असम में ज्यादातर सीटों पर JMM की जमानत जब्त; फिर भी खुश हैं हेमंत सोरेन!
असम में झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) ने जिन 16 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे थे, उनमें से 13 पर उसका मुकाबला झारखंड की गठबंधन सरकार में सहयोगी कांग्रेस से था

असम विधानसभा चुनाव में झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) ने कुल 16 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे. इनमें पार्टी को एक भी सीट पर सफलता नहीं मिली. फिर भी हेमंत सोरेन खुश हैं. चुनाव परिणाम के बाद उन्होंने अपने एक्स हैंडल पर लिखा, "सीमित संसाधनों और बिना किसी बड़े गठबंधन के JMM ने 16 सीटों पर चुनाव लड़कर अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई. पहली ही कोशिश में 2 सीटों पर दूसरे स्थान पर रहना और 7 सीटों पर 15 हजार से अधिक मत प्राप्त करना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि पार्टी ने जनता के बीच अपनी पकड़ बनानी शुरू कर दी है. यह प्रदर्शन दर्शाता है कि यह केवल शुरुआत है और आने वाले समय में संगठन और भी मजबूत होकर उभरेगा."
दिलचस्प बात यह भी है कि JMM ने जिन 16 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे थे, उनमें 13 सीटों पर JMM और झारखंड में सोरेन सरकार की सहयोगी कांग्रेस आमने-सामने थीं. इनमें तीन सीटों पर JMM ने कांग्रेस को पछाड़ा, जबकि 10 सीटों पर JMM पीछे रह गई. JMM 3 विधानसभा सीटों पर जमानत बचाने में सफल रही, लेकिन बाकी बची 13 सीटों पर उसकी जमानत जब्त हो गई. गौर करने वाली बात यह भी है कि जिन 13 सीटों पर JMM और कांग्रेस आमने-सामने थीं, वहां दोनों के वोट मिलकर भी विजेता को हराने की स्थिति में नहीं थे.
पार्टी जिन तीन सीटों पर बेहतर प्रदर्शन कर पाई, उनमें गोसाईगांव सीट से JMM प्रत्याशी फेडरिकसन हांसदा को 21,417 (21.40 प्रतिशत) वोट मिले. यहां कुल पांच प्रत्याशियों में JMM दूसरे स्थान पर रही. इस सीट पर बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट के सभाराम बासुमात्रे ने 22,977 वोटों से जीत हासिल की. वहीं कांग्रेस प्रत्याशी महज 15,128 वोटों के साथ तीसरे नंबर पर रहा. अगर JMM के 21,417 वोट कांग्रेस को मिलते तो नतीजा कुछ और हो सकता था.
मजबत सीट से प्रीति रेखा बारला को 29,172 (18.42 प्रतिशत) वोट मिले. यहां कुल 5 प्रत्याशियों में JMM दूसरे स्थान पर रही. कांग्रेस के नारायण अधिकारी 23,558 वोटों के साथ तीसरे नंबर पर रहे और अपनी जमानत नहीं बचा सके. इस सीट पर बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट के चरण बारो ने 55 हजार से ज्यादा वोटों से जीत दर्ज की.
इसी तरह भेरगांव सीट पर प्रभात दास पनिका को 21,997 (16.46 प्रतिशत) वोट मिले. यहां 8 प्रत्याशियों में JMM तीसरे स्थान पर रही. यहां कांग्रेस के प्रत्याशी चौथे स्थान पर रहे और उनकी जमानत जब्त हो गई. इसके अलावा बारछल्ला, रंगापाड़ा, बिस्वनाथ, रोंगानदी, मार्घेरीटा, डिग्बोई, चाबुआ, दुलियाजन, तिंगखोंग, नाहरकटिया, सोनारी, खुमताई और सरुपाथर सीट पर पार्टी की जमानत जब्त हो गई.
असम में JMM की आगे की तैयारी क्या है
बिना संगठन बनाए, चुनाव से मात्र दो महीने पहले सक्रिय होने और स्थानीय सामाजिक संगठनों के सहारे चुनाव लड़ने के बाद सवाल यह है कि आखिर JMM का हासिल क्या रहा? पार्टी के महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य कहते हैं, "पहला हासिल यह रहा कि हमारा फुटप्रिंट रजिस्टर हो गया. हमने मात्र 15 दिन के कैंपेन में 16 सीटों पर चुनाव लड़ा और कुल मतों का 1.5 प्रतिशत वोट हासिल किया."
वे आगे कहते हैं, "दूसरी बात यह कि हमने वहां की चाय जनजाति के लिए जिन मुद्दों को उठाया, उन सभी मुद्दों को अन्य पार्टियों ने भी स्वीकार किया. हमने वहां जाकर चाय वर्करों की दैनिक मजदूरी को 250 रुपए से बढ़ाकर 500 रुपए करने का वादा किया था. इसे बाकी पार्टियों ने भी अपने एजेंडे में शामिल किया. हमने कहा था कि चाय बागान में काम करने वालों को लेबर सेस का 20 प्रतिशत हिस्सा नकद देंगे. इसे भी कांग्रेस और बीजेपी ने अपने एजेंडे में शामिल किया. एसटी दर्जे की बात हमने उठाई और अब बीजेपी ने भी इसके वादे किए हैं. हमारे एजेंडे को बाकी दलों ने स्वीकारा, यह हमारी सबसे बड़ी उपलब्धि है."
इस सफलता के बाद क्या पार्टी राज्य की राजनीति में सक्रिय रहेगी? सुप्रियो कहते हैं, "अभी तो हमने कदम रखा है. अब पैर जमाने का समय है. फसल भी बोएंगे और उसकी कटाई भी करेंगे."
जय भारत पार्टी वह संगठन है जिसके कार्यकर्ताओं के दम पर JMM ने असम चुनाव लड़ा. इसी सवाल के जवाब में संगठन के सचिव जूना कुजूर कहते हैं, "यहां आगे की लड़ाई जय भारत पार्टी ही लड़ेगी. JMM यहां अपना संगठन क्यों खड़ा करेगी? ऐसी कोई बात नहीं है. हम जिस ताकत से लड़ रहे हैं, उसे दो भागों में क्यों बांटेंगे? हमारे संगठन की बूथ स्तर से विधानसभा स्तर तक कमेटियां बन चुकी हैं और लोग जुड़ चुके हैं."
वे आगे कहते हैं, "चुनाव भले ही हमने JMM के निशान पर लड़ा, लेकिन यहां कार्यकर्ताओं से लेकर प्रत्याशी तक हमारे ही संगठन के थे. आगे भी हम इसी लाइन पर राजनीति करते रहेंगे. JMM हमें आर्थिक मदद करती रहेगी. अभी तक अलग से संगठन खड़ा करने को लेकर कोई बात नहीं हुई है. हम असम के रहने वाले हैं और झारखंड के नाम से यहां सफल नहीं हो पाएंगे."
जूना के दावों और JMM के अपने संगठन बनाने के सवाल पर सुप्रियो भट्टाचार्य ने सीधे तौर पर कुछ नहीं कहा. उन्होंने केवल इतना कहा, "सिंबल और पहचान हमारी होगी और संगठन उनका होगा. चुनाव से पहले भी यही समझौता था और आगे भी फिलहाल इसी समझौते के तहत बढ़ेंगे."
दोनों के बयानों से फिलहाल यह तस्वीर उभर रही है कि जय भारत पार्टी को अगले पांच साल तक JMM से केवल आर्थिक मदद की अपेक्षा नहीं रखनी होगी. उसे अपने दम पर संगठन का विस्तार करना होगा और राजनीति में पैठ बढ़ानी होगी. अगर JMM आर्थिक मदद करती भी है, तो इसकी गारंटी नहीं है कि जय भारत पार्टी आगामी चुनाव में इसी फॉर्मेट में चुनाव लड़ेगी. फिलहाल इसका जवाब 'नहीं' है. ऐसे में JMM असम की राजनीति में कितनी सक्रिय रहेगी, इसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता है.