झारखंड में सूचना आयुक्त की नियुक्ति पर सरकार-विपक्ष साथ लेकिन राज्यपाल ने फंसाया पेच
झारखंड के राज्य सूचना आयोग में मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों के पद पिछले पांच वर्षों से खाली हैं

ऐसा लगता है जैसे झारखंड में सूचना का अधिकार (RTI) कानून व्यवहारिक रूप से अप्रभावी दिख रहा है. दरअसल इस वक्त राज्य में RTI के तहत 25,000 से अधिक अपील और शिकायत के मामले लंबित हैं, तो दूसरी तरफ राज्य सूचना आयोग में मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों के पद पिछले पांच वर्षों से खाली हैं.
आयोग निष्क्रिय होने के कारण मई 2020 के बाद से शिकायतों की सुनवाई पूरी तरह ठप है. इन सबके बीच छह साल बाद बीते मार्च में इन नियुक्तियों को लेकर सुगबुगाहट शुरू हुई. यह पहला मौका है जब झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) , BJP और कांग्रेस किसी मसले पर आपसी सहमति बना पाए हैं.
दरअसल, बीते 25 मार्च को चार सूचना आयुक्तों की नियुक्ति को लेकर सीएम हेमंत सोरेन, नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी और अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री हफीजुल हसन एक साथ बैठे. इस दौरान चार नाम तय किए गए. इनमें एक पत्रकार अनुज सिन्हा के अलावा JMM के प्रवक्ता तनुज खत्री, कांग्रेस नेता अमूल्य नीरज खलखो और BJP नेता शशिभूषण पाठक का नाम तय किया गया और फाइल राजभवन भेज दी गई.
इधर, चारों के नाम सामने आते ही सूचना अधिकार कार्यकर्ताओं ने आपत्ति जाहिर की. उन्होंने नियमों का हवाला देते हुए कहा कि सूचना आयुक्त कोई राजनीतिक व्यक्ति नहीं बन सकता. बीते 10 अप्रैल को राजभवन ने भी इन नामों पर आपत्ति जताई और कहा कि RTI एक्ट की धारा 15(6) के अंतर्गत नेता आवेदन नहीं कर सकते. अनुज सिन्हा के अलावा बाकी तीनों व्यक्ति विभिन्न पार्टियों के पदाधिकारी हैं और उनका क्षेत्र राजनीति है.
जवाब में बीते 18 अप्रैल को झारखंड सरकार ने कहा कि ये तीनों नेता सूचना आयुक्त बनने के लिए जरूरी योग्यताएं पूरी करते हैं. राजनीतिक क्षेत्र से होते हुए भी ये समाज सेवा के विख्यात व्यक्ति हैं. इन नेताओं पर RTI एक्ट की धारा 15(6) लागू नहीं होती. साथ ही विज्ञापन के अनुसार, राजनीतिक व्यक्ति को नियुक्ति के पूर्व त्यागपत्र देना होगा. इन जवाबों के साथ फाइल दोबारा राजभवन को भेज दी गई.
खींचतान के बीच बीते 22 अप्रैल को राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार ने दूसरी बार नियुक्ति की फाइल राज्य सरकार को लौटा दी है. इस बार सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का हवाला देते हुए कहा गया है कि पूरी प्रक्रिया नियमों के अनुरूप अपनाई जाए और जिनके खिलाफ एफआईआर दर्ज है, उनकी नियुक्ति उचित नहीं है. मिली जानकारी के मुताबिक, कांग्रेस नेता अमूल्य नीरज खलखो पर पांच और JMM नेता तनुज खत्री के खिलाफ पुलिस में एक एफआईआर दर्ज है और ये मामले कोर्ट में लंबित हैं.
राजभवन ने स्पष्ट किया है कि RTI एक्ट की धारा 15(6) के तहत राजनीतिक क्षेत्र से जुड़े व्यक्ति सूचना आयुक्त नहीं बन सकते. साथ ही यह भी कहा गया कि बिना मुख्य सूचना आयुक्त के राज्य सूचना आयोग का गठन संभव नहीं है, जबकि इस पद के लिए अभी तक कोई नाम नहीं भेजा गया है.
राज्य सरकार की तरफ से कुछ और सवालों का जवाब देना अभी बाकी है. जैसे- पूरी नियुक्ति प्रक्रिया में क्या "अंजलि भारद्वाज बनाम भारत संघ" के मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन किया गया? क्या पारदर्शिता के लिए विभाग की वेबसाइट पर अभ्यर्थियों के नाम और उनके क्षेत्र सार्वजनिक किए गए थे? क्या इनमें से किसी पर कोई आपराधिक मुकदमा भी चल रहा है? क्या अभ्यर्थियों के नामों की स्क्रूटनी हुई थी और किस आधार पर कितने लोगों के नाम छंटे? मुख्य सूचना आयुक्त के बिना राज्य सूचना आयोग का गठन कैसे होगा?
इधर, मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों की नियुक्ति को लेकर झारखंड हाईकोर्ट में साल 2021 से पीआईएल (PIL) की सुनवाई चल रही है. बीते 14 अप्रैल को मामले की सुनवाई के दौरान झारखंड सरकार ने हाईकोर्ट के सामने कई बार कहा कि वह एक हफ्ते, चार हफ्ते या एक महीने के भीतर सूचना आयुक्तों की नियुक्ति कर कोर्ट को सूचित करेगी.
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश क्या हैं
सूचना आयुक्तों की नियुक्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने "अंजलि भारद्वाज बनाम भारत संघ" मामले में स्पष्ट किया है कि आयोग में ऐसे लोगों की नियुक्ति होनी चाहिए जो अनुभवी, निष्पक्ष, विविध पृष्ठभूमि से आने वाले और सार्वजनिक हित के प्रति प्रतिबद्ध हों. कोर्ट ने कहा कि चयन केवल औपचारिक प्रक्रिया न होकर योग्यता और मेरिट पर आधारित होना चाहिए. उम्मीदवार का रिकॉर्ड साफ हो और वह स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने में सक्षम हो. साथ ही सरकारों को चयन के मानदंड और शॉर्टलिस्ट किए गए उम्मीदवारों की जानकारी सार्वजनिक करने का निर्देश दिया गया है, ताकि नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता बनी रहे और जनता का भरोसा कायम रहे.
इस मामले में जनहित याचिका दाखिल करने वाले झारखंड हाईकोर्ट के वकील और सूचना अधिकार कार्यकर्ता सुनील महतो कहते हैं, "जिसके ऊपर पारदर्शिता बरतने की जिम्मेदारी है, उनकी नियुक्ति ही गैर-पारदर्शी तरीके से की जा रही है. सरकार बिल्कुल नहीं चाहती कि सूचना आयुक्त की नियुक्ति हो और राज्य में सूचना के अधिकार को सही से लागू किया जा सके."
इधर 23 अप्रैल को राज्य सरकार के लिए हाईकोर्ट से राहत भरी खबर मिली. PIL की सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कहा कि चूंकि सुप्रीम कोर्ट में अंजलि भारद्वाज वाले मामले की सुनवाई चल रही है, ऐसे में वह इसमें दखल नहीं दे सकता. इसके बाद मामले को खारिज कर दिया गया.