देश में सबसे फिसड्डी जोधपुर डिस्कॉम पूरे राजस्थान पर ‘बिजली’ गिरा सकता है!

भारी घाटे और बिजली चोरी के जाल में फंसी बिजली वितरण कंपनी जोधपुर डिस्कॉम के लिए राजस्थान सरकार अब निजीकरण की राह तलाश रही है

प्रतीकात्मक फोटो

राजस्थान की जोधपुर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड (जोधपुर डिस्कॉम) भजनलाल सरकार के लिए सबसे बड़ी प्रशासनिक और वित्तीय चुनौती बन गई है. बढ़ते घाटे, बिजली की छीजत (लाइन लॉस) और कमजोर कंज्यूमर सर्विस ने इस कंपनी की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. 

फरवरी 2026 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, जोधपुर डिस्कॉम का वित्तीय घाटा 29 हजार करोड़ रुपए का आंकड़ा पार कर चुका है. यह न केवल कंपनी की खराब आर्थिक सेहत को दर्शाता है, बल्कि पूरे राज्य के ऊर्जा क्षेत्र के लिए खतरे की घंटी भी है.

स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जयपुर और अजमेर डिस्कॉम में 12-12 जिले शामिल हैं. उनके मुकाबले कम क्षेत्र और कम उपभोक्ता होने के बावजूद जोधपुर डिस्कॉम का घाटा अनुपातिक रूप से कहीं ज्यादा है. प्रदेश की तीनों डिस्कॉम का कुल घाटा करीब 90 हजार करोड़ रुपए तक पहुंच चुका है. इससे साफ है कि बिजली वितरण तंत्र में संरचनात्मक खामियां गहराती जा रही हैं.

इस स्थिति से पार पाने के लिए सरकार पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मोड और निजीकरण की राह तलाश रही है. इसी सिलसिले में पिछले कुछ समय में केंद्र और राज्य सरकार के स्तर पर अहम बैठकें हुई हैं. राजस्थान के मुख्य सचिव वी. श्रीनिवास ने 13 मार्च 2026 को जयपुर के विद्युत भवन में जोधपुर डिस्कॉम की वित्तीय स्थिति (फाइनेंशियल रिस्ट्रक्चरिंग) की समीक्षा के लिए उच्च-स्तरीय बैठक बुलाई. इस बैठक में पीपीपी मोड और निजीकरण जैसे मुद्दों पर चर्चा की गई. 

केंद्र सरकार के स्तर पर भी जोधपुर डिस्कॉम के वित्तीय घाटे के पुनर्गठन को लेकर मंथन हो चुका है. जानकारों का मानना है कि सरकार जोधपुर डिस्कॉम को दो भागों में बांटने पर भी विचार कर रही है. इसमें ज्यादा बिजली चोरी वाले बाड़मेर और बालोतरा जैसे इलाकों को मिलाकर एक नया डिस्कॉम बनाया जा सकता है. साथ ही पाली और जालोर जैसे कम छीजत वाले जिलों को अन्य डिस्कॉम में रखने की कवायद चल रही है.

हालांकि, सरकार की इन कोशिशों का विरोध भी शुरू हो गया है. जोधपुर डिस्कॉम के कर्मचारियों और अधिकारियों ने संयुक्त संघर्ष समिति बनाकर निजीकरण का विरोध किया है. इसी के तहत 25 से 27 मार्च तक सभी कर्मचारी हाथ पर काली पट्टी बांधकर दफ्तर पहुंचे. 30 अप्रैल को जोधपुर डिस्कॉम मुख्यालय पर एक बड़ी सभा का आयोजन कर निजीकरण के खिलाफ आवाज उठाई गई.

ऊर्जा क्षेत्र के जानकार इस वित्तीय असंतुलन के पीछे कई कारण मानते हैं. विशेषज्ञ रविंद्र सिंह कहते हैं, "बिजली चोरी, बिलिंग व कलेक्शन की कमजोरी और सब्सिडी का समय पर भुगतान न होने से वित्तीय व्यवस्था चरमराई है. निजीकरण इसका समाधान नहीं हो सकता. इससे उपभोक्ताओं पर अनावश्यक आर्थिक बोझ पड़ेगा और प्रशासन के साथ टकराव की स्थितियां पैदा होंगी."

जोधपुर डिस्कॉम में बिजली की ज्यादा छीजत के चलते किसानों को दिन में बिजली आपूर्ति करने में बाधा आ रही है. फिलहाल राज्य के 12 जिले ऐसे हैं, जहां चोरी की घटनाएं कम होने के कारण किसानों को दिन में बिजली दी जा रही है. सरकार अन्य जिलों में भी यह सुविधा देना चाहती है, लेकिन जोधपुर डिस्कॉम में हो रही बिजली चोरी इसमें बड़ी रुकावट बनी हुई है.

विद्युत मंत्रालय की हालिया कंज्यूमर सर्विस रेटिंग रिपोर्ट ने भी निजीकरण की चर्चाओं को हवा दी है. इस रेटिंग में जोधपुर डिस्कॉम को ‘सी’ कैटेगरी में रखा गया है, जबकि जयपुर डिस्कॉम को ‘बी’ और अजमेर डिस्कॉम को ‘बी प्लस’ श्रेणी मिली है. देशभर में ‘ए प्लस’ श्रेणी में शामिल सात डिस्कॉम में से छह निजी क्षेत्र द्वारा संचालित हैं. यह इस बात की ओर इशारा करता है कि निजी भागीदारी से सेवा की गुणवत्ता में सुधार संभव है और यही तर्क अब राजस्थान में भी जोर पकड़ रहा है.

बिजली आपूर्ति के मोर्चे पर भी जोधपुर डिस्कॉम की स्थिति चिंताजनक है. शहरी क्षेत्रों में जहां छह डिस्कॉम 24 घंटे निर्बाध बिजली दे रहे हैं और 45 डिस्कॉम रोजाना 23 घंटे से अधिक बिजली आपूर्ति कर रहे हैं, वहीं जोधपुर डिस्कॉम इस मामले में देश में दूसरा सबसे खराब प्रदर्शन करने वाला डिस्कॉम है. यहां औसतन केवल 22 घंटे ही बिजली मिल पा रही है.

ग्रामीण क्षेत्रों में तो हालात और भी गंभीर हैं. देश के 66 डिस्कॉम में जोधपुर डिस्कॉम सबसे निचले पायदान पर है, जहां उपभोक्ताओं को प्रतिदिन केवल 19 घंटे बिजली मिल रही है. इसके विपरीत कई राज्यों के ग्रामीण इलाकों में 23 घंटे तक आपूर्ति सुनिश्चित की जा रही है.

डिस्ट्रीब्यूशन ट्रांसफार्मर फेलियर और डिस्ट्रीब्यूशन यूटिलिटी जैसे तकनीकी मानकों पर भी राजस्थान की तीनों डिस्कॉम का प्रदर्शन कमजोर रहा है, लेकिन जोधपुर डिस्कॉम की स्थिति विशेष रूप से खराब है. देशभर में इसे 54वीं रैंकिंग मिलना संकेत है कि न केवल बुनियादी ढांचा कमजोर है, बल्कि प्रबंधन और संचालन के स्तर पर भी व्यापक सुधार की जरूरत है.

राज्य सरकार के सामने जोधपुर डिस्कॉम को लेकर दोहरी चुनौती है. एक ओर वित्तीय घाटे को नियंत्रित करना और दूसरी ओर उपभोक्ताओं को बेहतर एवं निर्बाध बिजली देना. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते संरचनात्मक सुधार, तकनीकी अपग्रेडेशन और जवाबदेही तय नहीं की गई, तो जोधपुर डिस्कॉम का संकट पूरे राज्य के ऊर्जा क्षेत्र को अपनी चपेट में ले सकता है.

Read more!