संकट में सहारा बने लैब-ग्रोन डायमंड, सूरत के हीरा उद्योग को कैसे बचाया?

सूरत में जो कंपनियां पहले केवल प्राकृतिक हीरों की कटिंग करती थीं उनमें से करीब 90 प्रतिशत अब लैब-ग्रोन डायमंड का काम भी शुरू कर चुकी हैं

सांकेतिक तस्वीर

भारतीय हीरा उद्योग में पहली बार ऐसा हुआ है कि लगातार दो महीनों तक मात्रा के हिसाब से लैब-ग्रोन डायमंड (LGD) का निर्यात प्राकृतिक हीरों से ज्यादा रहा है. जेम एंड ज्वेलरी एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल (GJEPC) के अनुसार, मार्च 2026 में बिना जड़े LGD का कुल निर्यात 13 लाख कैरेट और अप्रैल में 14 लाख कैरेट रहा. इसके मुकाबले प्राकृतिक हीरों का निर्यात क्रमशः 12 लाख और 13 लाख कैरेट रहा.

इसका मतलब है कि मार्च में कुल निर्यात मात्रा में LGD की हिस्सेदारी 51 प्रतिशत और अप्रैल में 50.4 प्रतिशत रही. खनन से निकलने वाले प्राकृतिक हीरों पर आधारित उद्योग के लिए यह एक बड़ा बदलाव है. इस बदलाव का केंद्र लगभग पूरी तरह सूरत है. दुनिया के करीब 90 प्रतिशत हीरों की पॉलिशिंग इसी शहर में होती है.

कारोबार से जुड़े अनुमान बताते हैं कि जो कंपनियां पहले केवल प्राकृतिक हीरों की कटिंग करती थीं उनमें से करीब 90 प्रतिशत अब LGD का काम भी शुरू कर चुकी हैं.

हालांकि आंकड़ों को लेकर एक सावधानी जरूरी है. GJEPC ने हाल में ही मात्रा संबंधी आंकड़े प्रकाशित करना शुरू किया है. इसलिए संभव है कि यह बदलाव कई महीने पहले ही हो चुका हो लेकिन आंकड़ों में दिखाई नहीं दिया. इसके अलावा अप्रैल 2025 में LGD की 56 प्रतिशत हिस्सेदारी अमेरिकी टैरिफ घोषणाओं के कारण प्रभावित थी. इन टैरिफ का असर भारतीय पॉलिश्ड प्राकृतिक हीरों पर पड़ा था जिससे साल-दर-साल तुलना पूरी तरह भरोसेमंद नहीं मानी जा सकती. फिर भी रुझान साफ है. जनवरी 2025 में LGD की हिस्सेदारी 45 प्रतिशत थी.

मूल्य के लिहाज से तस्वीर बिल्कुल अलग है. रुपए या डॉलर में देखें तो भारत के कुल थोक हीरा निर्यात मूल्य में LGD की हिस्सेदारी 9 प्रतिशत से भी कम है. भारत में आयात होने वाले कच्चे LGD की औसत कीमत 15 डॉलर प्रति कैरेट है. इनमें ज्यादातर चीन से आने वाले एचपीएचटी (हाई प्रेशर, हाई टेम्परेचर) और दुबई के रास्ते आने वाले सीवीडी (केमिकल वेपर डिपोजिशन) हीरे शामिल हैं.

भारत से निर्यात होने वाले पॉलिश्ड LGD की औसत कीमत अब 74 डॉलर प्रति कैरेट से भी कम रह गई है. जबकि पॉलिश्ड प्राकृतिक हीरों की कीमतें अब भी 88-92 प्रतिशत अधिक हैं. तेल अवीव के हीरा विश्लेषक एडहन गोलन लिखते हैं कि दोनों उत्पाद रासायनिक रूप से भले समान हों लेकिन आर्थिक रूप से वे पूरी तरह अलग दुनिया में काम करते हैं.

अनुमान है कि भारत में अब 14,000 से अधिक सीवीडी रिएक्टर हैं. यह संख्या तीन साल पहले की तुलना में लगभग दोगुनी है. ये मशीनें अब जापान से आयात होने के बजाय भारत में भी असेंबल की जा रही हैं. एक मशीन की कीमत 75 लाख से 80 लाख रुपए के बीच है और यह हर महीने लगभग 125 कैरेट उत्पादन करती है.

प्राकृतिक हीरों की पॉलिशिंग और निर्यात करने वाले हजारों MSME के लिए यह बदलाव कोई रणनीतिक फैसला नहीं था बल्कि मजबूरी थी. रूस-यूक्रेन युद्ध और उसके बाद रूसी मूल के हीरों पर G-7 देशों के प्रतिबंधों ने प्राकृतिक हीरों की आपूर्ति को प्रभावित किया. दुनिया के करीब 30 प्रतिशत कच्चे हीरे उपलब्ध कराने वाली कंपनी अलरोसा की आपूर्ति भी प्रभावित हुई.

भारत का रत्न और आभूषण निर्यात कारोबार 2022 में 23 अरब डॉलर से घटकर 2024 के अंत तक लगभग 12 अरब डॉलर रह गया. सिर्फ 2024 में ही सूरत में 50,000 से अधिक कर्मचारियों की छंटनी हुई. दीवाली के बाद करीब 2,000 इकाइयां बंद हो गईं. दैनिक मजदूरी 800-1,000 रुपए से घटकर 500-600 रुपए रह गई. 2025 में भारतीय पॉलिश्ड हीरों पर अमेरिकी टैरिफ ने इस क्षेत्र को एक और झटका दिया. उद्योग का लगभग एक-तिहाई उत्पादन अमेरिका जाता है. इसके बाद आर्थिक संकट से जूझ रहे कई हीरा कारीगरों की आत्महत्या की घटनाएं भी सामने आईं.

दो साल पहले LGD कारोबार में उतरे एक वरिष्ठ हीरा निर्यातक कहते हैं, "LGD कंपनियों ने हजारों नौकरियां और जिंदगियां बचाई हैं. इन्हें भी प्राकृतिक हीरा उद्योग जितने ही कारीगरों की जरूरत होती है. सूरत की सबसे बड़ी ताकत उसका कुशल मानव संसाधन है. इसे बचाना जरूरी है. अगर कारीगरों को काम नहीं मिलेगा तो वे दूसरे पेशों में चले जाएंगे और यह नुकसान कभी पूरा नहीं हो सकेगा."

इन हालात में LGD अवसर कम और राहत का जरिया ज्यादा साबित हुआ. निर्माताओं के पास पहले से ही कच्चे हीरों की खरीद, पॉलिशिंग और निर्यात का नेटवर्क मौजूद था. गोलन के अनुसार, उन्हें पहले से पता था कि कच्चा माल कैसे खरीदना है, हीरों की पॉलिशिंग कैसे करनी है और उन्हें आभूषण निर्माताओं व खुदरा विक्रेताओं को कैसे बेचना है. इसलिए इस अवसर का फायदा उठाने के लिए वे सबसे बेहतर स्थिति में थे.

कई छोटी इकाइयां जो बंद होने कगार पर पहुंच गई थीं, LGD की पॉलिशिंग करके चलती रहीं. वहीं बड़े खिलाड़ियों ने अपनी उत्पादन क्षमता को दो हिस्सों में बांट दिया.

हालांकि असली ताकत खुदरा कारोबार के अर्थशास्त्र से आ रही है. गोलन की पहले की रिपोर्टिंग बताती है कि दुनिया भर के ज्वेलर्स ने LGD को क्यों अपनाया. थोक कीमतों में गिरावट के बावजूद अमेरिकी खुदरा बाजार में एक कैरेट LGD पर कुल मार्जिन 64 से 70 प्रतिशत तक है. जबकि प्राकृतिक हीरों पर यह लगभग 40 प्रतिशत है.

2018 के अंत से अब तक LGD की थोक कीमतों में 86.5 प्रतिशत की गिरावट आई है. एक अन्य सूचकांक के अनुसार 2020 से 2024 के बीच एक कैरेट LGD की कीमत 3,410 डॉलर से घटकर 892 डॉलर प्रति कैरेट रह गई. आंकड़े बताते हैं कि खुदरा विक्रेताओं ने थोक कीमतों में आई पूरी गिरावट का फायदा ग्राहकों तक नहीं पहुंचाया. इससे LGD दुकानों में सबसे ज्यादा मुनाफा देने वाली श्रेणी बन गया है.

उपभोक्ता बाजार अब सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरा है. बड़ी संख्या में युवा ग्राहक अब महंगे प्राकृतिक हीरों के बजाय सस्ते LGD चुन रहे हैं. पश्चिमी देशों में LGD और प्राकृतिक हीरों की रासायनिक समानता को लेकर समझ बढ़ी है. लेकिन भारत में उपभोक्ता अब भी शादी-ब्याह, विशेष अवसरों और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए प्राकृतिक हीरों को प्राथमिकता देते हैं. यही वजह है कि घरेलू बाजार अब भी आकर्षक माना जाता है.

प्राकृतिक हीरा उद्योग के लिए इस बदलाव की जड़ में मार्केटिंग की विफलता भी है. गोलन का सबसे अहम तर्क कीमत नहीं बल्कि ब्रांड की स्थिति को लेकर है. जब ग्राहक पैसे बचाने के लिए प्राकृतिक हीरे की जगह फैक्ट्री में बने हीरे को चुनते हैं तो यह प्राकृतिक हीरों के मार्केटिंग की कमजोरी को दिखाता है. उनके अनुसार प्राकृतिक हीरों को प्रतिष्ठा और सामाजिक हैसियत के प्रतीक के रूप में मजबूत तरीके से पेश नहीं किया गया. LGD उद्योग ने 'हम प्राकृतिक हीरों जैसे ही हैं' वाला संदेश देकर इसी खाली जगह का फायदा उठाया.

अब सवाल यह है कि क्या सूरत के निर्यातक 74 डॉलर प्रति कैरेट जैसी कम कीमत वाले उत्पादों पर आधारित मॉडल को लंबे समय तक चला पाएंगे. समान डॉलर कमाने के लिए उन्हें 50 गुना ज्यादा हीरे बेचने पड़ सकते हैं. फिलहाल इतना जरूर है कि बढ़ती निर्यात मात्रा ने सूरत के हीरा उद्योग को पूरी तरह ढहने से बचा लिया है.

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