कुलपतियों की नियुक्ति पर झारखंड सरकार और राज्यपाल में क्यों ठनी?

झारखंड के राज्यपाल संतोष गंगवार ने तीन विश्वविद्यालयों में कुलपतियों की नियुक्ति कर दी है. इस पर सत्ताधारी झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) सवाल उठा रहा है

CM Hemant Soren with Governor Santosh Gangwar (file photo)
झारखंड के सीएम हेमंत सोरेन राज्यपाल संतोष गंगवार के साथ (फाइल फोटो)

बीते साल जुलाई में हेमंत सोरेन सरकार की तरफ से विधानसभा में पेश 'झारखंड राज्य विश्वविद्यालय विधेयक 2025' की खूब चर्चा रही. इसका मुख्य उद्देश्य यह था कि अब राज्यपाल से VC (वीसी) की नियुक्ति का अधिकार वापस ले लिया जाए. तर्क दिया गया कि कैंपसों का ‘भगवाकरण’ हो रहा है यानी विश्वविद्यालयों में BJP की विचारधारा को आगे बढ़ाने वाले लोगों को तवज्जो दी जा रही है.

सत्ताधारी झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) कहना था कि वेतन और पदोन्नति से लेकर भवन निर्माण तक का सारा खर्च राज्य सरकार उठाती है, इसलिए विश्वविद्यालयों पर नियंत्रण भी राज्य सरकार का ही होना चाहिए. जाहिर है, राज्यपाल इस विधेयक को आसानी से मंजूरी नहीं देते, इसलिए यह अब तक राजभवन में ही लंबित है.

अब 10 मार्च को राज्यपाल संतोष गंगवार ने झारखंड के तीन विश्वविद्यालयों के नए VCयों की घोषणा कर दी. इसके मुताबिक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय (DSPMU) के लिए डॉ. राजीव मनोहर को VC (VC) नियुक्त किया गया है. वे लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रोफेसर हैं. जमशेदपुर महिला विश्वविद्यालय में डॉ. ईला कुमार को VC बनाया गया है, जो इंदिरा गांधी दिल्ली तकनीकी विश्वविद्यालय की प्राध्यापिका हैं. इसके अलावा, नालंदा विश्वविद्यालय के प्रोफेसर सह डीन डॉ. अभय कुमार सिंह को झारखंड राज्य मुक्त विश्वविद्यालय का VC नियुक्त किया गया है.

अब इन नियुक्तियों पर कांग्रेस ने सवाल उठाए हैं. विधानसभा के चालू बजट सत्र में 11 मार्च को कांग्रेस विधायक दल के नेता प्रदीप यादव ने इस पूरे मामले पर कड़ी टिप्पणी की. उन्होंने कहा, "क्या झारखंडी विद्वानों ने इन पदों के लिए आवेदन नहीं दिया था? अगर दिया, तो क्या स्क्रीनिंग कमेटी ने उनकी अनुशंसा भेजी थी? क्या झारखंड के विद्वान इन पदों के योग्य नहीं हैं? क्या ये नियुक्तियां झारखंड के 'अबुआ दिशोम-अबुआ राज' के संकल्प के विपरीत नहीं हैं?" उन्होंने आगे कहा कि कुलाधिपति (राज्यपाल) को अधिकार अवश्य है, लेकिन प्रश्न यह है कि क्या राज्य में इन पदों के लिए योग्य लोग नहीं हैं? सरकार को इन नियुक्तियों पर संज्ञान लेना चाहिए. उन्होंने स्क्रीनिंग कमेटी की प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े किए.

इस पर वित्त एवं संसदीय कार्य मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने कहा, "विधायक प्रदीप यादव की बात सही है. झारखंडवासियों को जो सम्मान मिलना चाहिए था, वह नहीं मिला. सरकार इस मामले का संज्ञान ले रही है. उच्च शिक्षा सचिव से पूरी जानकारी लेकर सदन को अवगत कराया जाएगा."

रिपोर्ट के शुरू में जिस विधेयक का जिक्र किया गया है उसे झारखंड सरकार की कैबिनेट ने 24 जुलाई 2025 को मंजूरी दी थी. इसके तहत राज्य के विश्वविद्यालयों में VC की नियुक्ति का अधिकार राज्यपाल से वापस लेने की तैयारी है. अगर सरकार की यह कोशिश सफल रही, तो VC ही नहीं बल्कि Pro-VC , कुलसचिव (रजिस्ट्रार), परीक्षा नियंत्रक और वित्तीय सलाहकार सहित अन्य पदों पर नियुक्ति का अधिकार भी मुख्यमंत्री के पास होगा. फिलहाल यह विधेयक राज्यपाल की मंजूरी का इंतजार कर रहा है.

क्या कह रही हैं पार्टियां

कांग्रेस के सवालों पर BJP प्रवक्ता प्रतुल शाहदेव कहते हैं, "राजभवन पर सवाल उठाने से पहले सरकार को अपनी नीतियों और कार्यशैली पर विचार करना चाहिए. क्या कारण है कि पिछले 15-20 वर्षों से राज्य के सैकड़ों सहायक प्रोफेसर आज तक प्रोफेसर नहीं बन पाए हैं? क्या यह सरकार अपने सवा छह साल के कार्यकाल में इस बैकलॉग को खत्म नहीं कर सकती थी? अभी भी समय है, सरकार अपनी नींद से जागे और बैकलॉग खत्म कर स्थानीय लोगों के लिए अवसर पैदा करे."

वहीं रांची विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष और JMM प्रवक्ता तनुज खत्री कहते हैं, "VC की नियुक्ति पर सवाल उठना स्वाभाविक है. इन नियुक्तियों में राज्य सरकार का कोई दखल नहीं होता. मुख्यमंत्री को केवल फाइल दिखाई जाती है और मंतव्य मांगा जाता है, लेकिन नियुक्ति राज्यपाल ही करते हैं. इसीलिए 'अबुआ सरकार' यह बिल लेकर आई है, ताकि झारखंडियों को VC बनने के उचित अवसर मिल सकें."

वर्तमान नियमों के अनुसार VC बनने के लिए प्रोफेसर के रूप में 10 वर्ष का अनुभव अनिवार्य है. खत्री के मुताबिक झारखंड के विश्वविद्यालयों में लंबे समय से पदोन्नति अटकी हुई है, जिस कारण कई विद्वान इस मानदंड को पूरा नहीं कर पाते. उनके चयन न होने की एक बड़ी वजह यह भी है. 

कुछ पर दाग, कुछ को प्रमोशन का इंतजार

झारखंड यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. जगदीश लोहरा कहते हैं, "वर्ष 1996 बैच के जो 44 व्याख्याता हैं, अगर उन्हें नियमित प्रमोशन मिला होता तो वे 2010 तक प्रोफेसर बन जाते और 2020 तक VC बनने की योग्यता रखते. लेकिन उनका प्रमोशन आज भी लंबित है. यह राजभवन की जिम्मेदारी है जिससे वह पीछे नहीं हट सकता."

वे आगे यह भी कहते हैं, "राजभवन या VC को जिन विषयों पर ध्यान देना चाहिए, वहां काम नहीं हो रहा है. स्थिति यह है कि रांची विश्वविद्यालय में सत्र 2025-26 के लिए PG में प्रवेश शुरू नहीं हो पा रहा है, क्योंकि UG के छठे सेमेस्टर का परिणाम ही घोषित नहीं हुआ है. झारखंड को इस समय केवल अनुभव ही नहीं, बल्कि विजन वाले कुलपतियों की आवश्यकता है. विडंबना यह है कि यहां अनुभव रखने वाले कई लोगों पर जांच चल रही है."

मिली जानकारी के अनुसार, 10 वर्ष की योग्यता रखने वाले कुछ लोगों का ट्रैक रिकॉर्ड ठीक नहीं रहा है. रांची विश्वविद्यालय के पूर्व VC डॉ. अजीत कुमार सिन्हा, DSPMU के पूर्व VC डॉ. तपन कुमार शांडिल्य, नीलांबर-पितांबर विश्वविद्यालय के वर्तमान VC डॉ. दिनेश कुमार सिंह, विनोबा भावे विश्वविद्यालय के पूर्व VC डॉ. मुकुल देव नारायण और विनोद बिहारी महतो, कोयलांचल विश्वविद्यालय के पूर्व VC प्रो. सुखदेव भोई पर राजभवन के निर्देश पर जांच जारी है. इसके अलावा, सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ झारखंड के पूर्व VC पर फर्नीचर घोटाले के मामले में सीबीआई जांच चल रही है.

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