मध्य प्रदेश में बाघों की मौत का आंकड़ा तेजी से क्यों बढ़ रहा है?

पिछले साल रिकॉर्ड 55 मौतों के बाद, 2026 में अब तक 11 और बाघों की मौत की खबर है. इसके चलते हाईकोर्ट में एक PIL दायर की गई है

मध्य प्रदेश में बाघों की संख्या तेज़ी से घट रही है
मध्य प्रदेश में 'प्रोजेक्ट टाइगर' शुरू होने के बाद पिछले साल सबसे ज्यादा बाघों की मौत हुई

भारत का 'टाइगर स्टेट' कहे जाने वाले मध्य प्रदेश ने पिछले साल रिकॉर्ड संख्या में बाघों की मौत झेली. यह दुखद सिलसिला 2026 में भी जारी है. पिछली गिनती में मध्य प्रदेश में 785 बाघ थे, जिसके नतीजे 2023 में सार्वजनिक किए गए थे. 2025 में राज्य ने 55 बाघ खो दिए, जो इसके इतिहास में अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा है.

इस साल जनवरी-फरवरी में 11 और बाघों की मौत की खबर है. बाघों की जान किसने ली? 2025 में हुई 55 मौतों में से 16 शिकार के मामले थे: 11 बाघ मृत पाए गए और बाकी पांच मामलों में बाघ की खालें बरामद की गईं.

इस साल, 11 मौतों में से पांच को पोचिंग का मामला घोषित किया गया है. बाघों के शिकार का सबसे आम तरीका करंट लगाना लगता है. खेतों के चारों ओर या जंगलों में जानवरों के रास्तों पर बिजली के तार बांध दिए जाते हैं. कई बार स्थानीय लोग मांस के लिए शाकाहारी जानवरों को मारने के इरादे से ऐसा करते हैं. लेकिन अक्सर इसका शिकार बाघ बन जाते हैं. अधिकारियों की कार्रवाई के डर से अपराधी आमतौर पर शव को छिपाने की कोशिश करते हैं.

मौतों के इस बड़े आंकड़े से चिंतित होकर, वाइल्डलाइफ एक्टिविस्ट अजय दुबे ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट, जबलपुर में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की है. दुबे ने कहा, "1973 में 'प्रोजेक्ट टाइगर' शुरू होने के बाद से, मध्य प्रदेश में बाघों की मौत का यह (2025) एक साल का सबसे बड़ा आंकड़ा है. कोई जवाबदेही तय न होने की वजह से ऐसी मौतें लगातार हो रही हैं. इस PIL का मकसद जिम्मेदारी तय करना है."

दुबे ने दावा किया कि कोर्ट में केस चलने के बावजूद, वन विभाग कार्रवाई और कोशिश के सबूत के तौर पर कोर्ट में सिर्फ बिजली कंपनी को लिखे गए लेटर जमा कर रहा है. दुबे ने मांग की, "जंगलों के आसपास बिजली के तारों के गलत इस्तेमाल को लेकर कुछ ठोस किया जाना चाहिए."

दूसरी तरफ, बाघों में प्राकृतिक मौत का सबसे आम कारण आपसी लड़ाई है. मध्य प्रदेश के चीफ वाइल्डलाइफ वार्डन शुभरंजन सेन ने कहा, "हमारे पिछले सात सालों के एनालिसिस में, 40 प्रतिशत बाघों की मौतें आपसी लड़ाई की वजह से हुई हैं." भोपाल से लगभग 60 किमी दूर रातापानी टाइगर रिजर्व के बुधनी घाट सेक्शन में ट्रेनों से टकराना भी मौत का एक और बड़ा कारण है. बांधवगढ़ और कान्हा जैसे कुछ रिजर्व में बाघों की आपसी लड़ाई ज्यादा थी. अब पन्ना, पेंच और सतपुड़ा टाइगर रिजर्व से भी इनफाइटिंग के मामले सामने आने लगे हैं. सेन ने कहा, "पन्ना, पेंच और कान्हा में बाघों की संख्या बढ़ी है. एक ताकतवर नर बाघ आमतौर पर किसी नए नर को अपने इलाके में घुसने नहीं देता, और फिर लड़ाई शुरू हो जाती है. बाघिनों के बीच भी लड़ाई की खबरें आती हैं क्योंकि वे भी अपने इलाके को लेकर काफी सुरक्षात्मक होती हैं."

आपसी लड़ाई को कंट्रोल करने के लिए, वन विभाग टाइगर रिजर्व के बीच 'कॉरिडोर' को सुरक्षित करने के प्लान पर काम कर रहा है; हालांकि इस कोशिश को अब तक सीमित कामयाबी ही मिली है. इसका एक रास्ता यह है कि रहने की जगह बढ़ाने के लिए और ज्यादा टाइगर रिजर्व, सेंचुरी और नेशनल पार्क बनाए जाएं, लेकिन इसकी अपनी अलग चुनौतियां हैं. सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में राज्यों से रिजर्व की 'कैरिंग कैपेसिटी' यानी वह क्षमता तय करने को कहा है कि एक हैबिटेट कितने बाघों का बोझ उठा सकता है. मध्य प्रदेश के वन विभाग ने देहरादून स्थित 'वाइल्डलाइफ इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया' से इस पहलू पर काम करने को कहा है.

Read more!