीर

ओडिशा और छत्तीसगढ़ के बीच पिछले 50 साल से चला आ रहा महानदी जल विवाद एक बार फिर चर्चा में है. संभावना है कि समाधान को लेकर दोनों राज्यों के बीच 31 जनवरी को एक बैठक हो सकती है. इससे पहले इसी मामले को लेकर ओडिशा में बीते 23 जनवरी को प्रस्तावित सर्वदलीय बैठक को रद्द कर दिया गया था क्योंकि विपक्षी पार्टी बीजू जनता दल (BJD) ने सत्ताधारी BJP पर आरोप लगाया है कि साजिश के तहत माझी सरकार इस मामले में सुस्ती दिखा रही है. 

सन 1973 से चले आ रहे इस विवाद के केंद्र में महानदी और उसकी सहायक नदियों पर छत्तीसगढ़ सरकार की ओर से बनाए जा रहे बैराज हैं. इससे ओडिशा को मिलने वाली पानी की मात्रा में लगातार गिरावट देखी गई है. ओडिशा की जीवनरेखा मानी जानेवाली महानदी नदी का उद्गम छत्तीसगढ़ के बस्तर पठार में अमरकंटक पहाड़ियों से होता है. यह नदी कुल 851 किलोमीटर की दूरी तय करती है, जिसमें 357 किलोमीटर छत्तीसगढ़ में और 494 किलोमीटर ओडिशा में बहने के बाद बंगाल की खाड़ी में मिलती है. ओडिशा सरकार के अनुसार, छत्तीसगढ़ ने 500 से अधिक एनिकट और 30 बैराज बनाए हैं, जिनमें से कई मुख्य रूप से औद्योगिक उपयोग के लिए हैं. 

ओडिशा ने आशंका जताई है कि नदी के प्रवाह में आई कमी से सिंचाई, पेयजल आपूर्ति और उसके संवेदनशील तटीय क्षेत्रों के पर्यावरण पर बुरा असर पड़ा है.  सरकार का आरोप है कि छत्तीसगढ़ ने बिना उसे बताए या सलाह लिए नदी पर एकतरफा तरीके से बैराज बनाए, जिससे गैर-मानसून अवधि में राज्य में पानी का प्रवाह प्रभावित हुआ. BJD ने ओडिशा में इसे सांस्कृतिक मुद्दा बना दिया है. साथ ही इसको लेकर राज्यव्यापी आंदोलन की तैयारी शुरू कर दी है. मोहन चरण माझी के नेतृत्व वाली BJP सरकार ने उपमुख्यमंत्री के.वी. सिंह देव की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय समिति भी बनाई, जिसमें BJP, BJD और कांग्रेस के विधायक शामिल हैं. इस पैनल को विवाद सुलझाने में सरकार का मार्गदर्शन करने की जिम्मेदारी दी गई है. यह भी तय किया गया है कि 31 जनवरी के आसपास एक टीम छत्तीसगढ़ जाकर इस मुद्दे पर बातचीत करेगी. 

वहीं दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ का कहना है कि महानदी के कुल जलग्रहण क्षेत्र का 52.9 फीसदी और हीराकुंड बांध (ओडिशा में बना) के जलग्रहण क्षेत्र का 89.9 फीसदी हिस्सा उसके राज्य में आता है, जिससे उसे नदी के जल के उपयोग का वैध अधिकार मिलता है. 

आखिर कब से चल रहा विवाद

महानदी नदी पर पहली बार सन 1937 में चर्चा शुरू हुई. जब बाढ़ से तबाह हो रहे तटीय ओडिशा को बचाने के लिए हीराकुंड बांध बनाने की बात चली. ‘लीगल इंस्ट्रूमेंट्स ऑन रिवर्स इन इंडिया’ के वॉल्यूम तीन के मुताबिक आजादी के बाद 15 जून 1973 में पहली बार ओडिशा और मध्य प्रदेश (तब छत्तीसगढ़ का गठन नहीं हुआ था) के बीच नदी के पानी के इस्तेमाल को लेकर समझौता हुआ. इसमें बिजली उत्पादन, उत्पादन में हिस्सेदारी आदि को लेकर बातचीत और एक सहमति बनी थी.

इसके बाद साल दर साल बैठकों, चिट्ठियों का आदान-प्रदान होता रहा. इस बीच सितंबर 2016 में नरेंद्र मोदी सरकार ने इस मुद्दे को सुलझाने के लिए एक त्रिपक्षीय बैठक बुलाई. जिसमें ओडिशा के तत्कालीन मुख्यमंत्री नवीन पटनायक और छत्तीसगढ़ के तत्कालीन मुख्यमंत्री रमन सिंह शामिल हुए. बैठक की अध्यक्षता तत्कालीन केंद्रीय जल संसाधन मंत्री उमा भारती ने की थी. पटनायक सरकार ने केंद्र पर छत्तीसगढ़ का पक्ष लेने का आरोप लगाया, जहां तब BJP की सरकार थी. BJD ने इस समस्या के कानूनी समाधान पर जोर दिया और विवाद के निपटारे के लिए एक ट्रिब्यूनल गठित करने की मांग की. जिस पर केंद्र सरकार ने खास ध्यान नहीं दिया. 

इसी बीच दिसंबर 2016 में यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. तत्कालीन BJD सरकार ने अनुच्छेद 131 के तहत मूल वाद दायर कर अंतर्राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956 के तहत ट्रिब्यूनल की मांग करते हुए छत्तीसगढ़ को नदी पर बैराज बनाने से रोकने के लिए निषेधाज्ञा (Injunction) की मांग की. जनवरी 2018 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा केंद्र को एक महीने के भीतर ट्रिब्यूनल गठित करने के निर्देश दिया गया. इसे BJD ने नैतिक जीत बताते हुए पटनायक ने कहा कि इससे ओडिशा सरकार के रुख की पुष्टि होती है. दूसरी ओर, छत्तीसगढ़ 1983 में ओडिशा और मध्य प्रदेश के बीच हुए समझौते के अनुरूप नदी पर परियोजनाओं की निगरानी के लिए संयुक्त नियंत्रण बोर्ड (JCB) के पक्ष में था. 

इसके बाद मार्च 2018 में केंद्र ने तीन सदस्यीय महानदी जल विवाद न्यायाधिकरण का गठन किया, जिसके अध्यक्ष तत्कालीन सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस ए.एम. खानविलकर थे. इस पैनल को कई बार विस्तार मिला है. ताजा विस्तार अप्रैल 2026 तक का है. मार्च 2024 में खानविलकर के इस्तीफे के बाद, वर्तमान में इस समिति की अध्यक्षता  जस्टिस बेला त्रिवेदी कर रही हैं. 

फिलहाल ओडिशा और छत्तीसगढ़ की सरकारों का रुख क्या है?

इस विवाद के बीच एक सवाल ये उठ रहा है कि ओडिशा में BJP की सरकार के आने के बाद क्या राज्य सरकार के रुख में बदलाव आया है. दरअसल समस्या के सौहार्दपूर्ण समाधान के अपने पुराने रुख पर कायम रहते हुए मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने पिछले जुलाई में छत्तीसगढ़ के सीएम विष्णु देव साय को “परस्पर लाभकारी समझौते” के लिए पत्र लिखा था. साय को लिखे पत्र में सीएम मोहन माझी ने प्रस्ताव रखा था कि केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय के मार्गदर्शन में केंद्रीय जल आयोग (CWC) के नेतृत्व में दोनों राज्यों की एक संयुक्त समिति गठित की जाए. इस समिति में ओडिशा और छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ तकनीकी अधिकारी शामिल हों और इसका उद्देश्य निरंतर संवाद और तकनीकी वार्ता के जरिए परस्पर लाभकारी समाधान तक पहुंचना होगा.

इस संभावित लाभकारी समझौते को अंजाम तक पहुंचाने के लिए माझी सरकार ने उपमुख्यमंत्री के.वी. सिंह देव की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय समिति भी बनाई है. इस पैनल को विवाद सुलझाने में सरकार का मार्गदर्शन करने की जिम्मेदारी दी गई है. यह भी तय किया गया कि लगभग 31 जनवरी के आसपास एक टीम छत्तीसगढ़ जाकर इस मुद्दे पर बातचीत करेगी. जवाब में छत्तीसगढ़ के सीएम साय ने कहा कि प्रस्ताव “सतत विचाराधीन” है. 

मोहन माझी का दावा इसलिए भी सवालों के घेरे में है, कि वे पानी के घटते प्रवाह को लेकर छत्तीसगढ़ के सीएम के सामने किसी तरह का दबाव नहीं बना पा रहे हैं. जबकि नवीन पटनायक की सरकार के समय साल 2016-17 में इसको लेकर कुछ आंकड़े जारी किए गए थे. दावा किया गया था कि पिछले 10 सालों के औसत तुलना में गैर-मानसून दिनों में ओडिशा के इलाकों में महानदी के जल प्रवाह में नवंबर 2016 में 41.1 फीसदी, दिसंबर 2016 में 32.9 फीसदी, जनवरी 2017 में 30.9 फीसदी, फरवरी 2017 में 39.2 फीसदी, मार्च 2017 में 27.6 फीसदी, अप्रैल 2017 में 73 फीसदी और मई 2017 में 77.8 फीसदी कमी पाई गई. 

महानदी कितनी महत्वपूर्ण है?

महानदी, देश का आठवां बड़ा रिवर बेसिन है. इसका कुल जलग्रहण या अपवाह क्षेत्र 139681.51 वर्ग किलोमीटर है. यह देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का लगभग 4.28 फीसदी है. साल 2011 की जनगणना के अनुसार छत्तीसगढ़ के महानदी नदी घाटी इलाके में लगभग 30 लाख की आबादी निवास करती है, जिसकी आजीविका खेती पर निर्भर है और ज़ाहिर तौर पर खेती के लिए उनकी निर्भरता इसी महानदी के पानी पर है. महानदी का कुल 52.42 फीसदी हिस्सा (73214.52 वर्ग किलोमीटर) छत्तीसगढ़ में है, वहीं 47.14 फीसदी हिस्सा (65847.28 वर्ग किलोमीटर) ओडिशा, 0.23 फीसदी (322.38 वर्ग किलोमीटर) महाराष्ट्र, 0.11 फीसदी (151.78 वर्ग किलोमीटर) मध्यप्रदेश और 0.1 फीसदी हिस्सा (145.56 वर्ग किलोमीटर) झारखंड में है. 

इसमें दो राज्य छत्तीगढ़ और ओडिशा दोनों के लिए ही यह नदी सबसे बड़ी जीवनदायी है. इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि महानदी पर 253 बांध, 14 बैराज, 13 एनिकट और 6 बिजली संयंत्र बने हुए हैं. इसी महानदी पर छत्तीसगढ़ के कोरबा में 87 मीटर ऊंचा मिनीमाता हसदेव बांगो बांध बना हुआ है, वहीं ओडिशा में 4800 मीटर की लंबाई वाला हीराकुंड बांध बना हुआ है. दोनों राज्यों की बड़ी आबादी खेती-बाड़ी से लेकर पेयजल तक के लिए महानदी पर निर्भर है. छत्तीसगढ़ की अधिकांश बिजली परियोजनाओं से लेकर कई बड़े उद्योग भी इसी महानदी के भरोसे हैं. 

दोनों राज्यों के अपने दावे हैं, फिलहाल दोनों के दावे अपनी जनता के हितों के मद्देनजर स्वभाविक नजर आते हैं. पहले इसे दो राज्यों के साथ दो दलों की लड़ाई के रूप में भी देखा गया. अब जबकि दोनों राज्यों और केंद्र में भी BJP की सरकार है, ऐसे में उम्मीद यही की जा रही है कि जल्द से जल्द महानदी मामले का न्यायसंगत समाधान हो, ताकि दोनों ही राज्य के लोग जो कि इस देश के नागरिक हैं, उन्हें जल संकट से न गुजरना पड़े. 

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