लखनऊ में हर 15 घंटे में गायब हो रही एक बेटी!
लखनऊ में छह महीने में 261 नाबालिग लड़कियां लापता हुईं. 227 बरामद हो चुकी हैं लेकिन 34 अब भी गायब हैं. हाईकोर्ट की सख्ती के बाद चर्चा में आया मुद्दा

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ को प्रदेश का सबसे सुरक्षित शहर माना जाता है. यहां आधुनिक पुलिसिंग है, हजारों सीसीटीवी कैमरे हैं, महिला सुरक्षा के लिए विशेष अभियान चलाए जाते हैं और स्मार्ट निगरानी व्यवस्था पर लगातार जोर दिया जाता है.
लेकिन इन्हीं दावों के बीच सामने आए आधिकारिक आंकड़ों ने एक ऐसा सवाल खड़ा कर दिया है जिसे नजरअंदाज करना मुश्किल है. आखिर राजधानी में नाबालिग लड़कियां इतनी बड़ी संख्या में क्यों गायब हो रही हैं?
पुलिस के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 1 जनवरी से 8 जून 2026 के बीच लखनऊ कमिश्नरेट क्षेत्र में 261 नाबालिग लड़कियों के अपहरण, बहला-फुसलाकर ले जाने अथवा लापता होने की सूचना दर्ज हुई. इसका अर्थ है कि साल के पहले 159 दिनों में औसतन हर दिन 1.64 नाबालिग लड़कियां गायब हुईं. दूसरे शब्दों में कहें तो लगभग हर 14 से 15 घंटे में एक लड़की लापता हुई. यह आंकड़ा केवल अपराध का नहीं बल्कि समाज, परिवार, प्रशासन और सुरक्षा व्यवस्था के सामने खड़े एक गंभीर संकट का संकेत देता है. यही वजह है कि मामला अब इलाहाबाद हाई कोर्ट की निगरानी तक पहुंच गया है.
अदालत की चिंता और पुलिस पर बढ़ता दबाव
लापता नाबालिग लड़कियों का मुद्दा तब और गंभीर हो गया जब 10 जून को इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ में इस संबंध में सुनवाई हुई. जस्टिस प्रवीण कुमार गिरी के सामने दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका की सुनवाई के दौरान पुलिस कमिश्नर और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करना पड़ा. अदालत के सामने रखे गए आंकड़ों से पता चला कि 261 मामलों में से 227 लड़कियों को बरामद कर लिया गया है जबकि 34 लड़कियां अब भी लापता हैं.
कोर्ट ने इन 34 मामलों पर विशेष चिंता व्यक्त करते हुए पुलिस कमिश्नर को विस्तृत प्रगति रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया. अदालत ने सिर्फ रिपोर्ट मांगकर अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं की बल्कि न्यायिक अधिकारियों को भी जांच की निगरानी करने के निर्देश दिए. साथ ही साफ कहा गया कि अगर किसी स्तर पर लापरवाही पाई जाती है तो संबंधित पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी. दरअसल अदालत का फोकस केवल आंकड़ों पर नहीं बल्कि उन परिवारों पर है जिनकी बेटियां महीनों से घर नहीं लौटी हैं. एक लापता बच्ची सिर्फ पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज एक संख्या नहीं होती, बल्कि उसके पीछे एक पूरा परिवार होता है जो हर दिन उम्मीद और भय के बीच जीता है.
बरामदगी का आंकड़ा राहत देता है लेकिन सवाल भी उठाता है
पुलिस का कहना है कि 261 में से 227 लड़कियों को खोजकर उनके परिवारों को सौंप दिया गया है. यह लगभग 87 प्रतिशत रिकवरी रेट है. पहली नजर में यह उपलब्धि प्रतीत होती है और निश्चित रूप से उन परिवारों के लिए राहत भी है जिनकी बेटियां सुरक्षित वापस लौट आईं. लेकिन आंकड़ों का दूसरा पक्ष अधिक चिंताजनक है.
अगर छह महीनों में 261 नाबालिग लड़कियां गायब हुईं तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए अपनाए जा रहे उपाय कितने प्रभावी हैं. लखनऊ के मानवाधिकार कार्यकर्ता आनंद पांडेय कहते हैं, “किसी भी सुरक्षा तंत्र की सफलता केवल अपराध के बाद की कार्रवाई से नहीं मापी जाती. असली कसौटी यह होती है कि वह अपराध को होने से पहले कितना रोक पाता है. इसी लिहाज से देखें तो लखनऊ के आंकड़े एक गंभीर चुनौती की ओर इशारा करते हैं.” हर महीने औसतन 43 लड़कियों का लापता होना हर सप्ताह लगभग 10 मामले सामने आना और हर 15 घंटे में एक लड़की का गायब होना बताता है कि समस्या कहीं अधिक गहरी है.
लखनऊ पुलिस की तरफ से अदालत में प्रस्तुत जोनवार आंकड़ों ने भी कुछ महत्वपूर्ण संकेत दिए हैं. सबसे अधिक लंबित मामले पूर्वी जोन में पाए गए हैं. यहां 10 लड़कियां अब भी लापता हैं. इसके बाद दक्षिणी जोन में सात, पश्चिमी और उत्तरी जोन में छह-छह तथा केंद्रीय जोन में पांच मामले लंबित हैं.
पूर्वी जोन का नाम सबसे ऊपर आना कई सवाल खड़े करता है. यह क्षेत्र तेजी से विकसित हो रहे आवासीय इलाकों, नई बस्तियों और बढ़ती आबादी वाला हिस्सा है. विशेषज्ञ मानते हैं कि शहरी विस्तार के साथ सामाजिक निगरानी कमजोर पड़ती है और अपराधियों को अवसर मिलते हैं. हालांकि पुलिस का कहना है कि प्रत्येक लंबित मामले के लिए अलग-अलग टीमें बनाई गई हैं और वरिष्ठ अधिकारी व्यक्तिगत रूप से निगरानी कर रहे हैं. इसके बावजूद आंकड़े बताते हैं कि कुछ क्षेत्रों में समस्या अपेक्षाकृत अधिक गंभीर है.
आखिर क्यों गायब हो रही हैं लड़कियां?
नाबालिग लड़कियों के लापता होने के पीछे एक ही कारण नहीं होता. पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज मामलों का विश्लेषण करने वाले विशेषज्ञ बताते हैं कि इनमें कई प्रकार की परिस्थितियां शामिल होती हैं. कुछ मामलों में किशोरावस्था के दौरान घर छोड़ने की घटनाएं होती हैं. कुछ में प्रेम संबंधों के चलते बच्चियां घर से चली जाती हैं. कई मामलों में बहला-फुसलाकर ले जाने या अपहरण के आरोप सामने आते हैं. वहीं कुछ मामलों में मानव तस्करी और संगठित अपराध के नेटवर्क भी भूमिका निभाते हैं.
पिछले कुछ वर्षों में एक नया खतरा तेजी से उभरा है. यह खतरा डिजिटल दुनिया से जुड़ा है. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, ऑनलाइन गेमिंग, चैट एप्लिकेशन और फर्जी डिजिटल पहचान के जरिए किशोरियों को प्रभावित करने के मामले बढ़े हैं. आनंद पांडेय का कहना है कि अब अपराधी केवल सड़कों या सार्वजनिक स्थानों पर सक्रिय नहीं हैं, बल्कि मोबाइल फोन के जरिए सीधे बच्चों तक पहुंच बना रहे हैं. कई बार दोस्ती, नौकरी, विवाह या बेहतर जीवन के झूठे सपनों के जरिए किशोरियों को घर से बाहर निकलने के लिए प्रेरित किया जाता है. हाइकोर्ट में क्रिमिनल मामलों के एडवोकेट अभिनव सिंह बताते हैं, “लखनऊ तेजी से बढ़ता महानगर है. नई कॉलोनियां, बढ़ती आबादी, छात्र-छात्राओं की बड़ी संख्या और डिजिटल जीवनशैली ने शहर की सामाजिक संरचना को बदल दिया है. ऐसे में बच्चों और किशोरियों की सुरक्षा के पुराने तरीके पर्याप्त नहीं रह गए हैं.”
बाल अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि किसी भी नाबालिग के लापता होने के बाद शुरुआती 24 से 72 घंटे सबसे महत्वपूर्ण होते हैं. अगर इस दौरान बच्ची का पता नहीं चलता तो उसके सामने कई गंभीर खतरे खड़े हो सकते हैं. मानव तस्करी, यौन शोषण, बाल श्रम, जबरन विवाह और साइबर अपराध से जुड़े गिरोह अक्सर ऐसे बच्चों को निशाना बनाते हैं. यही कारण है कि हर लंबित मामला प्रशासन के लिए चिंता का विषय होना चाहिए. 34 बच्चियों का अब तक नहीं मिलना इसीलिए गंभीर माना जा रहा है क्योंकि समय बीतने के साथ उनकी सुरक्षा को लेकर आशंकाएं भी बढ़ती जाती हैं. परिवारों के लिए यह दौर और भी कठिन होता है. उन्हें न तो यह पता होता है कि बच्ची कहां है और न ही यह कि वह किस स्थिति में है. कई परिवार महीनों तक पुलिस स्टेशनों के चक्कर लगाते रहते हैं.
पुलिस की रणनीति और तकनीकी निगरानी
लखनऊ पुलिस का दावा है कि लापता नाबालिगों की तलाश के लिए उपलब्ध सभी संसाधनों का उपयोग किया जा रहा है. पुलिस अधिकारियों के अनुसार जांच में मोबाइल ट्रैकिंग, सीसीटीवी फुटेज, सोशल मीडिया मॉनिटरिंग, डिजिटल फुटप्रिंट विश्लेषण और अंतरराज्यीय समन्वय का सहारा लिया जा रहा है. इसके अलावा मुखबिर नेटवर्क को भी सक्रिय किया गया है. प्रत्येक जोन में विशेष टीमें बनाई गई हैं जो केवल ऐसे मामलों पर काम कर रही हैं. वरिष्ठ अधिकारियों की नियमित समीक्षा बैठकें भी की जा रही हैं. लखनऊ में डीसीपी पूर्वी दीक्षा शर्मा ने अदालत को बताया कि सभी मामलों में मानक संचालन प्रक्रिया का पालन किया जा रहा है और प्रत्येक लंबित मामले की निगरानी वरिष्ठ स्तर पर की जा रही है. पुलिस का यह भी कहना है कि अधिकांश मामलों में बच्चियों को सुरक्षित बरामद कर लिया गया है और शेष मामलों में भी लगातार कार्रवाई जारी है.
विशेषज्ञ मानते हैं कि लापता बच्चों की समस्या का समाधान केवल पुलिसिंग से संभव नहीं है. यह सामाजिक, पारिवारिक और तकनीकी आयामों से जुड़ा हुआ विषय है. महिला अधिकार के लिए आवाज उठाने वाली कार्यकर्ता सुमन रावत कहती हैं, “आज अधिकांश किशोरों के हाथ में स्मार्टफोन है. वे सोशल मीडिया के माध्यम से सैकड़ों लोगों से जुड़े होते हैं. कई बार अभिभावकों को यह भी नहीं पता होता कि उनका बच्चा किन लोगों के संपर्क में है.”
स्कूलों में साइबर सुरक्षा और डिजिटल जागरूकता को लेकर पर्याप्त प्रशिक्षण नहीं है. परिवारों में संवाद की कमी भी एक बड़ा कारण बन रही है. कई किशोरियां अपनी समस्याएं परिवार के साथ साझा नहीं कर पातीं और बाहरी लोगों के प्रभाव में आ जाती हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समाज इस समस्या को केवल कानून-व्यवस्था का विषय मानकर देखेगा तो समाधान अधूरा रहेगा. इसके लिए स्कूलों, अभिभावकों, स्थानीय समुदायों और सामाजिक संस्थाओं को भी सक्रिय भूमिका निभानी होगी.