लखनऊ बड़े जल संकट की दहलीज पर; कैसे बिगड़े हालात?
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की सख्ती और सेंट्रल ग्राउंड वॉटर अथॉरिटी की ताजा रिपोर्ट से इशारा मिल रहा है कि लखनऊ बड़े जल संकट की तरफ बढ़ रहा है

लखनऊ के भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी इकाना क्रिकेट स्टेडियम पर 22 अप्रैल 2026 की एक सुनवाई ने सिर्फ खेल प्रशासन को नहीं, बल्कि पूरे शहर की जल-हकीकत को कटघरे में खड़ा कर दिया. नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने स्टेडियम प्रशासन से साफ जवाब मांगा कि भूजल दोहन पर पहले दिए गए आदेशों का पालन क्यों नहीं हुआ.
चेतावनी भी कड़ी थी- अगर जवाब संतोषजनक नहीं हुआ तो गतिविधियों पर रोक तक लग सकती है. यह मामला सिर्फ एक स्टेडियम तक सीमित नहीं है; यह उस बड़े संकट का प्रतीक है, जिसमें लखनऊ जैसे तेजी से फैलते शहर अपने ही जलस्रोतों को खामोशी से खत्म कर रहे हैं.
NGT की टिप्पणी ने एक बुनियादी सवाल खड़ा किया है. क्या शहर की बढ़ती ज़रूरतें भूजल पर इतना दबाव डाल चुकी हैं कि अब नियमन और विकल्पों के बिना स्थिति संभालना मुश्किल हो गया है? स्टेडियमों को वर्षा जल संचयन और उपचारित जल के उपयोग की सलाह दरअसल एक संकेत है कि पारंपरिक निर्भरता अब टिकाऊ नहीं रही. यही स्थिति शहर के रिहायशी इलाकों, कॉलोनियों और नई विकसित बस्तियों में भी अलग-अलग रूपों में दिखाई दे रही है.
पिछले एक दशक में लखनऊ में भूजल स्तर लगातार नीचे खिसकता गया है. आज शहर के कई हिस्सों में पानी 180 से 200 फीट की गहराई पर ही मिल रहा है, और कुछ जगहों पर यह इससे भी नीचे जा चुका है. यह बदलाव सिर्फ तकनीकी नहीं है, बल्कि सामाजिक और आर्थिक भी है क्योंकि पानी तक पहुंच अब पहले जितनी आसान या सस्ती नहीं रही.
शहर के अलग-अलग इलाकों की तस्वीर एक जैसी नहीं है, लेकिन रुझान साफ है. महानगर और जेल रोड जैसे पुराने, घनी आबादी वाले हिस्सों में भूजल स्तर ज़मीन से 43 से 45 मीटर नीचे दर्ज किया गया है. वहीं फैजुल्लागंज और इंदिरा नगर के कुछ हिस्सों में यह 35 से 42 मीटर के बीच है. माधोपुर में यह 100 फीट से गिरकर 110 फीट तक पहुंच चुका है. पुराने इलाकों- अलीगंज, चौक और अमीनाबाद में पानी अब लगभग 160 फीट की गहराई पर मिलता है.
इसके उलट, अपेक्षाकृत नए इलाकों की स्थिति थोड़ी बेहतर है. गोमती नगर में भूजल स्तर 100 से 115 फीट के बीच है, जबकि गोमती नगर एक्सटेंशन और वृंदावन योजना जैसे क्षेत्रों में यह 50 से 65 फीट के बीच दर्ज किया गया है. यह अंतर सिर्फ भौगोलिक नहीं है; यह शहरीकरण के पैटर्न और कंक्रीट के फैलाव की कहानी भी बताता है.
भूजल विभाग के सहायक अभियंता आदित्य पांडे इस पैटर्न को सीधे शब्दों में समझाते हैं कि इलाका जितना पुराना और कंक्रीट से ढका होगा, भूजल उतना ही नीचे जाएगा. दरअसल, पुराने इलाकों में खुली ज़मीन लगभग खत्म हो चुकी है. बारिश का पानी जमीन में रिसने के बजाय सीधे नालियों में बह जाता है, जिससे एक्विफर तक पानी पहुंच ही नहीं पाता. यह दबाव ज़ोन-वार भी अलग-अलग रूप में दिखता है. लखनऊ के ज़ोन 3, जिसमें अलीगंज, जानकीपुरम और डालीगंज आते हैं, वहां भूजल स्तर में तेज़ उतार-चढ़ाव दर्ज किया गया है. अधिकारी बताते हैं कि पिछले साल कुछ इलाकों में पानी 240 से 260 फीट तक नीचे चला गया था. हालांकि जानकीपुरम में यह अभी 160 फीट के आसपास है, जिसे “संभालने लायक” कहा जा सकता है, लेकिन यह स्थाई समाधान नहीं है.
असल समस्या यह है कि पानी मिलने की गहराई और पानी की गुणवत्ता दोनों अलग-अलग चीजें हैं. जैसे-जैसे ऊपरी जलस्तर खत्म होता जाता है, नीचे का पानी अक्सर खारा या दूषित होता जाता है. ऐसे में साफ पानी पाने के लिए और गहराई तक खुदाई करनी पड़ती है, जिससे लागत बढ़ती है और संसाधन पर दबाव भी. इसका असर सीधे आम लोगों पर पड़ रहा है. जानकीपुरम में रहने वाले नीरज सिंह ने 2025 में अपने बोरवेल की गहराई 160 फीट से बढ़ाकर 180 फीट कर दी, और उन्हें लगता है कि जल्द ही इसे और बढ़ाना पड़ेगा.
फैजुल्लागंज में कई परिवार बार-बार पंप खराब होने के कारण टैंकरों पर निर्भर हो गए हैं, जो महंगा और अस्थिर विकल्प है. चिनहट में एक बोरवेल, जिसे 2023 में 180 फीट तक खोदा गया था, दो साल के भीतर ही सूख गया. इसे दोबारा 200 फीट तक गहरा करने पर ही पानी मिला. यह उदाहरण बताता है कि भूजल स्तर में गिरावट कितनी तेज़ और अनिश्चित हो चुकी है. लखनऊ के जानकीपुरम विस्तार और पेपर मिल कॉलोनी जैसे इलाकों में कई-कई दिनों तक पानी की सप्लाई ठप रहने की शिकायतें आम हो गई हैं. यहां समस्या सिर्फ भूजल की नहीं, बल्कि जर्जर हो चुके इंफ्रास्ट्रक्चर की भी है. 25-30 साल पुराने ट्यूबवेल अब अपनी क्षमता खो रहे हैं, और बढ़ती आबादी के साथ यह सिस्टम दबाव नहीं झेल पा रहा.
भूजल स्तर में गिरावट का एक बड़ा कारण अनियंत्रित निजी बोरवेल भी हैं. शहर में ऐसे बोरवेल की संख्या और उनकी गहराई पर कोई ठोस निगरानी नहीं है. इसका मतलब है कि हर व्यक्ति अपनी जरूरत के हिसाब से पानी निकाल रहा है, लेकिन यह नहीं देख रहा कि सामूहिक रूप से यह कितना नुकसान कर रहा है. अगर आंकड़ों की बात करें, तो 2025 के आकलन के अनुसार लखनऊ में भूजल दोहन 66 फीसदी से अधिक हो चुका है, जो “सेमी-क्रिटिकल” सीमा के बेहद करीब है. इसका मतलब है कि शहर जितना पानी निकाल रहा है, वह प्राकृतिक रूप से उतना वापस नहीं भर पा रहा. मलिहाबाद जैसे इलाकों में यह स्तर 70 फीसदी के पार जा चुका है, जो चेतावनी की घंटी है.
इस बीच, सेंट्रल ग्राउंड वॉटर अथॉरिटी (CGWA) की ताजा रिपोर्ट ने इस संकट को और गंभीर बना दिया है. रिपोर्ट में बताया गया है कि हाउसिंग, कमर्शियल कॉम्प्लेक्स और इंडस्ट्रीज़ द्वारा बड़े पैमाने पर अवैध रूप से भूजल निकाला जा रहा है. नियम मौजूद हैं, लेकिन उनका पालन कमजोर है. NGT ने इस रिपोर्ट पर संज्ञान लेते हुए साफ कहा कि कई राज्यों में भूजल का अत्यधिक दोहन हो रहा है और पर्यावरण मुआवज़े के नियमों को ठीक से लागू नहीं किया जा रहा. उत्तर प्रदेश में 111 बोरवेल सील किए गए हैं और 5.57 करोड़ रुपए का जुर्माना लगाया गया है, लेकिन यह कार्रवाई समस्या के आकार के मुकाबले अभी भी सीमित है.
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए NGT ने एक उच्च-स्तरीय विशेषज्ञ समिति का गठन किया है, जिसमें नेशनल जियोफिज़िकल रिसर्च इंस्टीट्यूट (NGRI), जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया (GSI), भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रुड़की और पर्यावरण मंत्रालय के प्रतिनिधि शामिल हैं. इस समिति को तीन महीने में रिपोर्ट देकर समाधान सुझाने को कहा गया है.
हालांकि यह संकट अचानक नहीं आया है. पिछले एक दशक में लखनऊ और यूपी के दूसरे बड़े शहरों का शहरी क्षेत्र 20-30 फीसदी तक बढ़ा है. नई कॉलोनियां, सड़कें, कॉम्प्लेक्स- इन सबने जमीन को कंक्रीट से ढक दिया है. पहले जहां बारिश का पानी जमीन में रिसता था, अब वह सीधे नालियों में बह जाता है. यही वजह है कि शहर का जल संतुलन बिगड़ गया है। एक तरफ पानी की मांग लगातार बढ़ रही है, दूसरी तरफ उसका प्राकृतिक स्रोत सिकुड़ रहा है. इस असंतुलन का सीधा असर भूजल स्तर पर पड़ रहा है.
इकाना स्टेडियम का मामला इस बड़े संकट की एक झलक भर है. अगर बड़े संस्थान ही नियमों का पालन नहीं करते, तो आम लोगों से उम्मीद करना मुश्किल हो जाता है. लेकिन इसका उल्टा भी सच है-अगर ऐसे संस्थान उदाहरण पेश करें, तो बदलाव की शुरुआत हो सकती है.