हेमंत सोरेन ने असम चुनाव में उतारे उम्मीदवार; आखिर कांग्रेस से क्यों नहीं बनी बात?

झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के असम चुनाव में अपने उम्मीदवार उतारने के बाद सबसे बड़ा सवाल है कि क्या इसका हेमंत सोरेन की गठबंधन सरकार पर कोई असर पड़ सकता है

Hemant  Soren with JBP Leader Teharu Gorh
हेमंत सोरेन पिछले दिनों असम के दौरे पर थे (फाइल फोटो)

बीते बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान टिकट घोषणा करने के आखिरी दिन तक इंडिया गठबंधन ने झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) को फंसा कर रखा. परिणाम यह हुआ कि गठबंधन के तहत उसे एक भी सीट नहीं मिली और वह चुनाव नहीं लड़ पाया. शायद यही वजह रही कि असम विधानसभा चुनाव के लिए पार्टी पहले से ही तैयार थी.

यहां भी कांग्रेस ने गठबंधन करने का प्रयास किया, लेकिन JMM को मनमुताबिक सीटें नहीं मिल रही थीं. ऐसे में उम्मीदवार घोषणा के आखिरी दिन यानी 23 मार्च को पार्टी ने कुल 21 सीटों पर अपने प्रत्याशियों के नाम घोषित कर दिए. पार्टी सूत्रों के मुताबिक, JMM राष्ट्रीय पार्टी बनने की दिशा में पूरी गंभीरता से काम कर रही है. असम चुनाव को उसी कड़ी का पहला और बड़ा कदम माना जा रहा है.

JMM जिन सीटों पर चुनाव लड़ने जा रही है, उनमें माजबात, बिस्वनाथ, खुमटाई, चाबुआ, गोसाईंगांव, सोनारी, दुलियाजान, रोंगानदी, डिग्बोई, भेरगांव, टिंगखोंग, बोरसला, रंगापाड़ा, मार्घेरीटा, नाहरकटिया, माकुम, दुमदुमा, सरूपाथर, तिताबोर, बोकाजन (एसटी) और खोवांग सीट शामिल हैं. ध्यान देने वाली बात यह है कि इन 21 सीटों में मात्र एक सीट एसटी आरक्षित है. असम में 9 अप्रैल को मतदान होना है और 4 मई को नतीजे घोषित किए जाएंगे.

कांग्रेस के साथ गठबंधन के लिए बीते 12 मार्च को असम कांग्रेस अध्यक्ष व सांसद गौरव गोगोई और असम प्रभारी जितेंद्र भंवर सिंह, सीएम हेमंत सोरेन से मिलने रांची पहुंचे थे. सूत्र बताते हैं कि हेमंत सोरेन गठबंधन के मूड में बिल्कुल नहीं थे. झारखंड कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक, “JMM ने कुल 30 सीटों की मांग कर डाली थी, जबकि पार्टी उन्हें 4 सीटें देने और 2 पर 'फ्रेंडली फाइट' का ऑफर दे रही थी. नई पार्टी के लिहाज से JMM के लिए यह बेहतर ऑफर था, जिस पर हेमंत सोरेन नहीं माने और सहमति नहीं बन पाई. कोई बड़ा खतरा न देखते हुए कांग्रेस ने भी इसमें अतिरिक्त रुचि नहीं दिखाई.”

झारखंड कांग्रेस के कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष और असम कांग्रेस के ऑब्जर्वर बंधु तिर्की कहते हैं, "कांग्रेस पार्टी की तरफ से प्रयास किए गए, लेकिन परिणाम सकारात्मक नहीं आए. अगर दोनों दल साथ होते, तो एक-दूसरे को मजबूत करते. परिणाम जो भी हो, लेकिन इससे टी-ट्राइब (चाय बागान श्रमिक) के वोटों के बंटने की संभावना बढ़ गई है."

सवाल यह भी है कि क्या JMM असम चुनाव में केवल 'वोटकटवा' साबित होगी या कुछ सीटों पर जीत हासिल कर गेमचेंजर बनेगी? पार्टी महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य कहते हैं, "हेमंत और कल्पना सोरेन का कैंप होने दीजिए, जवाब मिल जाएगा." वहीं पार्टी के दूसरे नेताओं का मानना है कि JMM पूरी तैयारी के साथ चुनाव लड़ रही है और पार्टी पिछले छह महीने से वहां लगातार कैंप कर रही है. स्थानीय लोगों को विश्वास में लेने के बाद ही वह चुनावी मैदान में उतरी है. इन नेताओं को भरोसा है कि JMM चौंकाने वाले परिणाम देगी.

वहीं असम कांग्रेस के एक प्रवक्ता ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, "चूंकि यह मामला हमारे प्रदेश अध्यक्ष और झारखंड के सीएम के बीच का है, इसलिए मैं सीधे तौर पर कुछ नहीं कहूंगा. लेकिन अपने अनुभव से कह सकता हूं कि जिन लोगों को JMM ने उम्मीदवार बनाया है, उन्हें उनके इलाके में भी बहुत कम लोग जानते हैं."

इन्हीं कांग्रेस नेता का दावा है कि टी-ट्राइब का झुकाव JMM की तरफ नहीं होगा. वे कहते हैं, “ जिस टी-ट्राइब के सहारे वे सीटें जीतने की सोच रहे हैं, उनकी जड़ें भले ही झारखंड, ओडिशा या बिहार से हों, लेकिन अब वे यहां के मूलवासी बन चुके हैं. उनकी पांचवीं-छठी पीढ़ी यहां रह रही है. उनके मन में हेमंत सोरेन या JMM को लेकर कोई विशेष उम्मीद नहीं है. JMM उम्मीद भले ही कर ले, लेकिन परिणाम नहीं आएंगे.

तीसरी बात, पार्टी के नाम को लेकर भी दिक्कत हो सकती है. नाम में 'झारखंड' है, जिससे असम का कोई सीधा ताल्लुक नहीं है, इसलिए लोग जुड़ाव महसूस नहीं कर पाएंगे. इसकी जगह अगर 'असम मुक्ति मोर्चा' जैसा कुछ होता, तो शायद फर्क पड़ सकता था.

जानकार यह भी बताते हैं कि हेमंत सोरेन के आने से टी-ट्राइब का वोट बैंक कई हिस्सों में बंट जाएगा. कुछ BJP, कांग्रेस और अन्य स्थानीय दलों के साथ चले जाएंगे, तो कुछ हेमंत सोरेन के साथ. ऐसे में टी-ट्राइब की सामूहिक राजनीतिक शक्ति कम होगी. अगर वे बंटे, तो भविष्य में उन्हें वह तवज्जो नहीं मिल पाएगी, जिसकी लड़ाई वे दशकों से लड़ रहे हैं.

झारखंड में गठबंधन पर कितना असर

JMM के इस निर्णय पर कांग्रेस पार्टी ने मिली-जुली प्रतिक्रिया दी है. पार्टी प्रवक्ता राकेश सिन्हा ने कहा, "हर पार्टी विस्तार करना चाहती है, इसमें कोई बड़ी बात नहीं है. हम चाहते थे कि एकता बने, लेकिन ऐसा नहीं हो सका."

जवाब में JMM प्रवक्ता मनोज पांडेय ने कहा, "अभी भी समय है; जिन सीटों पर हमने उम्मीदवार उतारे हैं, कांग्रेस वहां अपने प्रत्याशी न उतारे तो गठबंधन की गाड़ी चल पड़ेगी. हम आश्वस्त हैं कि JMM के बिना वहां कोई पार्टी सरकार नहीं बना सकती."

इन सबके इतर, JMM और कांग्रेस के बीच मतभेदों की खबरें गठबंधन सरकार बनने के कुछ समय बाद से ही लगातार आ रही हैं. इस चर्चा को हवा तब मिली जब हाल ही में झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा (JLKM) के एकमात्र विधायक जयराम महतो ने कहा कि राज्यसभा चुनाव के बाद राज्य में कांग्रेस-BJP मुक्त सरकार बनेगी.

क्या यह संभव है? समीकरण देखें तो JMM के 36 विधायक, RJD के 4, लेफ्ट के 2 और जरूरत पड़ने पर JDU (1) व JLKM (1) के साथ बहुमत का 41 का आंकड़ा पार किया जा सकता है. चर्चा यह भी है कि RJD के चारों विधायकों का विलय कराया जा सकता है, जिससे JMM की संख्या 40 हो जाएगी. फिलहाल, पिक्चर अभी बाकी है.

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