झारखंड में विधानसभा चुनाव के बाद नगर निकाय चुनाव में भी क्यों फेल हुई BJP?

झारखंड में 26 फरवरी को नगर निकाय चुनाव के नतीजे आए हैं और BJP के लिए मुसीबत की बात यह रही कि कई जगह उसके बागी उम्मीदवार जीत गए

Dhanbad Mayor Sanjay Singh
BJP के बागी नेता संजय सिंह धनबाद में मेयर पद के लिए चुने गए हैं

पहले समर्थन नहीं दिया, तो नेता बागी बन गए और चुनाव लड़ गए. पार्टी ने इसे अनुशासनहीनता मानते हुए नोटिस थमा दिया. भरोसा था कि बागी हारेंगे ही, फिर इन पर कार्रवाई कर प्रदेश नेतृत्व के इकबाल बुलंद होने का दिखावा भी किया जाएगा. लेकिन अब वक्त भी बदला और जज्बात भी. बड़ी संख्या में BJP के बागी जीत गए. कहीं मेयर तो कहीं नगर परिषद के अध्यक्ष बन गए.

बीते 26 फरवरी को झारखंड नगर निकाय चुनाव के परिणाम आए. चुनाव परिणाम BJP के लिए गले में फंसी मछली के उस कांटे की तरह हो गए हैं, जिसे न निगलते बन रहा है और न उगलते. हालांकि प्रयास अब यह हो रहा है कि कुछ सूखा खाकर उस कांटे को गले से पेट तक पहुंचा दिया जाए. जिन-जिन बागियों को BJP ने चुनाव के दौरान नोटिस थमाया था, उनमें से अधिकतर ने जीत दर्ज कर ली है. जबकि उन सीटों पर BJP समर्थित प्रत्याशी कहीं दूसरे तो कहीं चौथे नंबर पर रहे.

हालात ये हैं कि राज्य के कुल 9 नगर निगमों में से मात्र 3 सीटों पर ही BJP समर्थित उम्मीदवारों को जीत मिली है. वह भी तब, जब पार्टी ने जयाप्रदा, गिरिराज सिंह, अर्जुन मुंडा, रघुवर दास और रक्षा राज्य मंत्री संजय सेठ जैसे नेताओं तक को चुनाव प्रचार में उतार दिया था. इसके उलट JMM या कांग्रेस की तरफ से कोई बड़ा नेता अपने किसी समर्थित प्रत्याशी के लिए प्रचार करने नहीं पहुंचा.

सबसे रोचक धनबाद सीट रही, जहां BJP की झरिया से विधायक रागिनी सिंह के पति संजीव सिंह ने जीत दर्ज की है. जबकि यहां से BJP के समर्थित प्रत्याशी संजीव कुमार चौथे नंबर पर रहे. पाकुड़ नगर परिषद के अध्यक्ष पद पर सबरी पॉल चुनी गई हैं, जबकि नतीजे से ठीक एक सप्ताह पहले BJP ने उन्हें भी नोटिस थमाया था. जामताड़ा नगर पंचायत के अध्यक्ष पद पर जीत कर आईं आशा गुप्ता को भी नोटिस मिला था.

अब BJP के बड़े नेता इन जीते हुए प्रत्याशियों को अपना बता रहे हैं और इन्हें सार्वजनिक तौर पर बधाई दे रहे हैं. प्रदेश महामंत्री और राज्यसभा सांसद प्रदीप वर्मा ने लिखा, "जामताड़ा नगर पंचायत से भाजपा कार्यकर्ता आशा गुप्ता जी के अध्यक्ष पद पर निर्वाचित होने पर हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं. जामताड़ा की सम्मानित जनता द्वारा आप पर व्यक्त किया गया विश्वास निश्चित रूप से नगर के सर्वांगीण विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा." यही बात उन्होंने सबरी पॉल के लिए भी अपने एक्स (X) हैंडल पर लिखी.

धनबाद के नवनियुक्त मेयर संजीव सिंह कहते हैं, "मेरे पास अभी तक कोई नोटिस नहीं आया है. जब आएगा तब देखेंगे कि क्या जवाब देना है. दूसरी बात, मैं किसी पार्टी का नहीं, जनता के समर्थन वाला प्रत्याशी था. जहां तक बात BJP के समर्थन और पार्टी में बने रहने की है, उस पर बाद में बात की जाएगी." वहीं सबरी पॉल ने भी फिलहाल कुछ भी कहने से मना कर दिया.

आखिर हार मिली क्यों

विधानसभा चुनाव में हार के बाद भी BJP इस बात पर जोर दे रही थी कि शहरी इलाकों में उसका वोट प्रतिशत बढ़ा है. बावजूद इसके ऐसा क्या हुआ कि धनबाद, चास, हजारीबाग, मानगो, देवघर और गिरिडीह जैसे शहरी इलाकों में BJP समर्थित उम्मीदवारों को हार का सामना करना पड़ा? यानी कुल 9 नगर निगमों में से छह पर उसे हार मिली. मात्र रांची, आदित्यपुर और मेदिनीनगर सीट पर ही उसके समर्थित प्रत्याशियों की जीत हुई है.

नाम न छापने की शर्त पर BJP के एक प्रवक्ता ने बताया कि यह स्थानीय स्तर का चुनाव था, लेकिन इसके टिकट भी केंद्रीय नेतृत्व से विमर्श करके तय किए गए, जिसकी जरूरत नहीं थी. दूसरी बात यह कि स्थानीय स्तर के अनुभवी नेताओं से रायशुमारी के बावजूद उनकी राय को तवज्जो नहीं दी गई. तीसरी बात, बिना वजह ओबीसी कार्ड खेला गया. हमारे एक प्रत्याशी ने तो यहां तक लिख दिया कि "हम बनिया की बेटी हैं, किसी से नहीं डरते."

वह आगे बताते हैं कि BJP में यह परंपरा रही है कि जीत और हार, दोनों परिस्थितियों में समीक्षा होती है. जिम्मेदार लोगों को पुरस्कृत और बागियों को दंडित किया जाता रहा है. लेकिन इस हार की समीक्षा तक नहीं हुई. उसकी जगह हमारे नेता, जो दस दिन पहले तक नोटिस थमा रहे थे, अब उनके घर पहुंचकर बधाई दे रहे हैं और पार्टी का पट्टा गले में डाल रहे हैं.

प्रदेश अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद आदित्य साहू कहते हैं, "जिनको नोटिस मिला है, वे हमारी पार्टी के ही नेता हैं. जब नोटिस का जवाब आएगा, तब पार्टी तय करेगी कि आगे क्या करना है." हालांकि प्रदेश अध्यक्ष और उनके करीबियों की टीम उन बागी और जीते हुए प्रत्याशियों से यही गुहार लगा रही है कि "बीती ताहि बिसार दे" की सोच के साथ आगे बढ़ा जाए.

विश्लेषक यह भी मानते हैं कि शहरी इलाकों में BJP की हार की एक वजह यूजीसी बिल भी हो सकता है. दूसरा, निकाय चुनाव भी BJP राम, हिंदुत्व और मुसलमान के सहारे ही लड़ रही थी, ऐसे में जीत कहां से मिलती? एक बड़े नेता कहते हैं कि वर्तमान झारखंड BJP पर बाबूलाल मरांडी और उनकी पूर्व की पार्टी झारखंड विकास मोर्चा से जुड़े लोगों का कब्जा है. इनकी वजह से पुराने और अनुभवी कार्यकर्ता खुद को अलग-थलग महसूस कर रहे हैं. अगर यही हाल रहा तो आने वाले समय में और भी दुर्गति होगी.

संभावना इस बात की भी है कि BJP के कुछ बागियों को JMM ने अंदरूनी समर्थन दिया, जिसकी वजह से उनकी जीत हुई. अब वे JMM का झंडा थामने के लिए तैयार हैं.

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