ऑटिज्म पर एक बयान और पूरे ओडिशा में मच गया बवाल

भुवनेश्वर के KIIT इंटरनेशनल स्कूल में 'विश्व ऑटिज़्म जागरूकता दिवस' पर इसके संस्थापक ने ऑटिज्म को 'पिछले जन्मों का पाप' बता दिया जिस पर अब चौतरफा बयानबाजी हो रही है

Autism in children: Early signs parents miss, testing age and why cases are rising
भारत की कुल आबादी में 3 प्रतिशत ऑटिज्म से पीड़ित है (सांकेतिक फोटो)

नयन परिदा (बदला हुआ नाम) राउरकेला के निवासी हैं. उनका 7 साल का बेटा अचानक अपने बाल नोचने लगता है और ऐसा न कर पाने पर चिल्लाने लगता है. जब नयन की पत्नी बच्चे को संभालने दौड़ती है, तो बेटा अपनी मां के बाल भी नोंचने लगता है.

इस स्थिति में एक मां दर्द, गुस्सा, प्यार, दया और उम्मीद जैसे भाव एक साथ महसूस करती है, क्योंकि उनका बेटा ऑटिज्म का शिकार है. ऑटिज्म के लक्षणों के कारण उनका बेटा अपनी उम्र के बच्चों से घुलता-मिलता नहीं है. अन्य बच्चे और उनके परिजन भी इस परिवार से दूरी बनाए रखते हैं.

हमारे यहां कई लोग ऐसी बीमारियों को सामाजिक कलंक जैसा मानते हैं. इसी प्रवृत्ति को दूर करने के प्रयासों के तहत, 2 अप्रैल को ओडिशा के भुवनेश्वर स्थित KIIT इंटरनेशनल स्कूल में 'विश्व ऑटिज़्म जागरूकता दिवस' पर एक कार्यक्रम आयोजित किया गया. आयोजन भले ही ऑटिज्म से जुड़ी सामाजिक भ्रांतियों को तोड़ने के लिए किया गया था, लेकिन यह पीड़ितों के लिए एक दुखद याद बन गया.

दरअसल, यहां KIIT विश्वविद्यालय के संस्थापक अच्युत सामंत ने ऑटिज्म को पिछले जन्म का पाप और कर्मों का फल बता दिया. उनकी इस टिप्पणी के बाद राज्यभर में विवाद खड़ा हो गया है और उनके बयान की चारों तरफ आलोचना की जा रही है.

अच्युत सामंत ने कहा, “कई बड़े आध्यात्मिक नेताओं ने भी कहा है कि बच्चे अपने पिछले जन्म के गलत कर्मों के कारण ऑटिज़्म के साथ पैदा होते हैं. एक बच्चा जिसने कभी कोई पाप नहीं किया, वह ऑटिज़्म के साथ क्यों जन्म लेता है? यह पिछले जन्म के गलत कर्मों का फल है. बहुत से लोग पिछले जन्म में विश्वास नहीं करते, लेकिन मैं लोगों से कहता हूं कि कोई भी गलत काम न करें, वरना अगले जन्म में वे ऑटिस्टिक बच्चे के रूप में पैदा हो सकते हैं.”

यह टिप्पणी इसलिए भी ज्यादा ध्यान खींच रही है क्योंकि यह विश्व ऑटिज़्म जागरूकता दिवस पर ऑटिस्टिक बच्चों और उनके माता-पिता की उपस्थिति में की गई. यह दिन वैश्विक स्तर पर ऑटिस्टिक व्यक्तियों के लिए सामाजिक स्वीकार्यता, समर्थन और उचित उपचार को बढ़ावा देने के लिए मनाया जाता है. जिस समय सामंत यह बात कह रहे थे, मंच पर राज्य के सामाजिक सुरक्षा और दिव्यांगजन सशक्तिकरण मंत्री नित्यानंद गोंड भी मौजूद थे.

सामाजिक-राजनीतिक तौर पर हो रही आलोचना

अब राज्यभर में सामंत के इस बयान की निंदा हो रही है. जन स्वास्थ्य अभियान, ओडिशा के प्रमुख गौरांग महापात्रा ने इसे घोर अपमानजनक बताया है. उनका कहना है कि इस बयान के बजाय हमें ऐसी सोच की जड़ में जाना होगा.

गौरांग बताते हैं, “सामंत के संस्थान में बड़ी संख्या में आदिवासी बच्चे मुफ्त शिक्षा पाते हैं, लेकिन वहां उनमें एक बड़ा बदलाव दिख रहा है. वहां से पढ़ने के बाद बच्चे अपने माता-पिता या गांव वापस नहीं जाना चाहते और न ही उनकी जिम्मेदारी लेना चाहते हैं. वे अपने गांव के दोस्तों को हीन भावना से देखते हैं.”

वे आगे कहते हैं, “सामाजिक तौर पर अलगाव की भावना तैयार की जा रही है. सांस्कृतिक व्यवहार को सुधारने के बजाय आधुनिकता के नाम पर उसे बिगाड़ा जा रहा है. वहां किसी प्रकार के मानवीय मूल्यों की शिक्षा नहीं दी जा रही है. ऐसे विचारों का नेतृत्व करने वाले व्यक्ति के बयान पर हमें चौंकना नहीं चाहिए.”

सामाजिक कार्यकर्ता विक्रम पांडा कहते हैं, “एक शिक्षण संस्थान में विज्ञान के बजाय अलौकिक शक्तियों की बात करना अजीब है. इस तरह के बयानों से पीड़ित बच्चों के अवसाद में जाने का खतरा और बढ़ जाता है.”

तीखी सामाजिक प्रतिक्रिया के बाद सरकार भी हरकत में आई. सामंत के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए मंत्री नित्यानंद गोंड ने कहा कि वह इस तरह की बातों को स्वीकार नहीं करते और ऐसे बयान सार्वजनिक रूप से नहीं दिए जाने चाहिए.

नित्यानंद गोंड ने कहा, “उन्होंने जो कहा वह अस्वीकार्य है और मैं इसकी निंदा करता हूं. हम सभी को समान दृष्टि से देखते हैं. हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वे प्रेरित महसूस करें, सम्मान के साथ जिएं और अन्य लोगों की तरह अपना जीवन बिता सकें. हमारी प्राथमिकता दिव्यांगजनों के प्रति सहानुभूति और सम्मान की होनी चाहिए. उनके बारे में ऐसी टिप्पणी कतई स्वीकार्य नहीं है.”

विवाद बढ़ने के बाद सामंत ने सीधे तौर पर माफी तो नहीं मांगी, लेकिन सफाई देते हुए कहा, “शास्त्रों में पिछले जन्म के परिणामों को लेकर दी गई उनकी टिप्पणी किसी व्यक्ति विशेष को ठेस पहुंचाने के लिए नहीं थी. मैंने केवल माता-पिता और शिक्षकों को सलाह दी थी कि वे पुरानी बातों को भूलकर इन विशेष बच्चों को समय दें और धैर्य रखें.”
भारत में ऑटिज्म

इंडियन एकेडमी ऑफ पेडियाट्रिक्स के मुताबिक, भारत की कुल आबादी का 3 प्रतिशत यानी लगभग 1.8 करोड़ लोग ऑटिज्म से पीड़ित हैं. 10 साल तक की उम्र के हर 100 में से 1 बच्चा इससे प्रभावित है. लड़कियों के मुकाबले लड़कों में इसके लक्षण अधिक पाए जाते हैं और बीते एक दशक में इसके मामलों में काफी बढ़ोतरी देखी गई है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, ऑटिज़्म से ग्रसित लोग अक्सर सामाजिक भेदभाव का सामना करते हैं. उन्हें स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा और सामाजिक भागीदारी के अवसरों से वंचित रखा जाता है. वे हिंसा और दुर्व्यवहार के प्रति भी अधिक संवेदनशील होते हैं. साथ ही, ऑटिज़्म प्रभावित लोगों में समय से पहले मृत्यु का जोखिम भी अधिक होता है.

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