झारखंड राज्यसभा चुनाव : JMM के आगे कांग्रेस ने क्यों कर दिया सरेंडर?

मई में झारखंड से राज्यसभा की दो सीटों के लिए चुनाव होना है. कांग्रेस इनमें से एक सीट चाहती थी लेकिन झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) ने दोनों पर दावा कर दिया है

Hemanj Soren, K. Raju
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के साथ कांग्रेस के झारखंड प्रभारी के. राजू (फाइल फोटो)

झारखंड में सत्ताधारी झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) और कांग्रेस LAT (Living Apart Together) में रह रहे हैं. LAT, यानी ऐसे विवाहित जोड़े जो भावनात्मक रूप से एक-दूसरे के प्रति समर्पित रहते हुए भी अलग-अलग घरों में रहने का निर्णय लेते हैं. रिश्तों के इस आधुनिक चलन को अक्सर 'अपार्टनरिंग' भी कहा जाता है.

इसमें दंपति विवाह के लाभों का आनंद लेते हुए अपनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता, निजी स्थान और अलग-अलग दैनिक जीवनशैली बनाए रख सकते हैं. या फिर यह भी कहा जा सकता है कि दोनों पार्टियां 'सिचुएशनशिप' में हैं. सिचुएशनशिप यानी एक ऐसा रोमांटिक रिश्ता, जिसमें कोई स्पष्ट नाम, कमिटमेंट या भविष्य की योजना नहीं होती.

पूरी स्थिति को ऐसे समझिए. JMM की कांग्रेस की गर्दन पर पकड़ हर दिन मजबूत होती जा रही है. दूसरी बार सत्ता में साझेदार बनने के बाद कांग्रेस आलाकमान ने कहा था कि इस बार हेमंत सोरेन को कांग्रेस कार्यकर्ताओं की सुननी पड़ेगी, लेकिन हो इसके ठीक उलट रहा है. पिछली सरकार की तरह इस बार भी कांग्रेस के कार्यकर्ता यह कहते हुए देखे जा रहे हैं कि हमारा तो कोई काम ही नहीं होता. कार्यकर्ता ही क्यों, राज्य प्रभारी भी इसी स्थिति में हैं. हेमंत सोरेन उनकी भी नहीं सुन रहे हैं.

पहले असम में गठबंधन करने से मना किया और खुद अकेले चुनाव लड़ गए. इसके बाद बंगाल में कांग्रेस के बजाय ममता बनर्जी को समर्थन देने और उनके प्रत्याशियों के लिए प्रचार करने पहुंच गए. जबकि JMM ने साफ कहा था कि वह असम के साथ बंगाल चुनाव भी लड़ेगी. यह प्रकरण भी समाप्त हो गया. अब ताजा मामला यह है कि मई में होने जा रहे राज्यसभा की दो सीटों के चुनाव के लिए एक सीट पर दावेदारी की सुगबुगाहट हुई नहीं कि JMM ने आगे बढ़कर पर्याप्त संख्याबल न होने के बावजूद दूसरी सीट पर भी दावेदारी कर दी. वक्त का इंतजार करते कांग्रेसी यहां भी सरेंडर कर गए.

दरअसल, 27 अप्रैल को रांची में कांग्रेस के जिलाध्यक्षों की बैठक आयोजित की गई थी. बैठक में राज्य प्रभारी के. राजू सहित सभी बड़े नेता मौजूद थे. बैठक खत्म होने के बाद प्रभारी के. राजू ने कहा, "हम कोशिश करेंगे कि राज्यसभा की एक सीट गठबंधन हमें दे. इसके लिए घटक दलों से बात की जाएगी." दरअसल, कांग्रेस को अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए अपने 16 विधायकों के अलावा 12 और वोटों की जरूरत पड़ेगी.

अब आते हैं घटक दलों की स्थिति और नियति पर. बिहार में कांग्रेस के तीन विधायकों ने RJD के उम्मीदवार को समर्थन नहीं दिया. ऐसे में RJD अपने विधायकों के लिए झारखंड में कांग्रेस को समर्थन देने के लिए शायद बाध्य नहीं करेगी, जबकि झारखंड में उसके चार विधायक हैं. JMM के पास कुल 34 विधायक हैं. कुल 28 वोटों के साथ उसकी पहली सीट तो पक्की है. बाकी बचे छह विधायकों का समर्थन भी कांग्रेस को नहीं मिलेगा, यह तय लग रहा है. यही वजह है कि कांग्रेस 16 विधायक होने के बावजूद 'कोशिश' के भरोसे रहने पर मजबूर है. एक माह पहले तक जहां दमखम के साथ दावेदारी की जा रही थी, वहीं अब चुनाव नजदीक आने के बाद स्थिति साफ होती जा रही है कि अब BJP या उसके समर्थित उम्मीदवार का जीतना लगभग तय है.

यहां किसी तीसरे या निर्दलीय प्रत्याशी के आने की संभावना बढ़ गई है. कारोबारी और पूर्व राज्यसभा सांसद परिमल नाथवानी की उम्मीदवारी की चर्चा राज्य में जोरों पर है. अगर वे निर्दलीय मैदान में उतरते हैं, तो BJP के 22 वोटों के अलावा उन्हें मात्र छह और वोटों की जरूरत होगी. यहां JMM और RJD अपने विधायकों को 'अंतरात्मा की आवाज' सुनने की पूरी छूट दे देंगे, इसे मानने से इनकार नहीं किया जा सकता. स्थिति रोचक है. JMM का उम्मीदवार कौन होगा, इसकी चर्चा है लेकिन अभी तक कोई नाम सामने नहीं आया है. दूसरी सीट, जिसके लिए किसी भी दल के पास पर्याप्त संख्याबल नहीं है, उसके जीतने तक की तस्वीर स्पष्ट हो चुकी है. यह उम्मीदवार BJP का भले ही नहीं होगा, लेकिन BJP के लिए जरूर होगा.

बाहर से समर्थन की उठी मांग

बैठक में एक और बात निकलकर आई और यह पहली बार आई. जिलाध्यक्षों का कहना था कि सरकार में कांग्रेस के कार्यकर्ताओं का काम नहीं हो रहा है. पार्टी को वर्तमान हालात में बाहर से समर्थन देना चाहिए. बैठक में जिलाध्यक्षों ने सरकार के कामकाज पर सवाल उठाए.

कार्यकारी अध्यक्ष जलेश्वर महतो ने कहा, "लूट मची है. BJP के लोग लूट रहे हैं, लेकिन सरकार मौन है. प्रशासन की मिलीभगत है." इसके अलावा कांग्रेस के अंदर बोर्ड-निगम में भागीदारी की मांग भी तेज है, लेकिन इस दिशा में बात आगे नहीं बढ़ रही है.

हालांकि मीडिया से बात करते हुए प्रदेश अध्यक्ष केशव महतो कमलेश ने बाहर से समर्थन वाली मांग को खारिज कर दिया. उन्होंने कहा, "अभी उस तरह की परिस्थिति नहीं आई है. विधायक दल की बैठक में इन सब पर बात होती है, न कि जिलाध्यक्षों की बैठक में."

हालांकि इस तरह की बात हाल के दिनों में खुद प्रदेश प्रभारी तक खुलकर बोल चुके हैं. बीते 31 मार्च को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में के. राजू ने आरोप लगाया था, "राज्य सरकार खनन माफिया के दबाव में काम कर रही है." उन्होंने दावा किया कि "जिला कलेक्टर इस लॉबी का सहयोग कर रहे हैं. अधिकारियों और खनन कंपनियों के बीच मिलीभगत है. भू-स्वामियों को भूमि अधिग्रहण अधिनियम 2013 के तहत पर्याप्त मुआवजा नहीं मिल रहा है." उन्होंने आगे यह चेतावनी भी दी कि "इस सबके खिलाफ पार्टी कलेक्ट्रेट और बीडीओ कार्यालयों का घेराव करेगी." हालांकि यह महज एक बयान बनकर रह गया. राज्यभर में कहीं कोई आंदोलन या धरना प्रदर्शन नहीं हुआ. 27 अप्रैल को हुई बैठक में एक बार फिर दोहराया गया कि जनता के मुद्दों पर पार्टी मैदान में उतरेगी.

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