मटन-चिकन के बिना काशी और 'पवित्र' हो जाएगी लेकिन इसकी कीमत चुकाएगा कौन?
वाराणसी नगर निगम मांस, मछली और पोल्ट्री की 400 से अधिक दुकानों को शहर से बाहर बसाने की तैयारी में है. फैसले ने धार्मिक पहचान, स्वच्छता और आजीविका पर नई बहस छेड़ दी है

काशी की पहचान केवल एक शहर के रूप में नहीं बल्कि भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक राजधानी के रूप में की जाती है. हर दिन लाखों श्रद्धालु बाबा विश्वनाथ के दर्शन और गंगा आरती के लिए यहां पहुंचते हैं.
इसी काशी में अब एक नया विवाद जन्म ले चुका है. वाराणसी नगर निगम ने शहर के भीतर संचालित मांस, मछली और पोल्ट्री की लगभग 350 से 450 दुकानों को चरणबद्ध तरीके से शहर की सीमा से बाहर स्थानांतरित करने का फैसला किया है.
नगर निगम का दावा है कि यह कदम शहर की स्वच्छता, सौंदर्यीकरण और धार्मिक गरिमा को ध्यान में रखकर उठाया गया है जबकि व्यापारी, विपक्षी दल और कई स्थानीय लोग इसे हजारों परिवारों की आजीविका पर सीधा प्रहार मान रहे हैं. 6 जून को टाउनहाल में हुई नगर निगम सदन की बैठक में इस प्रस्ताव को अंतिम रूप दिया गया. योजना के तहत रामनगर, सूजाबाद, गणेशपुर, अवलेशपुर और शिवपुर क्षेत्रों में आधुनिक मीट मार्केट विकसित किए जाएंगे जहां वर्तमान दुकानदारों को स्थानांतरित किया जाएगा.
कैसे शुरू हुई पूरी कवायद
मांस कारोबार को वाराणसी शहर से बाहर ले जाने की चर्चा अचानक नहीं शुरू हुई. इसकी पृष्ठभूमि दो वर्ष पुरानी है. जनवरी 2024 में भारतीय जनता पार्टी (BJP) पार्षद इंद्रेश सिंह ने श्री काशी विश्वनाथ मंदिर से दो किलोमीटर के दायरे में मांस और मछली की बिक्री पर रोक लगाने का प्रस्ताव रखा था. नगर निगम ने इसे मंजूरी दी और इसके बाद मंदिर मार्गों पर स्थित 93 दुकानों को बंद कराया गया. कई दुकानों को हरे पर्दे लगाने और खुले में मांस प्रदर्शित न करने के निर्देश दिए गए.
हालांकि तब यह प्रतिबंध केवल मंदिर क्षेत्र तक सीमित था. फरवरी 2026 में नगर निगम कार्यकारिणी समिति के सदस्य और BJP पार्षद मदन मोहन तिवारी ने पूरे शहर के भीतर संचालित मांस और मछली कारोबार को बाहरी क्षेत्रों में व्यवस्थित करने का प्रस्ताव रखा. BJP पार्षद माधुरी सिंह ने इसका समर्थन किया और बाद में इसे कार्यकारिणी तथा सदन से मंजूरी मिल गई. दिलचस्प बात यह रही कि वाराणसी नगर निगम कार्यालय से जारी प्रेस रिलीज में कांग्रेस पार्षद दल के नेता गुलशन अली का नाम प्रस्ताव से जोड़ दिया गया, जिससे राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया. बाद में नगर निगम और मेयर ने स्पष्ट किया कि प्रस्ताव BJP पार्षदों की ओर से आया था.
नगर निगम का तर्क : स्वच्छता और धार्मिक पहचान
वाराणसी के मेयर अशोक कुमार तिवारी इस फैसले के सबसे बड़े पैरोकार हैं. उनका कहना है कि वाराणसी केवल एक सामान्य शहर नहीं बल्कि वैश्विक धार्मिक पर्यटन केंद्र है, जहां प्रतिदिन एक लाख से अधिक श्रद्धालु आते हैं. ऐसे में सड़कों और बाजारों में खुलेआम मांस और मछली की बिक्री शहर की सांस्कृतिक छवि के अनुरूप नहीं है. नगर निगम का दावा है कि वर्तमान व्यवस्था में कई स्थानों पर खुले में कटान, कचरा निपटारा और सफाई की समस्या है. इससे दुर्गंध, प्रदूषण और स्वास्थ्य संबंधी जोखिम बढ़ते हैं.
नई योजना के तहत विशेष मीट मार्केट विकसित किए जाएंगे, जहां कचरा प्रबंधन, जल निकासी, रेफ्रिजरेशन और स्वच्छता की आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध होंगी. नगर आयुक्त हिमांशु नागपाल के अनुसार चुने गए सभी स्थान शहर की परिधि पर हैं ताकि आम नागरिकों को अत्यधिक असुविधा न हो. प्रशासन का दावा है कि किसी व्यापारी को उजाड़ा नहीं जाएगा बल्कि बेहतर सुविधाओं के साथ पुनर्स्थापित किया जाएगा.
पर्यटन क्षेत्र से जुड़े कई लोग नगर निगम के निर्णय का समर्थन कर रहे हैं. टूरिज्म वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष राहुल मेहता का मानना है कि बड़ी संख्या में आने वाले तीर्थयात्री धार्मिक वातावरण की अपेक्षा लेकर काशी पहुंचते हैं. मंदिर मार्गों और प्रमुख धार्मिक क्षेत्रों में खुले मांस बाजार उनकी भावनाओं को प्रभावित करते हैं. असि घाट के पुजारी विनय कुमार पांडे भी इस निर्णय को शहर की धार्मिक गरिमा के अनुरूप बताते हैं. उनके अनुसार काशी विश्वनाथ धाम के विस्तार और पर्यटन ढांचे के विकास के बाद शहर की धार्मिक पहचान को और मजबूत करने की कोशिश की जा रही है. BJP से जुड़े कई स्थानीय नेताओं का भी मानना है कि बाजारों के स्थानांतरण से व्यापार खत्म नहीं होगा. उनका तर्क है कि उपभोक्ता अपनी आवश्यकता के अनुसार नए बाजारों तक पहुंच जाएंगे.
व्यापारियों की बढ़ी चिंता
नगर निगम के दावों के बीच सबसे बड़ी चिंता व्यापारियों के बीच दिखाई दे रही है. कश्मीरी गंज में दुकान चलाने वाले उत्कर्ष पांडे कहते हैं कि प्रशासन स्वच्छता के नाम पर समस्या का आसान समाधान तलाश रहा है. उनके अनुसार जरूरत नियमों को सख्ती से लागू करने की है, न कि पूरे कारोबार को शहर से बाहर भेजने की. व्यापारियों का कहना है कि अधिकांश ग्राहक अपने घर से एक-दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित दुकानों से खरीदारी करते हैं. यदि दुकानों को आठ-दस किलोमीटर दूर स्थानांतरित कर दिया गया तो ग्राहक संख्या में भारी गिरावट आ सकती है.
अर्दली बाजार में दशकों पुरानी दुकान चलाने वाले कमरुद्दीन कुरैशी का दर्द अलग है. उनके अनुसार एक दुकान केवल व्यापारिक प्रतिष्ठान नहीं होती बल्कि वर्षों में बनी पहचान और विश्वास भी होती है. स्थानांतरण के बाद उन्हें दोबारा शून्य से शुरुआत करनी पड़ेगी. व्यापारियों का तर्क है कि किसी भी वैध कारोबार को शहर से बाहर भेजना समाधान नहीं हो सकता. अगर सफाई समस्या है तो बेहतर निगरानी, आधुनिक स्लॉटरहाउस और कड़े मानक लागू किए जा सकते हैं.
इस फैसले का असर केवल दुकानदारों तक सीमित नहीं है. कई उपभोक्ता भी इसे अव्यावहारिक मान रहे हैं. खजुरी निवासी लल्लू सिंह कहते हैं कि वर्तमान में वे पांच मिनट में अपनी पसंदीदा दुकान तक पहुंच जाते हैं. अगर दुकानें शहर के बाहर चली गईं तो उन्हें कई किलोमीटर अतिरिक्त यात्रा करनी होगी. होटल, ढाबे और रेस्तरां संचालकों की चिंता भी कम नहीं है. वरुणा ब्रिज के पास ढाबा चलाने वाले सौरभ सिंह का कहना है कि उन्हें रोजाना ताजा मटन पास की दुकान से मिल जाता है. स्थानांतरण के बाद परिवहन लागत बढ़ेगी और कारोबार प्रभावित होगा. उपभोक्ताओं का एक वर्ग यह भी पूछ रहा है कि अगर शहर के भीतर मांसाहारी भोजन परोसने वाले होटल और रेस्तरां चलते रहेंगे तो केवल दुकानों को बाहर भेजने से उद्देश्य कितना पूरा होगा.
विपक्ष का सवाल : शराब की दुकानों पर कार्रवाई क्यों नहीं?
फैसले का सबसे तीखा राजनीतिक विरोध समाजवादी पार्टी और कांग्रेस की ओर से सामने आया है. सपा के जिला अध्यक्ष सुजीत यादव का कहना है कि अगर धार्मिक आस्था को आधार बनाकर मांस की दुकानों को हटाया जा रहा है तो शराब की दुकानों पर भी समान नीति लागू होनी चाहिए. कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने भी इसी तर्क का समर्थन किया है.
विपक्ष का आरोप है कि धार्मिक पहचान की आड़ में एक विशेष प्रकार के कारोबार को निशाना बनाया जा रहा है जबकि शराब जैसी वस्तुओं पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया जा रहा. यह सवाल स्थानीय नागरिकों के बीच भी चर्चा का विषय बना हुआ है. कई लोगों का मानना है कि अगर उद्देश्य केवल धार्मिक पवित्रता है तो फिर शहर के भीतर संचालित बार, शराब की दुकानें और मांसाहारी भोजन परोसने वाले प्रतिष्ठानों पर भी समान दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए.
'गोट मीट डीलर्स एसोसिएशन' के सचिव नदीम अहमद का अनुमान है कि इस कारोबार से प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से करीब 20 हजार लोग जुड़े हुए हैं. इनमें केवल दुकानदार ही नहीं बल्कि मजदूर, ढुलाई के काम में लगे लोग, सप्लायर और उनके परिवार भी शामिल हैं. उनका कहना है कि नगर निगम ने प्रस्ताव को मंजूरी देने से पहले व्यापारिक संगठनों से कोई बातचीत नहीं की. अगर प्रशासन वास्तव में समाधान चाहता है तो मंदिर क्षेत्रों और प्रमुख तीर्थ मार्गों के आसपास विशेष प्रतिबंधों पर चर्चा हो सकती है लेकिन पूरे शहर को प्रतिबंधित क्षेत्र बनाना व्यावहारिक नहीं है. व्यापारिक संगठनों ने यह सुझाव भी दिया है कि आधुनिक बूचड़खाने शहर के बाहर बनाए जाएं, जहां से प्रोसेस्ड मीट शहर के भीतर लाइसेंस प्राप्त और बंद दुकानों में बेचा जा सके. इससे स्वच्छता की समस्या भी हल होगी और कारोबार भी प्रभावित नहीं होगा.
काशी में मांस की दुकानों का मुद्दा अब केवल बाजारों के स्थानांतरण का मामला नहीं रहा बल्कि यह उस बड़े सवाल का हिस्सा बन गया है कि धार्मिक नगरी के आधुनिकीकरण और पुनर्रचना की कीमत आखिर कौन चुकाएगा?