कोटा में सिजेरियन डिलीवरी के बाद लगातार हुई मौतों की वजह क्या है?
कोटा में एक हफ्ते के भीतर चार प्रसूताओं की मौत और 12 महिलाओं की किडनी फेल होने के बाद राजस्थान की सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर कई सवाल खड़े हुए हैं

कोटा के न्यू मेडिकल कॉलेज और जेके लोन अस्पताल में नई प्रसूताओं (बच्चों को जन्म देने वाली महिलाएं) की लगातार मौतों ने पूरे राजस्थान को झकझोर दिया है. सलूंबर में हाल ही में रहस्यमयी बीमारी से 15 बच्चों की मौत का मामला अभी ठंडा भी नहीं हुआ था कि अब कोटा में एक सप्ताह के भीतर चार प्रसूताओं की मौत और 12 महिलाओं की किडनी फेल होने की घटना ने पूरी सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था को ही कठघरे में खड़ा कर दिया है.
कोटा के न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल में जिन महिलाओं की मौत हुई है, उन सबकी सिजेरियन डिलीवरी हुई थी. डिलीवरी के बाद महिलाओं में यूरीन डिस्चार्ज होना अचानक बंद हो गया, प्लेटलेट्स में तेजी से गिरावट, ब्लड प्रेशर लो होना और किडनी फेल होने जैसे लक्षण सामने आने लगे. पिछले एक सप्ताह में यहां जिन महिलाओं की सिजेरियन डिलीवरी हुई थी, उनमें से 15 महिलाओं की हालत अभी भी चिंताजनक बताई जा रही है. इनमें कई महिलाएं जिंदगी और मौत के बीच जंग लड़ रही हैं. अभी भी एक प्रसूता वेंटिलेटर पर है.
प्रसूताओं की मौत के मामले में अस्पताल प्रशासन की लापरवाही भी सामने आई है क्योंकि लगातार महिलाओं की हालत बिगड़ने के बावजूद इस थिएटर में ऑपरेशन जारी रहे. सवाल यह भी उठ रहा है कि अगर एक के बाद एक महिलाओं की तबीयत बिगड़ रही थी तो ऑपरेशन थिएटर बंद करने में देरी क्यों हुई? जब मामला बहुत ज्यादा तूल पकड़ने लगा तभी ऑपरेशन थिएटर को बंद क्यों किया गया? शुरुआती जांच में यह भी सामने आया है कि ऑपरेशन थिएटर में संक्रमण, खराब इंजेक्शन और अमानक सामग्री के कारण ये मौतें हुई हैं. हालांकि, प्रशासन अब तक भी इन मौतों पर रहस्यमयी चुप्पी साधे बैठा है.
9 मई को प्रसव के बाद बूंदी जिले के सुनवासा गांव की 22 वर्षीय प्रिया महावर की हार्ट अटैक से मौत के बाद प्रशासन का ध्यान इस घोर लापरवाही की तरफ गया. प्रिया से पहले ही यहां 4 और 5 मई को 26 वर्षीय पायल और 19 वर्षीय ज्योति की भी सिजेरियन डिलीवरी के बाद मौत हो चुकी थी मगर प्रशासन इन दोनों मौतों को सामान्य बताता रहा. इसी बीच जब प्रिया की मौत हुई, तो परिजनों ने लापरवाही के आरोप लगाए. प्रिया के पति रोहित का आरोप है कि "ऑपरेशन के बाद पत्नी और बच्चा दोनों स्वस्थ बताए गए थे मगर कुछ घंटों बाद अचानक तबीयत बिगड़ी और उसकी मौत हो गई." परिजनों का आरोप है कि समय रहते सही इलाज नहीं मिला. अस्पताल प्रशासन इसे कार्डिएक अरेस्ट बता रहा है, जबकि परिवार इसे साफ तौर पर लापरवाही मान रहा है.
कोटा की पिंकी का मामला तो और भी भयावह है. 8 मई को पिंकी का सिजेरियन प्रसव हुआ. प्रसव के कई घंटों बाद न तो रक्तस्राव बंद हुआ और न ही यूरिन आया. परिजनों ने शिकायत की तो डॉक्टरों ने बच्चेदानी खराब होने की बात कही. 9 मई को ऑपरेशन कर बच्चेदानी भी निकालकर परिजनों के हवाले कर दी गई. परिजन दिनभर डिब्बे में बंद बच्चेदानी की जांच के लिए चक्कर लगाते रहे और इसी दौरान पिंकी की मौत हो गई.
छावनी निवासी आरती की हालत भी गंभीर बनी हुई है. सिजेरियन डिलीवरी के बाद उसका यूरिन आउटपुट बंद हो गया और किडनी फेल होने जैसे लक्षण सामने आए. आरती को आईसीयू में वेंटिलेटर पर रखा गया है. कोटा में पिछले एक साल में प्रसव के दौरान 46 प्रसूताओं की मौत हो चुकी है.
प्रसूताओं की मौतों के जिम्मेदारों पर कार्रवाई में भी लापरवाही सामने आई है. मामले के तूल पकड़ने के बाद हरकत में आई सरकार ने चार डॉक्टरों और दो नर्सिंग कर्मियों पर कार्रवाई की. एक संविदाकर्मी डॉक्टर को बर्खास्त, दो नर्सिंगकर्मी व एक डॉक्टर को निलंबित और दो वरिष्ठ चिकित्सकों को कारण बताओ नोटिस जारी किए गए हैं. यह भी सामने आया है कि सरकार ने जिस गायनोकोलॉजिस्ट डॉ. श्रद्धा को निलंबित किया है, वे पैर में फ्रैक्चर के कारण कई दिनों से ऑपरेशन थिएटर में गई ही नहीं थीं. डॉ. श्रद्धा का कहना है कि उन्होंने एक भी ऑपरेशन नहीं किया है, बावजूद इसके उन्हें निलंबित कर दिया गया.
सरकार ने एसएमएस मेडिकल कॉलेज जयपुर के विशेषज्ञ डॉक्टरों की हाई लेवल टीम को जांच के लिए कोटा भेजा है. चिकित्सा शिक्षा विभाग की प्रमुख सचिव गायत्री राठौड़ ने भी कोटा के न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल पहुंचकर हालात का जायजा लिया. स्वास्थ्य मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर ने गंभीर मरीजों को एयर एंबुलेंस से जयपुर शिफ्ट करने का प्रस्ताव दिया, मगर मरीजों के परिजनों ने हंगामा करते हुए सरकार के इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया.
उधर विपक्ष ने भी इस मुद्दे पर अब सरकार को घेरना शुरू कर दिया है. कांग्रेस के पूर्व चिकित्सा मंत्री परसादी लाल मीणा सहित कई नेताओं ने अस्पताल पहुंचकर प्रशासनिक लापरवाही पर गंभीर सवाल खड़े किए. विपक्ष ही नहीं, भजनलाल सरकार के मंत्री हीरालाल नागर ने भी मुख्यमंत्री को चिट्ठी लिखकर इस घोर लापरवाही के दोषी लोगों पर कार्रवाई की मांग की है.
पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने इन मौतों को सिस्टम की हत्या करार दिया है. गहलोत का कहना है, "कोटा में एक के बाद एक प्रसूताओं की मौत के बाद ऐसा लग रहा है कि राजस्थान का कोई धनी-धोरी नहीं है. यह त्रासदी अचानक नहीं हुई है, बल्कि यह राजस्थान के ध्वस्त होते हेल्थ सिस्टम की परिणति है. सवाई मानसिंह अस्पताल के आईसीयू में अग्निकांड, खांसी की दवा से हुई मौतों और सलूंबर में नवजात शिशुओं की मौतों के गंभीर मामलों को ठंडे बस्ते में डालने का ही नतीजा है कि आज सिस्टम में डर और संवेदनशीलता पूरी तरह खत्म हो चुकी है."