बाल गंगाधर तिलक के रिश्तेदार और राहुल के करीबी रहे रोहित छोड़ेंगे कांग्रेस!

ऐसा कहा जा रहा है कि तिलक परिवार के ट्रस्ट ने PM नरेंद्र मोदी को लोकमान्य तिलक नेशनल अवॉर्ड दिया था, जिसके बाद से ही कांग्रेस के साथ रोहित के संबंध खराब हुए

रोहित तिलक (फाइल फोटो)
रोहित तिलक (फाइल फोटो)

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक को राष्ट्रवादी आंदोलन का पहला जननेता कहा जाता है. इतना ही नहीं भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सामाजिक व राजनीतिक आधार को व्यापक रूप से मजबूत करने में उनकी अहम भूमिका रही थी. हालांकि, एक विडंबना यह है कि उनके वंशज रोहित तिलक अब कांग्रेस पार्टी छोड़कर महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल हो रहे हैं.

रोहित तिलक, जयंतराव तिलक के पोते हैं. जयंतराव तिलक लोकमान्य तिलक के पोते थे. जयंतराव कांग्रेस से दो बार राज्यसभा सांसद चुने गए, महाराष्ट्र में मंत्री रहे तथा रिकॉर्ड 16 साल तक महाराष्ट्र विधान परिषद के अध्यक्ष रहे. अपनी चतुरई और हाजिरजवाबी के लिए प्रसिद्ध जयंतराव तिलक एक पत्रकार, लेखक और 'केसरी' अखबार के संपादक भी थे.

'केसरी' अखबार को पाक्षिक से दैनिक समाचार पत्र में परिवर्तित करने का श्रेय मुख्य रूप से जयंतराव तिलक को ही जाता है. रोहित तिलक महाराष्ट्र से राज्यसभा चुनाव के लिए एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के अप्रत्याशित उम्मीदवार थे. हालांकि, विपक्षी महा विकास अघाड़ी (MVA) ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार गुट) के अध्यक्ष शरद पवार को उम्मीदवार बनाया. इसके बाद ही शिवसेना ने अंतिम समय में रोहित तिलक को उम्मीदवार नहीं बनाने का फैसला किया. यही कारण है कि वे संसद के उच्च सदन में पहुंचने से चूक गए.

रोहित तिलक केसरी-मराठा ट्रस्ट के महाप्रबंधक होने के साथ-साथ पुणे स्थित तिलक महाराष्ट्र विद्यापीठ के कुलपति (अध्यक्ष) भी हैं. रोहित ने इंडिया टुडे को बताया कि कांग्रेस के साथ उनका मतभेद तब शुरू हुआ, जब तिलक स्मारक मंदिर ट्रस्ट ने अगस्त 2023 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को प्रतिष्ठित लोकमान्य तिलक राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित करने का फैसला किया.

उन्होंने कहा, "कांग्रेस पार्टी ने इसे गलत तरीके से लिया और मेरे खिलाफ नेतृत्व से कई शिकायतें की गईं." रोहित तिलक ने आगे कहा, "यह समझाने के बावजूद कि यह उनका निजी फैसला नहीं, बल्कि ट्रस्ट का सर्वसम्मति से लिया गया फैसला था, स्थिति वैसी ही बनी रही." उन्होंने कहा, "मैंने आखिरकार दो साल पहले पार्टी के लिए काम करना छोड़ दिया. मैं संकीर्ण सोच के साथ काम नहीं करना चाहता था. मैं व्यापक दृष्टिकोण के साथ काम करना चाहता था."

रोहित ने बताया कि उनके परिवार के कांग्रेस से राजनीतिक जुड़ाव होने के बावजूद ट्रस्ट ने कई पूर्व प्रधानमंत्रियों जैसे इंदिरा गांधी और मनमोहन सिंह, पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी और पवार को यह पुरस्कार दिया है.

बतौर रोहित, 1983 में पुरस्कार की घोषणा के बाद इसे पाने वालों में कांग्रेस के वैचारिक विरोधी भी शामिल रहे हैं, जैसे कि दिग्गज समाजवादी नेता एस.एम. जोशी (1983), मधु लिमये (1990), कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) की नेता और लेखिका गोदावरी उर्फ ​​गोदुताई परुलेकर (1984), जो मुंबई के पास दहानू में शोषित आदिवासियों के बीच अपने काम के लिए जानी जाती हैं.

इसके अलावा, अटल बिहारी वाजपेयी (1994); और तत्कालीन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक बालासाहेब देवरस (1991) भी इनमें शामिल हैं. राजनीति के अलावा अन्य क्षेत्रों से जिन लोगों को यह पुरस्कार प्रदान किया गया है, उनमें उद्योगपति राहुल बजाज (2000), साइरस पूनावाला (2021), पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन (1995) और वैज्ञानिक और एयरोस्पेस इंजीनियर के. सिवन और टेसी थॉमस शामिल हैं.

विडंबना यह है कि पवार ने ही ट्रस्ट की ओर से मोदी से संपर्क किया था और उनसे पुरस्कार स्वीकार करने का आग्रह किया था.

2004 में रोहित नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (NSUI) के अध्यक्ष बने और बाद में इंडियन यूथ कांग्रेस के नेतृत्व का हिस्सा रहे. वे महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस कमेटी (MPCC) के महासचिव भी थे, जब पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण MPCC के अध्यक्ष थे. आजकल चव्हाण BJP में हैं और राज्यसभा सांसद हैं.

2009 में रोहित तिलक को राहुल गांधी ने पुणे के कस्बा पेठ विधानसभा क्षेत्र से पार्टी का उम्मीदवार बनाया था. इस चुनाव में अनौपचारिक रूप से 'राहुल ब्रिगेड' के नाम से जाने जाने वाले अन्य उम्मीदवारों में प्रशांत ठाकुर (पनवेल), राजीव सातव (कलमनुरी), यशोमती ठाकुर (तेओसा) और नीलेश देशमुख परवेकर (यवतमाल) शामिल थे. हालांकि, रोहित 2009 और 2014 दोनों चुनावों में BJP के गिरीश बापट से हार गए. उन्होंने 2019 के चुनाव में भाग नहीं लिया क्योंकि उनकी बुआ मुक्ता तिलक कस्बा पेठ से BJP की उम्मीदवार थीं.

राजीव सातव और नीलेश देशमुख परवेकर अब इस दुनिया में नहीं हैं, वहीं ठाकुर अब BJP में हैं. जबकि सातव की पत्नी और विधायक डॉ. प्रज्ञा अचानक पार्टी से इस्तीफा देकर BJP में शामिल हो गईं. वहीं, पूर्व मंत्री यशोमती ठाकुर कांग्रेस में हैं, लेकिन 2024 के विधानसभा चुनाव में अपनी सीट से हार गईं.

रोहित ने कहा कि अतीत में अन्य पार्टियों ने भी उनसे संपर्क किया था, लेकिन उन्होंने कांग्रेस के प्रति वफादार रहना चुना. उन्होंने कहा, "मैं पहले भी एकनाथ शिंदे से मिल चुका था और लोकमान्य, जयंतराव और हमारी संस्थाओं से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की थी."

ऐसा माना जाता है कि लोकमान्य के छोटे बेटे और जयंतराव के पिता श्रीधरपंत तिलक सुधारवादी सोच के व्यक्ति थे. अप्रैल 1928 में श्रीधरपंत ने पुणे के गायकवाड़ वाडा स्थित अपने घर में विभिन्न जातियों के लोगों के लिए एक भोज का आयोजन किया.

इसमें डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर, श्रीपतराव शिंदे, के.जी. 'काकासाहेब' लिमये और अन्य प्रतिष्ठित लोग उपस्थित थे, और उस समय इसे एक क्रांतिकारी कदम माना गया था.

श्रीधरपंत ने चतुर्वर्णविध्वंसक समाजसमता संघ की स्थापना की, जिसका उद्देश्य जाति व्यवस्था को खत्म करके समानता स्थापित करना था. पुणे के रूढ़िवादी ब्राह्मणों ने इस कार्यक्रम में बाधा डालने के लिए हर संभव प्रयास किया और यहां तक ​​कि वाडा की बिजली भी काट दी.

हालांकि, केसरी के ट्रस्टियों के साथ लंबे विवाद के बाद, श्रीधरपंत ने 25 मई, 1928 को पुणे में चलती ट्रेन के नीचे कूदकर आत्महत्या कर ली. उन्होंने अपना अंतिम पत्र डॉ. अंबेडकर को लिखा था.

संयोगवश, तिलक परिवार का दक्षिणपंथी राजनीति से गहरा संबंध रहा है. मान्य के निधन के बाद, केसरी ने भी अपने संपादकीय लेखन में हिंदू दक्षिणपंथ की ओर रुख किया.

जयंतराव हिंदू महासभा से जुड़े थे और 1957 में शिवाजीनगर से विधायक चुने गए थे. वे महाराष्ट्र को राज्य का दर्जा देने और मुंबई को राजधानी बनाने के आंदोलन में भी सक्रिय थे. बाद में वे कांग्रेस में शामिल हो गए और पुणे की स्थानीय राजनीति में एक प्रभावशाली व्यक्ति बन गए, जहां उस समय ब्राह्मण समुदाय का दबदबा था.

कांग्रेस में सुरेश कलमाड़ी जैसे नई पीढ़ी के नेताओं के उदय के कारण तिलक परिवार का प्रभाव धीरे-धीरे कम होता गया. 1995 से 1999 तक तत्कालीन शिवसेना-BJP सरकार के दौरान उनके बेटे दीपक तिलक (जिनका 2005 में निधन हो गया) कुछ समय के लिए BJP शामिल हुए थे.

जयंतराव के भाई श्रीकांत की बहू मुक्ता तिलक भी BJP में शामिल हुईं. वह पुणे की महापौर और कस्बा पेठ से विधायक थीं. उनके बेटे कुणाल पुणे में पार्षद हैं. इस प्रकार रोहित तिलक परिवार के उन अंतिम सदस्यों में से एक हैं, जिनका कांग्रेस से सक्रिय संबंध रहा.

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