RSS के दखल से बदल जाएगी बंगाल की साहित्यिक दुनिया?
अंतरराष्ट्रीय कोलकाता पुस्तक मेले के स्वर्ण जयंती आयोजन से पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़ा एक संगठन बंगाल के प्रकाशन जगत में अपनी मजबूत मौजूदगी बनाने की कोशिश कर रहा है

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़ा एक पुराना लेकिन कम चर्चित प्रकाशक संगठन 'बंगीय ग्रंथशिल्प परिषद' एक बार फिर से सक्रिय होने की कोशिश कर रहा है. इस संगठन के सक्रिय होने से पश्चिम बंगाल के साहित्यिक जगत में तरह-तरह की चर्चा हो रही हैं.
इन्हीं में से एक यह भी है कि क्या राज्य के राजनीतिक बदलाव का असर आगे चलकर कोलकाता के सबसे लोकप्रिय सांस्कृतिक आयोजनों में से एक अंतरराष्ट्रीय कोलकाता पुस्तक मेले पर भी पड़ सकता है.
दरअसल, इस चर्चा की शुरुआत 29 जून को प्रसिद्ध बंगाली लेखक, गायक और चित्रकार बुद्धदेव गुहा की जयंती पर आयोजित कार्यक्रम के बाद शुरू हुई. यह आयोजन बंगीय ग्रंथशिल्प परिषद ने किया था, जिसमें शामिल होने के लिए संघ परिवार के कई प्रभावशाली नेता पहुंचे.
इनमें प्रदेश BJP अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद समीक भट्टाचार्य और RSS के पदाधिकारी और वैज्ञानिक जिष्णु बसु के नाम प्रमुख हैं.
यह कार्यक्रम देखने में एक साहित्यिक श्रद्धांजलि था लेकिन बुद्धदेव गुहा का सम्मान राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है. 29 अगस्त 2021 को उनका निधन हुआ था. उन्होंने कभी अपने वैचारिक झुकाव को नहीं छिपाया. वे अक्सर सार्वजनिक रूप से RSS के प्रति अपनी प्रशंसा और श्यामा प्रसाद मुखर्जी के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते थे, जिन्हें वे पश्चिम बंगाल का निर्माता मानते थे.
BJP के प्रदेश सोशल मीडिया प्रमुख सप्तर्षि चौधरी कहते हैं, "गुहा हमारी पार्टी के सदस्य थे. आधुनिक बंगाली साहित्य में उनका बहुत बड़ा योगदान था इसलिए हमें लगता है कि इस साल उनकी जयंती मनाना उचित है. साहित्यिक उत्कृष्टता को राजनीतिक सुविधा के आधार पर नहीं देखा जाना चाहिए."
कार्यक्रम के निमंत्रण पत्र में BJP के दो अन्य वरिष्ठ नेताओं में पार्टी प्रवक्ता देबजीत सरकार और उपाध्यक्ष तनुजा चक्रवर्ती के नाम भी प्रमुखता से दिए गए हैं. इससे परिषद की राजनीतिक सोच का भी संकेत मिलता है. यही वजह है कि यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या परिषद केवल एक सांस्कृतिक मंच है या फिर संघ परिवार की ओर से बंगाल के प्रकाशन जगत में अपनी जगह बनाने और संभवतः पिछले 50 वर्षों से अंतरराष्ट्रीय कोलकाता पुस्तक मेले का आयोजन कर रहे पब्लिशर्स एंड बुकसेलर्स गिल्ड के प्रभाव को चुनौती देने की शुरुआत है.
आधिकारिक तौर पर BJP नेता इन अटकलों को खारिज करते हैं. चौधरी कहते हैं, "पुस्तक मेला आयोजित करना BJP या RSS का काम नहीं है. कोलकाता पुस्तक मेला अपनी पूरी भव्यता के साथ चलता रहेगा. यह विश्व स्तर पर मान्यता प्राप्त संस्था है और इसे किसी भी तरह के भ्रष्टाचार से मुक्त रहना चाहिए." हालांकि, संघ से जुड़े कुछ लोगों के बीच होने वाली चर्चाओं से संकेत मिलता है कि परिषद केवल स्मृति कार्यक्रमों तक सीमित नहीं रहना चाहती.
संगठन की योजनाओं से परिचित सूत्रों के मुताबिक 29 जून का कार्यक्रम अगले साल के पुस्तक मेले तक होने वाली कई साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियों की शुरुआत है. परिषद आने वाले महीनों में कई कार्यक्रम आयोजित करेगी और धीरे-धीरे प्रकाशकों, लेखकों और पाठकों के बीच अपना नेटवर्क तैयार करेगी.
संगठन राज्य के पुस्तकालय तंत्र से भी जुड़ने की योजना बना रहा है. राज्य के जनशिक्षा विस्तार एवं पुस्तकालय सेवा मंत्री गौरी शंकर घोष को एक कार्यक्रम में आमंत्रित किए जाने की संभावना है. सूत्रों के अनुसार, परिषद की प्राथमिकताओं में बंद पड़े सार्वजनिक पुस्तकालयों को फिर से शुरू करना, चल रहे पुस्तकालयों के कामकाज की समीक्षा करना और बंगाल में लिखने-पढ़ने की संस्कृति को फिर से मजबूत करना शामिल है.
इस पहल से जुड़े नेताओं का कहना है कि वाम मोर्चा सरकार के समय राज्य में पुस्तकालयों का मजबूत नेटवर्क बना था लेकिन तृणमूल कांग्रेस (TMC) के शासन में उसका बड़ा हिस्सा कमजोर पड़ गया. परिषद ने उसी संगठन से भी संपर्क किया है जिसकी भूमिका को लेकर अब चर्चा हो रही है.
पब्लिशर्स एंड बुकसेलर्स गिल्ड के महासचिव त्रिदिब कुमार चट्टोपाध्याय ने पुष्टि की है कि उनके संगठन को 29 जून के कार्यक्रम का निमंत्रण मिला था. उन्होंने कहा, "यह बहुत अच्छी पहल है. मुझे अच्छी तरह याद है कि बुद्धदेव गुहा ने अपने राजनीतिक विचारों पर हमेशा डटे रहे, यहां तक कि उस समय के सीपीएम मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य की मौजूदगी में भी. हालांकि दोनों के परिवारों के बीच अच्छे संबंध थे."
चट्टोपाध्याय इस साहित्यिक कार्यक्रम को गिल्ड के लिए चुनौती मानने से बचते हैं. वे कहते हैं, "मैं अभी किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचना चाहता लेकिन इतना जरूर कहूंगा कि कोलकाता पुस्तक मेले को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने के लिए हमने खून-पसीना एक किया है. अंतरराष्ट्रीय मान्यता हासिल करने और दुनिया भर के प्रकाशकों, लेखकों और पाठकों को कोलकाता तक लाने में दशकों लग गए. ऐसी विरासत रातोंरात नहीं बनती."
गिल्ड का आत्मविश्वास उसके इतिहास से आता है. इसकी स्थापना 1975 में हुई थी और 1976 में इसने पहले कलकत्ता पुस्तक मेले का आयोजन किया था. 1983 में इस मेले को इंटरनेशनल पब्लिशर्स एसोसिएशन से मान्यता मिली और धीरे-धीरे यह दुनिया के सबसे बड़े गैर-व्यावसायिक सार्वजनिक पुस्तक मेलों में शामिल हो गया.
पिछले कई दशकों में गिल्ड ने राजनीतिक बदलाव, कानूनी विवाद और समानांतर पुस्तक मेले आयोजित करने की कई कोशिशों का सामना किया है. 1980 के दशक में अलग-अलग सरकारों और बाद में 2008 में आयोजित समानांतर पुस्तक मेला भी गिल्ड के मेले की लोकप्रियता को कम नहीं कर सका. 1995 से गिल्ड पश्चिम बंगाल सरकार के प्रशासनिक सहयोग से अंतरराष्ट्रीय कोलकाता पुस्तक मेले का आयोजन करता आ रहा है जबकि आर्थिक रूप से वह स्वतंत्र बना हुआ है.
2011 में तृणमूल कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद कुछ प्रकाशकों ने रवींद्र बोई मेला शुरू किया. 2021 में तृणमूल नेता कुणाल घोष के नेतृत्व में हृषिकेश पार्क में एक और पुस्तक मेले का आयोजन हुआ लेकिन इनमें से कोई भी अंतरराष्ट्रीय कोलकाता पुस्तक मेले का विश्वसनीय विकल्प नहीं बन पाया.
अब जब गिल्ड 2027 में पुस्तक मेले के स्वर्ण जयंती संस्करण की तैयारी कर रहा है, तब बंगीय ग्रंथशिल्प परिषद के आगमन ने बंगाल के बदलते राजनीतिक माहौल में एक नया सांस्कृतिक पहलू जोड़ दिया है. यह परिषद केवल बुद्धदेव गुहा जैसे लेखकों का सम्मान करने वाला साहित्यिक मंच बनी रहती है या आगे चलकर प्रकाशन जगत में एक बड़ी संस्थागत भूमिका निभाती है, इस पर आने वाले महीनों में साहित्यिक जगत की नजर बनी रहेगी.