झारखंड : क्या सच में छात्रसंघ चुनाव में मतदान का अधिकार खत्म हो जाएगा?
झारखंड विधानसभा में 26 अगस्त को झारखंड राज्य विश्वविद्यालय विधेयक 2025 पारित किया गया. विधेयक के मुताबिक राज्य में अब किसी भी विश्वविद्यालय छात्र संघ में अध्यक्ष का चयन निर्वाचक मंडल करेगा

निर्वाचक मंडल सुनने में आम-सा शब्द लगता है लेकिन बीते दो-चार दिन से झारखंड के कॉलेज-यूनिवर्सिटियों के छात्र-छात्रा इसको लेकर दुविधा में हैं या फिर आक्रोश में.
दरअसल इसी हफ्ते 26 अगस्त को झारखंड विधानसभा में झारखंड राज्य विश्वविद्यालय विधेयक 2025 पारित किया गया. विधेयक के मुताबिक राज्य में अब किसी भी विश्वविद्यालय छात्र संघ में अध्यक्ष का चयन निर्वाचक मंडल करेगा.
राज्य के छात्रसंघों के लिए यह शब्द एक उलझन बन गया है क्योंकि वे यह नहीं समझ पा रहे कि इस मंडल का आकार क्या होगा, प्रारूप क्या होगा.
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABPV), ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन (आजसू) ने तो सीधे तौर पर आरोप लगाया कि निर्वाचक मंडल ही सबकुछ करेगा, तो छात्र क्या करेंगे. इससे तो उनके मतदान का अधिकार छिन जाएगा. दोनों संगठन विरोध में राज्य सरकार के खिलाफ सड़क पर उतर गए और राज्यपाल को ज्ञापन देने पहुंच गए. मामला यहीं नहीं रुका, विधानसभा के मानसून सत्र के आखिरी दिन यानी 28 अगस्त को विपक्ष की तरफ से इसको लेकर चिंता जाहिर की गई. छात्रों के लोकतांत्रिक अधिकार खत्म करने का आरोप लगाया गया.
नए विधेयक के मुताबिक अध्यक्ष, सचिव का चुनाव होगा. लेकिन उपाध्यक्ष, संयुक्त सचिव, कोषाध्यक्ष जैसे पदों को खत्म कर दिया गया है. इसकी जगह एक महिला प्रतिनिधि, एक एससी या एसटी या पिछड़ा वर्ग से एक-एक सदस्य का चयन अनिवार्य किया गया है. यही व्यवस्था विश्वविद्यालय के संबद्ध महाविद्यालयों के लिए भी होगी.
विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में निर्वाचक मंडल में नियमित छात्र शामिल रहेंगे. साथ ही प्रत्येक विभाग से एक छात्र प्रतिनिधि का चुनाव होगा, जिसे उस विभाग के नियमित छात्र चुनेंगे. छात्र संगठनों ने सवाल उठाया कि विभागों से जो छात्र प्रतिनिधि चुनकर आएंगे, क्या केवल वही निर्वाचक मंडल के सदस्य होंगे?
विधेयक पेश करनेवाले राज्य के उच्च शिक्षा मंत्री सुदिव्य सोनू कहते हैं, “नहीं, ऐसा बिल्कुल भी नहीं है. विधेयक में स्पष्ट है कि निर्वाचक मंडल में सभी नियमित छात्र होंगे. विश्वविद्यालय और महाविद्यालय दोनों जगहों पर सभी नियमित छात्रों को मतदान का अधिकार होगा. जो विभागों से प्रतिनिधि चुने जाएंगे, वो छात्र संघ में अपने विभाग का प्रतिनिधित्व करेंगे.”
विपक्ष पर हमला बोलते हुए उन्होंने कहा, ‘’अनपढ़ों की नहीं, कुपढ़ों की जमात है विपक्ष. कहीं भी छात्रों को लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन नहीं हुआ है.’’
कुछ सवालों का जवाब जो छात्र मांग रहे हैं
ऑल इंडिया स्टूडेंट एसोसिएशन (AISA) के राज्य सचिव त्रिलोकी ने सरकार के पूरे प्रस्ताव पर कई सवाल खड़े किए. उन्होंने कहा, ‘’छात्र संगठन में जो रहते हैं वो राजनीतिक विचार के होते हैं. विश्वविद्यालय एक ऐसी जगह है जहां तमाम तरह के राजनीतिक विचारधारा के छात्र होते हैं, बहस होती है. लेकिन सरकार ने साफ कहा है कि छात्र संघ चुनाव वाले छात्र नेता किसी राजनीतिक पार्टी से जुड़े हुए नहीं होंगे. ये छात्रों को लोकतांत्रिक अधिकार पर सीधे हमला है.’’
इसके साथ ही वे पूछते हैं कि सरकार ने पूर्णकालिक छात्र किसको माना है, इसे स्पष्ट नहीं किया है. क्या इसमें इग्नू, वोकेशनल कोर्स, डिप्लोमा कोर्स वाले को नियमित छात्र नहीं माना जाएगा. अगर ऐसा हुआ तो बड़ी संख्या में छात्र मताधिकार से वंचित हो जाएंगे. फिर उनके सवाल को कौन उठाएगा.
वे कॉलेज जो यूनिवर्सिटी से जुड़े तो हैं, लेकिन ऑटोनॉमस बॉडी है. वहां चुनाव का कोई प्रावधान नहीं है. इस बात का जिक्र करते हुए त्रिलोकी कहते हैं कि ऐसे में उन छात्रों की समस्या को कौन उठाएगा. इसमें सिर्फ पीजी छात्रों की बात कर रही है. जब लोकसभा, विधानसभा के चुनाव में 18 साल के बाद लोग वोट कर सकते हैं, तो कॉलेज में पीएचडी वाले क्यों नहीं करेंगे.
त्रिलोकी एक और बात की तरफ इशारा करते हैं. वे कहते हैं, “छात्रसंघ की बैठक की अध्यक्षता कुलपति करेंगे. जाहिर है, ऐसे में बैठक भी वही बुलाएंगे. यानी जब उनकी मर्जी होगी, तभी बुलाएंगे. फिर समाधान कैसे होगा.’’
वहीं एबीवीपी के झारखंड प्रदेश मंत्री मनोज सोरेन का कहना है, “राज्य सरकार को अगर किसी तरह का परिवर्तन करना था, तो पहले छात्र संगठनों से राय मशविरा कर लेते. जहां तक बात इस विधेयक के माध्यम से राज्यपाल के अधिकारों में कटौती की बात है, हम इसके खिलाफ जनहित याचिका दाखिल (PIL) दाखिल करने जा रहे हैं.’’
मनोज ने तमिलनाडू में ऐसे ही प्रावधान का जिक्र किया. जहां उन्होंने बताया कि हाईकोर्ट ने तमिलनाडू सरकार के ऐसे ही फैसले को निरस्त कर दिया है. वे आगे यह भी मांग उठाते हैं, “कॉलेज/विश्वविद्यालय स्तर पर पंजीकृत छात्र संगठनों को वैधानिक मान्यता दी जाए. उन्हें छात्र संघ चुनावों में भाग लेने का वैधानिक अधिकार मिले. छात्र संघ को केवल “औपचारिक समिति” न बनाकर, उसे विश्वविद्यालय/कॉलेज की नीतियों (शुल्क, हॉस्टल, पुस्तकालय, परिवहन आदि) पर परामर्श और अनुशंसा का अधिकार दिया जाए.’’
मनोज के मुताबिक इस विधेयक में केवल यह उल्लेख है कि छात्रसंघ का गठन होगा और उसके चुनाव का तरीका तय होगा, लेकिन उसमें संगठनों की भागीदारी या मान्यता का ज़िक्र नहीं है. उनका मानना है कि इस विधेयक में इलेक्शन के माध्यम से नहीं बल्कि सिलेक्शन के माध्यम विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव कराया जाएगा.
आजसू छात्र संघ के प्रदेश अध्यक्ष ओम वर्मा ने सरकार के फैसले के विरोध में 28 अगस्त को राज्यपाल को ज्ञापन सौंपकर अपना विरोध जताया है. वे भी इस विधेयक के इस प्रावधान पर आपत्ति जताते हैं कि छात्रों और छात्र संगठनों को राजनीतिक दलों से जुड़ा हुआ नहीं होना चाहिए. वे कहते हैं, “हेमंत सोरेन सरकार ने उपाध्यक्ष, संयुक्त सचिव, कोषाध्यक्ष के पद को खत्म कर राजनीति की शुरूआत कर दी है. यही नहीं, उन्होंने इस विधेयक के माध्यम से राज्यपाल की शक्तियों को भी छीन लिया है. राजभवन कितनी भी राजनीति करेगी, राज्य सरकार के कम करेगी. राज्य सरकार पूरी तरह पॉलिटिकल बॉडी है. उसे विश्वविद्यालय जैसे स्वतंत्र संस्था से खुद को अलग ही रखना चाहिए.’’
राज्य की सत्ताधारी पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा में छात्र संघ तो है, लेकिन फिलहाल उसमें कोई पदाधिकारी नहीं है. पार्टी के प्रवक्ता और रांची यूनिवर्सिटी के पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष तनुज खत्री कहते हैं, “इस बार एक महिला प्रतिनिधि के अलावा एसटी, एससी, पीवीटीजी या ओबीसी वर्ग से एक प्रतिनिधि का होना अनिवार्य होगा. इससे हर वर्ग और समुदाय के छात्रों की आवाज़ छात्र संघ तक पहुंचेगी.’’ वे बीजेपी पर आरोप लगाते हैं, “उनका असली दर्द यह है कि अब विश्वविद्यालयों का अधिकार झारखंड की चुनी हुई सरकार और झारखंडी युवाओं के पास जा रहा है. अब फैसले झारखंड की धरती पर होंगे, दिल्ली से आदेश नहीं आएगा, उन्हें यह नागवार गुजर रहा है.’’
कब हो पाएगा छात्रसंघ का चुनाव
रांची यूनिवर्सिटी सहित राज्यभर के कई विश्वविद्यालयों, कॉलेजों में साल 2019 के बाद से छात्रसंघ के चुनाव ही नहीं हुए हैं. विरोध और समर्थन के बीच असल सवाल ये है कि क्या छात्रसंघ के चुनाव हो पाएंगे? अभी तक छात्रसंघ के चुनाव न होने की एक सीधी वजह से यही लगती है कि राज्यपाल इसको लेकर उत्साहित नहीं हैं.
त्रिलोकी तीन महीने पहले राज्यपाल संतोष गंगवार के साथ हुई एक मुलाकात का जिक्र करते हुए दावा करते हैं, “जब हम छात्रसंघ चुनाव के मुद्दे पर उनसे मिलने गए तो उन्होंने पूछा कि छात्रसंघ चुनाव होने से क्या बदल जाएगा? छात्रसंघ में केवल गुंडागर्दी होती है, हुड़दंग होता है. जवाब में हमने कहा कि फिर तो लोकसभा और विधानसभा में इससे ज्यादा गुंडई और हुड़दंग होता है, उसे भी बंद करा देना चाहिए. इस पर राज्यपाल चुप हो गए.”
दूसरी वजह, लिंगदोह कमेटी की अनुशंसा है. इसके मुताबिक छात्रसंघ चुनाव लड़ने की उम्र ग्रेजुएट छात्रों के लिए 17 से 22 वर्ष, पोस्ट ग्रेजुएट छात्रों के लिए अधिकतम 25 वर्ष और शोध छात्रों के लिए: अधिकतम 28 वर्ष तय की गई है. जबकि हालात ये हैं कि झारखंड के तमाम विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों में सेशन लेट चल रहे हैं. ऐसे में चुनाव के जो संभावित उम्मीदवार होते हैं, कोर्स के दौरान ही वे अधिकतम आयु सीमा को पार कर जाते हैं.
छात्रों को कम ही उम्मीद है कि नई व्यवस्था के बावजूद छात्रसंघ चुनाव हो पाएंगे. हालांकि सरकार के लिए एक बड़ा मौका बन सकता है कि छात्रों की इस मांग को पूरा करे और उनकी आशंका को दूर करे.