कश्मीर में 100 से ज्यादा बार बरसे ओले, संकट में सेब की अर्थव्यवस्था

कश्मीर में सेब की खेती करीब 35 लाख किसानों की आजीविका का आधार है. साथ ही देश में होने वाले कुल सेब उत्पादन का करीब 78 प्रतिशत हिस्सा यहीं से आता है

ओलावृष्टि से शोपियां जिला सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है

अनिश्चित मौसम के लिए पहचाने जाने वाले कश्मीर में इस साल वसंत और शुरुआती गर्मी का मौसम असामान्य रूप से उथल-पुथल भरा रहा है. घाटी में बार-बार बारिश, गरज के साथ बौछारें, खासकर ओलावृष्टि और तेज हवाएं चली हैं. इसके पीछे मुख्य रूप से लगातार सक्रिय रहे पश्चिमी विक्षोभ और स्थानीय मौसमी परिस्थितियां जिम्मेदार रही हैं.

अब तक के हालात के आधार पर बागवानी विशेषज्ञों का मानना है कि हाल के वर्षों में कश्मीर ने सबसे अनियमित बागवानी मौसमों में से एक का सामना किया है. मौसम विशेषज्ञ फैजान आरिफ के अनुसार अप्रैल के अंत से अब तक मौसम संबंधी गतिविधियों के 50 से अधिक दिन दर्ज किए गए हैं. यह हाल के वर्षों के सबसे अस्थिर वसंत में से एक रहा है.

इसका सबसे ज्यादा असर क्षेत्र के सेब बागानों पर पड़ा है जो कश्मीर की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं. कश्मीर में सेब की खेती करीब 35 लाख किसानों की आजीविका का आधार है. साथ ही भारत के कुल वार्षिक सेब उत्पादन में इसकी हिस्सेदारी करीब 78 प्रतिशत है.

हाल के वर्षों में ओलावृष्टि की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं. विशेषज्ञों के जुटाए आंकड़ों के अनुसार 2007 में सिर्फ दो ओलावृष्टि की घटनाएं दर्ज हुई थीं जबकि 2022 में इनकी संख्या 27 पहुंच गई. इस साल कश्मीर में ओलावृष्टि की घटनाओं की संख्या 100 के पार जा चुकी है. कई स्थानों, खासकर दक्षिण कश्मीर में, चार से पांच बार अलग-अलग ओलावृष्टि हुई है.

फैजान ने कहा कि कश्मीर में ओलावृष्टि की घटनाओं की सटीक संख्या बताना मुश्किल है क्योंकि यह अत्यंत स्थानीय घटना होती है. इसका असर अक्सर पूरे जिले के बजाय किसी गांव या गांवों के समूह तक सीमित रहता है. उन्होंने कहा, "हालांकि पूरी घाटी से मिली रिपोर्टों के आधार पर हम कह सकते हैं कि इस साल ओलावृष्टि की घटनाएं 100 से अधिक रही हैं."

व्यापक नुकसान

लगातार हो रही ओलावृष्टि ने फलों के विकास के महत्वपूर्ण चरणों में सेब की फसल को भारी नुकसान पहुंचाया है. दक्षिण और उत्तर कश्मीर के शोपियां जैसे प्रमुख फल उत्पादक क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं. 22 मई को भारी बारिश के साथ हुई ओलावृष्टि ने कई इलाकों को प्रभावित किया. केवल शोपियां जिले में यह चौथी बड़ी घटना थी.

सिर्फ दो दिन बाद कुपवाड़ा जिले के लोलाब और हंदवाड़ा में भीषण ओलावृष्टि हुई. इससे धान की रोपाई के दौरान खड़ी फसलों को भारी नुकसान पहुंचा. जून का महीना भी इससे अछूता नहीं रहा. कश्मीर के विभिन्न हिस्सों से लगभग रोजाना ओलावृष्टि की खबरें मिलती रहीं.

बारामूला के बागवानी विकास अधिकारी डॉ. राजा जुनैद रशीद ने कश्मीर के हाई-डेंसिटी सेब बागानों पर व्यापक शोध किया है और उनके पास लंबा जमीनी अनुभव है. वे कहते हैं, "मौसम में बढ़ती अनिश्चितता कोई अलग-थलग घटना नहीं है. 2023 के बाद से जो ओलावृष्टि कभी छिटपुट और सीमित इलाकों तक रहती थी, वह अब अधिक बार, अधिक व्यापक और अधिक तीव्र हो गई है. इसका असर एक साथ कई जिलों पर पड़ रहा है."

बढ़ती लागत, बीमारियों का दबाव

डॉ. जुनैद ने बताया कि लंबे समय तक पत्तियों पर नमी बने रहने और अधिक आर्द्रता ने एप्पल स्कैब (Apple Scab) जैसी फफूंद से पैदा होने वाली बीमारियों के लिए अनुकूल परिस्थितियां पैदा कर दी हैं. इसके कारण बार-बार फफूंदनाशकों का छिड़काव करना पड़ रहा है. तापमान में उतार-चढ़ाव ने वूली एप्पल एफिड (Woolly Apple Aphid), ग्रीन एप्पल एफिड (Green Apple Aphid) और सैन जोस स्केल (San Jose Scale) जैसे कीटों को भी बढ़ावा दिया है और इन पर नियंत्रण मुश्किल हुआ है.

अनियमित मौसम ने सेब उत्पादकों को पौध संरक्षण के प्रयास बढ़ाने पर मजबूर कर दिया है. उत्तर कश्मीर में हाई-डेंसिटी सेब बागानों का प्रबंधन करने वाले अली मोहम्मद ने कहा, "बार-बार आने वाले तूफानों और ओलावृष्टि के कारण मुझे बीमारियों से बचाव के लिए अपने बागानों में अधिक फफूंदनाशक छिड़काव करना पड़ा. इसके अलावा ओलावृष्टि ने सेब की फसल को भारी नुकसान पहुंचाया है."

उत्पादकों का कहना है कि वे कम उत्पादन की समस्या से भी जूझ रहे हैं. डॉ. जुनैद ने चेतावनी दी, "बार-बार छिड़काव करने की मजबूरी के कारण उत्पादन लागत काफी बढ़ गई है. श्रम की जरूरत भी बढ़ी है और कीटनाशकों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित होने का खतरा भी बढ़ रहा है."

बार-बार आने वाले तूफानों के बावजूद कश्मीर में कुल वर्षा अब भी सामान्य से कम बनी हुई है. जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश में 2026 के पहले पांच महीनों के दौरान 42 प्रतिशत वर्षा की कमी दर्ज की गई. नवंबर 2025 के बाद से हर महीने सामान्य से कम बारिश हुई है.

फैजान ने कहा कि हाल की मौसम गतिविधियों ने भूजल और नदियों के जलस्तर में गिरावट की रफ्तार को कुछ हद तक कम किया है. लेकिन यह बारिश के घाटे की भरपाई के लिए पर्याप्त नहीं रही. उन्होंने कहा, "लंबे समय तक और व्यापक स्तर पर वर्षा की कोई घटना नहीं हुई है इसलिए जल संसाधनों की स्थिति पूरी तरह सामान्य नहीं हो पाई है."

जलवायु परिवर्तन की चिंता

विशेषज्ञ मानते हैं कि किसी एक मौसमीय घटना के लिए सीधे तौर पर जलवायु परिवर्तन को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. लेकिन वैज्ञानिक प्रमाण बताते हैं कि ग्लोबल वॉर्मिंग चरम मौसमीय घटनाओं की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ा रही है.

अर्थ साइंटिस्य, ग्लेशियर एक्सपर्ट और इस्लामिक यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के कुलपति प्रोफेसर शकील अहमद रोमशू ने इंडिया टुडे कहा, "ग्लोबल वॉर्मिंग इन अनियमित मौसम पैटर्न की प्रमुख वजह है. हिमालय जैसे पर्वतीय क्षेत्र इन बदलावों के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील हैं. कश्मीर में पश्चिमी विक्षोभ की आवृत्ति, तीव्रता और समय में बदलाव आ रहा है. इसके कारण अनियमित बर्फबारी, लंबे शुष्क दौर और बीच-बीच में भारी वर्षा की घटनाएं हो रही हैं. वहीं बढ़ते तापमान के कारण बर्फ जल्दी पिघल रही है, बर्फ की परत कम समय तक टिक रही है, ग्लेशियर पीछे हट रहे हैं और गर्म मौसम की अवधि लंबी हो रही है."

साथ ही उनका कहना था, "बागवानी, खेती, जल और बिजली जैसे क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए तुरंत कदम उठाने होंगे. साथ ही लोगों की आजीविका और पर्यावरण की सुरक्षा के लिए जरूरी बदलाव करने होंगे." 

फैजान ने अधिक सतर्क रुख अपनाते हुए कहा, "अब तक देखी गई परिस्थितियां व्यापक रूप से पश्चिमी विक्षोभ से जुड़ी प्राकृतिक जलवायु परिवर्तनशीलता के दायरे में ही आती हैं. किसी एक मौसम को सीधे जलवायु परिवर्तन से जोड़ने के लिए विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन की जरूरत होती है."

उन्होंने यह भी कहा कि कश्मीर का वसंत मौसम ऐतिहासिक रूप से अनिश्चित और बदलते मिजाज वाला रहा है. हालांकि इस वर्ष इसकी निरंतरता और आवृत्ति असामान्य जरूर रही है.

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