राज्यसभा चुनाव का गणित या असम की तल्खी : क्यों बढ़ा JMM और कांग्रेस में टकराव?

JMM का असम में चुनाव लड़ना कांग्रेस को पहले से असहज कर रहा था, वहीं मई-जून में झारखंड से राज्यसभा की दो सीटों के लिए होने वाले चुनाव ने भी दोनों पार्टियों के बीच तल्खी बढ़ा दी है

झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन (फाइल फोटो)

झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) और कांग्रेस एक बार फिर आमने-सामने आ गए हैं. दरअसल JMM के असम में चुनावी अभियान शुरू करने के साथ ही झारखंड सरकार में साझीदार दोनों पार्टियों के बीच तल्खी बढ़ने लगी है. JMM ने कांग्रेस को 'सांप से भी ज्यादा जहरीला' करार दिया है. जवाब में कांग्रेस ने कहा है कि राज्य में कानून-व्यवस्था के हालात बहुत खराब हैं और पार्टी माइनिंग माफिया के खिलाफ सड़क पर उतरेगी.

बीते 30 मार्च को JMM के महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य ने कांग्रेस पर तीखा हमला बोला. उन्होंने कहा कि रंग बदलने में BJP अगर गिरगिट को पीछे छोड़ देती है, तो केंचुली उतारने में कांग्रेस सांप से भी आगे है. इसके जवाब में अगले दिन प्रदेश कांग्रेस प्रभारी के. राजू ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा कि राज्य में खनन माफिया काफी मजबूत हो गया है.

31 मार्च को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में राजू ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार खनन माफिया के दबाव में काम कर रही है. उन्होंने दावा किया कि जिला कलेक्टर इस लॉबी का सहयोग कर रहे हैं. अधिकारियों और खनन कंपनियों के बीच मिलीभगत है. भू-स्वामियों को भूमि अधिग्रहण अधिनियम 2013 के तहत पर्याप्त मुआवजा नहीं मिल रहा है. उन्होंने आगे यह चेतावनी भी दी कि इस सबके खिलाफ पार्टी कलेक्ट्रेट और बीडीओ कार्यालयों का घेराव करेगी.

कांग्रेस के इस बयान पर JMM के केंद्रीय प्रवक्ता मनोज पांडेय ने कहा, “हम एक-दूसरे के दुश्मन नहीं हैं. जनता ने गठबंधन को जो जनादेश दिया है, उसका सम्मान करते हुए JMM सरकार चला रहा है. चुनावी मौसम में अक्सर तल्खी आ जाती है, मगर यह इतनी न बढ़ जाए कि बाद में अफसोस हो. JMM ने हमेशा गठबंधन धर्म निभाया है और इसके लिए बिहार में भी कुर्बानी दी है, लेकिन हर बार JMM ही कुर्बानी दे, यह उचित नहीं है.”

दो पार्टियों के एक-दूसरे के खिलाफ आए बयानों के बाद सवाल है कि क्या यह सोची-समझी लड़ाई है या फिर एक दूसरे से अलग होने के बाद किसी नए फेरबदल के लिए मंच तैयार किया जा रहा है? जानकारों की मानें तो यह राज्यसभा की दूसरी सीट की लड़ाई के लिए बिछाई जा रही बिसात है.

राज्यसभा का पूरा गणित और BJP के लिए संभावना

झारखंड की 81 सदस्यीय विधानसभा में राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए 28 मतों की आवश्यकता होती है. यहां सत्तारूढ़ महागठबंधन (JMM-कांग्रेस-RJD-CPI) के पास मजबूत बहुमत है. गठबंधन के पास JMM के 34, कांग्रेस के 16, RJD के 4 और CPI (ML) के 2 विधायकों सहित कुल 56 विधायक हैं. इस संख्या बल के आधार पर सत्तारूढ़ गठबंधन दोनों सीटें जीतता हुआ दिख रहा है.

लेकिन असली पेच यहीं फंसा है. अगर JMM दूसरी सीट के लिए भी अपना उम्मीदवार उतारती है, तो 34 विधायकों के साथ 28 वोट पाकर उसकी एक सीट तो पक्की होगी. बाकी बचे 6 वोटों के अलावा उसे 22 अतिरिक्त वोटों की जरूरत होगी. RJD के 4 और CPI (ML) के 2 वोटों को मिलाकर उसके पास कुल 6 वोट पक्के माने जा सकते हैं. इसके बावजूद उसे कांग्रेस के सभी 16 वोटों की जरूरत पड़ेगी.

इस परिस्थिति में ओडिशा वाली स्क्रिप्ट दोहराई जा सकती है. यानी किसी BJP समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार के पक्ष में समर्थन जुटाए जाने की संभावना बन सकती है. BJP के पास अपने 21 वोटों के अलावा JDU, LJP और JLKM का 1-1 वोट मिलाकर कुल 24 वोट हैं. ऐसे में उसे जीत के लिए मात्र 4 और वोटों की जरूरत होगी. ऐसी स्थिति में कांग्रेस के सभी 16 विधायक पार्टी के प्रति वफादार रहेंगे, यह कहना मुश्किल है.

परिस्थितियां भी कुछ वैसी ही बन रही हैं. कांग्रेस के 4 से 6 विधायक अपनी ही पार्टी के मंत्रियों के खिलाफ कई बार मोर्चा खोल चुके हैं. एक विधायक रामेश्वर उरांव की बेटी निशा, जो केंद्रीय राजस्व सेवा की अधिकारी हैं, लगातार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एजेंडे ‘आदिवासी-हिंदू एक हैं’ का समर्थन कर रही हैं और संघ के कार्यक्रमों में बतौर वक्ता शामिल हो रही हैं.

RJD के चारों विधायकों को भी एक विकल्प के तौर पर देखा जा सकता है. चूंकि राज्यसभा चुनाव में पार्टी की तरफ से व्हिप जारी नहीं किया जा सकता, इसलिए दुर्लभ परिस्थितियों में ही विधायकों की सदस्यता जाने का खतरा होता है. हालांकि, यह सब JMM पर निर्भर करेगा. उसकी मर्जी के बिना क्रॉस वोटिंग करना और फिर सदस्यता बचा लेना लगभग असंभव है, क्योंकि विधानसभा अध्यक्ष JMM के हैं. ऐसे में सदस्यता रहने या जाने का फैसला उसी के पाले में तय होना है.

यह विकल्प BJP की उस राजनीति को भी रास आता है, जिसके तहत कांग्रेस को राष्ट्रीय सत्ता (लोकसभा और राज्यसभा) से दूर रखा जा सके, भले ही राज्यों में उनकी सरकारें चलती रहें. अगर इस रस्साकस्सी में BJP समर्थित उम्मीदवार की जीत की पटकथा लिखी जाती है, तो इसमें JMM का फायदा ही दिख रहा है. उसे कांग्रेस को खोने का डर नहीं है और केंद्र से मिलने वाली ‘राहत’ या ‘पैकेज’ की संभावना भी बनी रहेगी. यही वजह है कि पिछले दो दिनों की बयानबाजी पर तंज कसते हुए BJP ने कहा है कि अगर दोनों दलों को इतना ही कष्ट है, तो वे अलग क्यों नहीं हो जाते.

जानकारों की मानें तो यह शोर सिर्फ असम और बंगाल चुनाव तक ही सुनाई देगा. अगर इन राज्यों में BJP की सरकार बन जाती है, तो झारखंड में भी आगे की स्क्रिप्ट पार्टी ही लिखेगी. इसके उलट परिणाम आने पर हेमंत सोरेन झारखंड की सियासत में अपने हिसाब से लकीर खींचते नजर आएंगे.

बता दें कि झारखंड में राज्यसभा की कुल 6 सीटों में से 2 सीटों पर इसी साल चुनाव होना है. इनमें से एक सीट शिबू सोरेन के निधन (4 अगस्त 2025) के कारण खाली है, जो एक 'कैजुअल वैकेंसी' है. दूसरी सीट BJP के दीपक प्रकाश की है, जिनका कार्यकाल 21 जून 2026 को समाप्त हो रहा है. इन दोनों सीटों पर चुनाव मई-जून 2026 के दौरान होने की संभावना है.

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