खूबसूरत बीवी की चाह में AI सुंदरियों का शिकार बन रहे युवा!
AI से बनाई गई सुंदरियों की तस्वीरें दिखाकर फर्जी मैरिज ब्यूरो ने 1700 से ज्यादा युवकों को जाल में फंसाया. शादी का सपना बेचकर करोड़ों रुपये की ठगी का खुलासा.

बाराबंकी के रामनगर निवासी 41 वर्षीय चंद्रेश कुमार पिछले कई वर्षों से अपने लिए जीवनसाथी की तलाश कर रहे थे. परिवार की चिंता बढ़ रही थी और रिश्तेदारों के सवाल भी. एक दिन फेसबुक स्क्रॉल करते हुए उनकी नजर एक मैरिज ब्यूरो के विज्ञापन पर पड़ी.
विज्ञापन में दावा किया गया था कि शिक्षित, सुंदर और संस्कारी लड़कियों के रिश्ते उपलब्ध हैं. नीचे एक मोबाइल नंबर था. चंद्रेश ने बिना ज्यादा सोचे फोन कर दिया. दूसरी तरफ से एक महिला की बेहद विनम्र और पेशेवर आवाज सुनाई दी.
उसने खुद को मैरिज काउंसलर बताया और भरोसा दिलाया कि कुछ ही दिनों में उनकी शादी की बात आगे बढ़ जाएगी. चंद्रेश को लगा कि शायद उनकी तलाश अब खत्म होने वाली है.
कुछ ही घंटों बाद उनके व्हाट्सएप पर एक युवती की तस्वीर आई. तस्वीर में लड़की बेहद आकर्षक दिख रही थी. साथ में उसकी प्रोफाइल भी भेजी गई थी. बताया गया कि वह पढ़ी-लिखी है, अच्छे परिवार से है और सरकारी नौकरी करती है. चंद्रेश को रिश्ता पसंद आ गया. इसके बाद उनसे तीन हजार रुपये पंजीकरण शुल्क मांगा गया. फिर प्रोफाइल तैयार करने के नाम पर पांच हजार रुपये और जमा कराए गए.
कुछ दिनों बाद बताया गया कि लड़की का परिवार भी रुचि दिखा रहा है, लेकिन प्रक्रिया आगे बढ़ाने के लिए अलग शुल्क देना होगा. फिर लड़की से बात कराने के नाम पर पैसे मांगे गए. कभी परिवार की सहमति शुल्क, कभी दस्तावेज सत्यापन शुल्क, कभी सुरक्षा जमा राशि. हर बार चंद्रेश को यही भरोसा दिया जाता कि अब रिश्ता लगभग तय है.
चार महीने के भीतर वह करीब चार लाख रुपये दे चुके थे. लेकिन न लड़की से मुलाकात हुई, न कोई रिश्ता तय हुआ. आखिरकार जब उन्हें शक हुआ और उन्होंने सख्ती दिखाई तो दूसरी तरफ से फोन आने बंद हो गए. तभी उन्हें एहसास हुआ कि वह ठगी का शिकार हो चुके हैं.्
चंद्रेश की शिकायत कानपुर पुलिस तक पहुंची और यहीं से उस नेटवर्क की परतें खुलनी शुरू हुईं जिसने कथित तौर पर करीब 1700 से 2000 लोगों को अपना शिकार बनाया था. पुलिस जांच में जो कहानी सामने आई, वह केवल एक मैरिज ब्यूरो की ठगी नहीं बल्कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सोशल मीडिया मार्केटिंग, कॉल सेंटर संचालन और मनोवैज्ञानिक हेरफेर के जरिए चलाए जा रहे एक संगठित अपराध की कहानी थी.
साइबर सेल ने सबसे पहले उन मोबाइल नंबरों की जांच शुरू की जिनसे चंद्रेश को कॉल आए थे. तकनीकी विश्लेषण में कई नंबरों की लोकेशन कानपुर के अलग-अलग इलाकों में एक ही नेटवर्क से जुड़ी मिली. करीब एक सप्ताह तक निगरानी और गोपनीय जांच के बाद क्राइम ब्रांच ने नौबस्ता, किदवई नगर और यशोदा नगर क्षेत्र में संचालित तीन कार्यालयों पर एक साथ छापेमारी की.
पुलिस जब वहां पहुंची तो उसे किसी मैरिज ब्यूरो से ज्यादा कॉल सेंटर जैसा दृश्य दिखाई दिया. कमरों में कतार से टेबल-कुर्सियां लगी थीं. लगभग दो दर्जन युवतियां मोबाइल फोन और कंप्यूटर के सामने बैठी लोगों से बात कर रही
थीं. कहीं शादी की बातचीत चल रही थी, कहीं किसी ग्राहक को समझाया जा रहा था कि लड़की का परिवार राजी हो गया है, तो कहीं किसी को जल्द भुगतान करने के लिए प्रेरित किया जा रहा था.
यहीं से पुलिस ने इस पूरे नेटवर्क के कथित मास्टरमाइंड रंजीश कुमार गौड़ को गिरफ्तार किया. छत्तीसगढ़ के भिलाई निवासी रंजीश की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है. इंटरमीडिएट पास रंजीश ने मैकेनिकल इंजीनियरिंग का डिप्लोमा शुरू किया था लेकिन पढ़ाई पूरी नहीं कर सका. इसके बाद उसने एक वास्तविक मैट्रिमोनियल कंपनी में नौकरी की. करीब डेढ़-दो साल तक वहां काम करते हुए उसने रिश्तों के कारोबार की बारीकियां सीखीं.
उसने समझा कि विवाह की तलाश में जुटे लोग कितने भावनात्मक होते हैं, वे कितनी जल्दी भरोसा कर लेते हैं और एक बार उम्मीद बंध जाने के बाद कितनी दूर तक जाने को तैयार हो जाते हैं. पुलिस के मुताबिक नौकरी छोड़ने के बाद उसने इन्हीं अनुभवों को अपने कारोबार की नींव बना लिया.
रंजीश ने अलग-अलग समय पर परफेक्ट रिश्ते, शादी मैच और शादी मैच इंडिया जैसे नामों से तीन संस्थान शुरू किए. इनका बाकायदा एमएसएमई पंजीकरण कराया गया ताकि लोगों को लगे कि वे किसी वैध संस्था से जुड़ रहे हैं. सोशल मीडिया पेज बनाए गए, वेबसाइट तैयार की गईं, पंपलेट छपवाए गए और डिजिटल विज्ञापन चलाए गए. बाहर से देखने पर सब कुछ एक पेशेवर वैवाहिक सेवा जैसा दिखाई देता था. लेकिन पुलिस का दावा है कि असल मकसद लोगों से पैसे ऐंठना था. इस पूरे नेटवर्क की सबसे आधुनिक और चौंकाने वाली कड़ी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) का इस्तेमाल था.
जांच में सामने आया कि ग्राहकों को जो लड़कियों की तस्वीरें भेजी जाती थीं, उनमें से अनेक तस्वीरें एआइ तकनीक से तैयार की गई थीं. ये तस्वीरें इतनी वास्तविक लगती थीं कि आम व्यक्ति उनके नकली होने का अंदाजा नहीं लगा सकता था. हर तस्वीर के साथ एक आकर्षक प्रोफाइल तैयार की जाती थी. किसी लड़की को बैंक अधिकारी बताया जाता, किसी को इंजीनियर, किसी को अध्यापिका और किसी को बड़े कारोबारी परिवार की बेटी. तस्वीरें और प्रोफाइल इतनी सावधानी से तैयार की जाती थीं कि सामने वाला व्यक्ति आसानी से विश्वास कर ले.
गिरोह की कार्यप्रणाली बेहद सुनियोजित थी. सबसे पहले फेसबुक और इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म पर विज्ञापन दिए जाते थे. "सरकारी नौकरी वाली लड़की उपलब्ध", "सुंदर और संस्कारी जीवनसाथी की तलाश खत्म", "बिना दहेज योग्य रिश्ते" जैसे संदेशों के जरिए लोगों को आकर्षित किया जाता था. जो व्यक्ति विज्ञापन पर प्रतिक्रिया देता, उसका मोबाइल नंबर और व्यक्तिगत जानकारी डेटाबेस में दर्ज कर ली जाती.
इसके बाद कॉल सेंटर की युवतियां उससे संपर्क करतीं. बातचीत का पहला उद्देश्य विश्वास पैदा करना होता था. ग्राहक की उम्र, नौकरी, आय, पारिवारिक स्थिति और विवाह को लेकर उसकी चिंता को समझा जाता था. फिर उसी हिसाब से उसके लिए रिश्ता चुना जाता था.
सबसे दिलचस्प बात यह थी कि ठगी एक ही बार में नहीं की जाती थी. पहले छोटी रकम ली जाती थी ताकि ग्राहक को संदेह न हो. तीन हजार रुपये का पंजीकरण शुल्क, पांच हजार रुपये की प्रोफाइल फीस, फिर मैचिंग शुल्क. इसके बाद लड़की का संपर्क विवरण देने के नाम पर अलग रकम. जब ग्राहक भावनात्मक रूप से जुड़ जाता तो उससे बड़े भुगतान मांगे जाते. कभी परिवार की सहमति शुल्क, कभी दस्तावेज सत्यापन शुल्क, कभी सुरक्षा जमा राशि. हर बार यह कहा जाता कि प्रक्रिया अंतिम चरण में पहुंच चुकी है और बस यह आखिरी औपचारिकता पूरी करनी है. यदि कोई ग्राहक लड़की से बात करने
की इच्छा जताता तो उसकी व्यवस्था भी कर दी जाती थी. लेकिन पुलिस के अनुसार फोन पर बात करने वाली वास्तविक लड़की नहीं होती थी. कॉल सेंटर में बैठी युवतियां ही अलग-अलग नाम और पहचान अपनाकर ग्राहकों से बात करती थीं. एक ही युवती अलग-अलग लोगों के लिए अलग नाम से बात कर सकती थी. किसी के लिए वह पूजा बन जाती, किसी के लिए नेहा और किसी के लिए स्वाति. बातचीत के दौरान उन्हें ग्राहक की प्रोफाइल पहले से दे दी जाती थी ताकि वे उसी अनुसार संवाद कर सकें. इससे ग्राहक को लगता था कि सामने वाली लड़की वास्तव में उसी में रुचि रखती है.
नेटवर्क ने लोगों को नियंत्रित रखने के लिए कुछ नियम भी बना रखे थे. ग्राहकों को बताया जाता था कि कंपनी की नीति के अनुसार 24 घंटे में केवल एक बार ही बातचीत हो सकती है. यदि कोई व्यक्ति दोबारा फोन करेगा तो उसे "लोकेशन वॉयलेशन" माना जाएगा और पेनाल्टी देनी पड़ेगी. यह पेनाल्टी चार से पांच हजार रुपये तक होती थी. कई लोग रिश्ता टूट जाने के डर से यह अतिरिक्त रकम भी जमा कर देते थे. इस तरह बातचीत भी कमाई का जरिया बन गई थी.
छापेमारी के दौरान पुलिस को लगभग 40 रजिस्टर मिले जिनमें ग्राहकों का पूरा रिकॉर्ड दर्ज था. किस व्यक्ति से कितनी बातचीत हुई, उससे कितनी रकम मिली, अगली बार उससे क्या मांगना है और वह भुगतान करने में कितना सक्षम है, सब कुछ लिखा हुआ था. पुलिस अधिकारियों के अनुसार यह रिकॉर्ड केवल एक वर्ष का था. इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि चार वर्षों के दौरान नेटवर्क कितना बड़ा हो चुका था.
पुलिस को 43 कीपैड मोबाइल, 13 एंड्रॉयड फोन, कई कंप्यूटर, एटीएम कार्ड, चेकबुक, क्यूआर कोड और बैंकिंग दस्तावेज भी मिले. जांच में 11 बैंक खाते सामने आए हैं. शुरुआती जांच में चार खातों में 41 लाख रुपये का लेनदेन पाया गया है. अधिकारियों का मानना है कि सभी खातों की जांच पूरी होने पर यह रकम कई करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है. अनुमान है कि गिरोह ने लगभग पांच करोड़ रुपये या उससे अधिक की ठगी की हो सकती है.
इस पूरे मामले का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि यह केवल एक आपराधिक घटना नहीं बल्कि बदलते साइबर अपराध का संकेत भी है. पहले ठग लोगों से बैंक खाते या ओटीपी मांगते थे. अब वे उनकी भावनाओं को निशाना बना रहे हैं. पहले इंटरनेट से तस्वीरें चुराई जाती थीं, अब एआई नई तस्वीरें बना रहा है. पहले नकली पहचान बनाना कठिन था, अब कुछ मिनटों में पूरी डिजिटल शख्सियत तैयार की जा सकती है. यही वजह है कि विशेषज्ञ इस तरह के मामलों को भविष्य के साइबर अपराध का नया चेहरा मान रहे हैं.