निपाह का सोर्स चमगादड़ या कुछ और? केरल के नए मामले ने फिर छेड़ी बहस

केरल में 2018 से निपाह वायरस के कई मामले सामने आ चुके हैं, वहीं दो अलग-अलग अध्ययनों में चमगादड़ों को संक्रमण का सोर्स मानने को लेकर अलग निष्कर्ष सामने आए हैं

सांकेतिक तस्वीर

कोझिकोड के उपनगर फेरोक के 43 वर्षीय व्यक्ति की हालत गंभीर बनी हुई है. यह इस साल राज्य में निपाह वायरस संक्रमण का पहला वेरिफाइड मामला है. यह मरीज कोझिकोड मेडिकल कॉलेज के आइसोलेशन वार्ड में भर्ती है. इस बीच स्वास्थ्य अधिकारी उसके प्राथमिक संपर्कों की पहचान कर उन्हें अलग कर रहे हैं.

स्वास्थ्य मंत्री के. मुरलीधरन ने बताया है कि उभरती स्थिति से निपटने के लिए उनके विभाग ने उपचार और निगरानी से जुड़े सभी प्रोटोकॉल सक्रिय कर दिए हैं. उन्होंने कहा, "घबराने की जरूरत नहीं है. निपाह वायरस मरीज के प्राथमिक संपर्कों की पहचान कर उन्हें अलग किया जा रहा है. विभाग संक्रमित व्यक्ति की यात्रा संबंधी जानकारी भी जुटा रहा है."

मुरलीधरन ने निपाह मामलों से निपटने के लिए कार्ययोजना तैयार करने के उद्देश्य से स्वास्थ्य अधिकारियों और विशेषज्ञों की उच्चस्तरीय बैठक भी बुलाई.

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, फल खाने वाले चमगादड़ों की एक प्रजाति (Pteropodidae) निपाह वायरस की प्राकृतिक वाहक मानी जाती है. निपाह वायरस आमतौर पर संक्रमित चमगादड़ों और अन्य जानवरों से इंसानों में फैलता है. यह एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में भी फैल सकता है. संक्रमित व्यक्ति को बुखार हो सकता है और मस्तिष्क से जुड़े लक्षण जैसे सिरदर्द या भ्रम की स्थिति, तथा फेफड़ों से जुड़े लक्षण जैसे सांस लेने में कठिनाई या खांसी हो सकती है.

कोझिकोड जिला स्वास्थ्य विभाग के एक अधिकारी के अनुसार संक्रमित व्यक्ति एक व्यापारी है. उसका गोदाम घनी घास-पत्तियों वाले इलाके के पास स्थित है और वहां बड़ी संख्या में फल खाने वाले चमगादड़ पाए गए हैं.

अधिकारी ने इंडिया टुडे को बताया, "उसे बुखार और सिरदर्द हुआ था. वह 6 जून को एक निजी क्लिनिक गया और बाद में एक निजी अस्पताल पहुंचा. 10 जून को उसे कोझिकोड मेडिकल कॉलेज रेफर किया गया जहां उसे वेंटिलेटर पर रखा गया. शुरुआती जांच में वह निपाह पॉजिटिव पाया गया. स्वास्थ्य विभाग ने दोनों अस्पतालों में उसके प्राथमिक संपर्कों की पहचान कर ली है और उसके परिवार के पांच सदस्यों को क्वारंटीन किया गया है."

2018 से केरल में निपाह वायरस के कई मामले सामने आ चुके हैं जिनमें 24 लोगों की जान गई है. पुणे स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी और भोपाल स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हाई सिक्योरिटी एनिमल डिजीजेज के विशेषज्ञों की तरफ से किए गए एक अध्ययन में फल खाने वाले चमगादड़ों को संक्रमण का प्रमुख स्रोत बताया गया था.

हालांकि वायरोलॉजिस्ट डॉ. टी. जैकब जॉन, डॉ. निवेदिता गुप्ता और डॉ. मनोज वसंत मुरहेकर के अन्य अध्ययन में इस निष्कर्ष पर सवाल उठाया गया. यह अध्ययन 2024 में इंडियन जर्नल ऑफ मेडिकल रिसर्च में प्रकाशित हुआ था. इसमें कहा गया कि केरल में हुए प्रकोपों के लिए फल खाने वाले चमगादड़ों को प्राथमिक स्रोत नहीं माना जा सकता.

रिपोर्ट में कहा गया, "मलेशिया और बांग्लादेश में हुए प्रकोपों तथा केरल में बार-बार सामने आए प्रकोपों में किसी मध्यवर्ती जीव या चमगादड़ों के शारीरिक द्रवों से दूषित खाद्य पदार्थों के सेवन की भूमिका नहीं पाई गई. ऐसे में चमगादड़ से इंसान तक संक्रमण पहुंचने के सटीक मार्ग की पहचान करना अब भी चुनौती बना हुआ है."

केरल में संक्रमण के हर ऐसे मामले के बाद, जिसमें वायरस जानवरों से इंसानों तक पहुंचा (spillover event), प्रभावित क्षेत्रों से चमगादड़ों के नमूने लिए गए और उनमें वायरल आरएनए (Ribonucleic Acid) की जांच की गई. वायरल RNA, जो वायरल संक्रमण का एक महत्वपूर्ण घटक है, पांच में से तीन प्रकोपों के दौरान चमगादड़ों में पाया गया. फल खाने वाले चमगादड़ों में इसकी मौजूदगी 25 प्रतिशत तक दर्ज की गई.

अध्ययन के अनुसार, 2018 के प्रकोप में प्राथमिक मरीज के घर के पास चमगादड़ों में वायरल RNA पाया गया था. 2019 के प्रकोप में यह प्राथमिक मरीज के घर से 5 किलोमीटर के दायरे में मिला जबकि 2023 के प्रकोप में यह प्राथमिक मरीज के घर से 42 से 55 किलोमीटर के दायरे में पाया गया.

अध्ययन में तर्क दिया गया कि इन निष्कर्षों से यह संकेत मिलता है कि केवल चमगादड़ों के बसेरों के पास रहना सीधे तौर पर निपाह संक्रमण के जोखिम से जुड़ा नहीं है. यह पैटर्न बांग्लादेश में हुए कई प्रकोपों में भी देखा गया था.

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