झारखंड में कांग्रेस कोटे के मंत्री ने पार्टी अध्यक्ष के खिलाफ ही खोला मोर्चा!
राधाकृष्ण किशोर को हेमंत सोरेन सरकार में वित्त मंत्री बनवाने के लिए झारखंड कांग्रेस के अध्यक्ष केशव महतो कमलेश ने खूब जोर लगाया था लेकिन अब वे पार्टी की प्रदेश कमान में ही बदलाव की मांग कर रहे हैं

झारखंड में कांग्रेस नेताओं के बीच सत्ता में हिस्सेदारी बढ़ाने को लेकर काफी बेचैनी दिख रही है. कोई मंत्री है तो उसे अपने परिजनों को जिलाध्यक्ष बनाना है, कोई विधायक है तो साथी मंत्री को हटाकर खुद मंत्री बनना चाहता है. ताजा विवाद यह है कि राज्य के वित्त मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राधाकृष्ण किशोर अपने ही प्रदेश अध्यक्ष केशव महतो कमलेश पर हमलावर हो गए हैं.
किशोर अप्रत्यक्ष रूप से केशव महतो कमलेश को उनके पद से हटाने की मांग प्रदेश प्रभारी के. राजू से कर रहे हैं. खास बात यह है कि वे अपनी बात पार्टी फोरम पर न रखकर सोशल मीडिया के जरिए कह रहे हैं. दरअसल मामला यह है कि 3 मई को बहुप्रतीक्षित प्रदेश कांग्रेस की नई कमेटी की घोषणा की गई. इसमें कुल 314 नेताओं को विभिन्न जिम्मेदारियां दी गईं.
राधाकृष्ण किशोर के बेटे प्रशांत किशोर को प्रदेश सचिव की जिम्मेदारी दी गई, लेकिन वे इससे खुश नहीं थे. सूत्रों के मुताबिक वे या तो इससे बड़ा पद चाह रहे थे या फिर पलामू का जिलाध्यक्ष बनना चाहते थे. पद नहीं मिला तो उन्होंने वॉट्सएप के जरिए प्रदेश प्रभारी को अपना इस्तीफा भेज दिया.
बेटे के बाद पिता ने मोर्चा संभाला. बीते 4 मई को प्रदेश प्रभारी को लिखे पत्र में वित्त मंत्री ने तंज कसते हुए कहा, "81 सीट वाले झारखंड विधानसभा के लिए झारखंड प्रदेश कांग्रेस के कुल 314 सदस्यों की समिति कितनी कारगर होगी, यह समय बताएगा. देश में हुए चुनाव परिणाम से भी झारखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी को सीखने की आवश्यकता है." रांची नगर निगम के लिए मेयर पद की प्रत्याशी रह चुकीं और महिला प्रदेश अध्यक्ष रमा खलखो को लेकर उन्होंने कहा, "जिन्होंने आपको और कांग्रेस को सार्वजनिक रूप से कोसा, उन्हें पार्टी ने चुनाव प्रबंध समिति का सदस्य बना दिया."
वे यहीं नहीं रुके, अगले दिन यानी 5 मई को उन्होंने एक बार फिर हमला बोला. उन्होंने प्रदेश प्रभारी को संबोधित करते हुए कहा कि एक को साधने से सब सध जाएगा, इसलिए प्रदेश नेतृत्व को बदलना चाहिए. उन्होंने कहा, "यदि प्रदेश कांग्रेस कमेटी की संख्या 314 की जगह 628 भी कर दी जाए तो क्या फर्क पड़ता है? यदि पार्टी राज्य स्तर के स्थानीय मुद्दों के प्रति मौन रहे तो समिति का संख्या बल कितना भी बढ़ा दिया जाए, कोई असर नहीं पड़ने वाला."
उन्होंने आगे कहा, "राहुल गांधी ने जिस बेहतर ढंग से महिला आरक्षण संशोधन विधेयक पर लोकसभा में तर्क प्रस्तुत किए, उसे झारखंड प्रदेश कांग्रेस राज्यव्यापी स्तर पर भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ मुद्दा नहीं बना सकी. कांग्रेस भवन में प्रेस कॉन्फ्रेंस करने से राज्य की महिलाओं के बीच महिला विरोधी BJP के बारे में संदेश नहीं दिया जा सकता है."
किशोर के आरोप यहीं तक नहीं रुके उन्होंने आगे कहा, "पलामू, गढ़वा, चतरा, कोडरमा, गिरिडीह, गोड्डा, धनबाद और बोकारो आदि जिलों में मगही और भोजपुरी भाषा बोली जाती है, जबकि JTET में राज्य सरकार ने दोनों भाषाओं को हटा दिया. इस महत्वपूर्ण विषय पर प्रदेश कांग्रेस नेतृत्व ने चुप्पी साध रखी है. झारखंड में अनुसूचित जाति की आबादी 50 लाख है. मैंने 2025-26 के बजट में विधानसभा में अनुसूचित जाति परामर्शदात्री परिषद और अनुसूचित जाति आयोग को पुनर्जीवित करने की मांग रखी थी, लेकिन इन दोनों मांगों पर प्रदेश कांग्रेस नेतृत्व मौन रहा."
वित्त मंत्री ने अपनी ही पार्टी के अध्यक्ष को सामाजिक न्याय के मसले पर भी घेरा और कहा, "झारखंड सामाजिक न्याय का प्रदेश है. प्रदेश पार्टी नेतृत्व यह सार्वजनिक करे कि पार्टी संगठन में कांग्रेसी नेताओं के परिवारों को कितना स्थान दिया गया है? केशव महतो कमलेश को सार्वजनिक तौर पर यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि 314 सदस्यों की कमेटी में दलित, पिछड़ों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों और सामान्य जाति के लोगों को कितनी संख्या में स्थान दिया गया है?" आखिर में उन्होंने लिखा, "एक को साधिए, झारखंड कांग्रेस में सब सध जाएगा."
केशव महतो कमलेश ने ही बनवाया था मंत्री
मंत्री राधाकृष्ण किशोर झारखंड के उन कुछ चुनिंदा नेताओं में हैं, जिन्होंने झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) और लेफ्ट पार्टी को छोड़कर बाकी सभी दलों का सफर तय किया है. कांग्रेस से अपना राजनीतिक करियर शुरू करने के बाद वे JDU गए. वहां से फिर कांग्रेस आए और फिर BJP में शामिल हो गए. BJP के बाद आजसू, आरजेडी होते हुए वे दोबारा कांग्रेस में आए. उनके कांग्रेस में आने की कहानी से प्रदेश अध्यक्ष और उनके संबंधों के बारे में समझा जा सकता है.
दरअसल बीते विधानसभा चुनाव के नामांकन में जब आखिरी तीन दिन बचे थे, तब केशव महतो कमलेश ने उन्हें पार्टी जॉइन कराई थी. उन्होंने पार्टी के अंदर उनके लिए लड़ाई लड़ी और अगले दिन देर रात उन्हें सिंबल दिलाया. आखिरी दिन उन्होंने नामांकन किया. छतरपुर विधानसभा क्षेत्र, जहां से राधाकृष्ण विधायक हैं, वहां कांग्रेस ने उनकी खातिर गठबंधन में रहते हुए आरजेडी से 'फ्रेंडली फाइट' का रिस्क लिया. वे बमुश्किल 900 वोट से जीत पाए. इसके बाद केशव महतो कमलेश ने ही उन्हें मंत्री बनाने के लिए पार्टी के अंदर लड़ाई लड़ी. पार्टी का तर्क था कि बाहर से आए नेताओं को मंत्री पद नहीं देना चाहिए, जबकि प्रदेश अध्यक्ष का कहना था कि उनके अनुभव के आधार पर उन्हें मंत्री बनाया जाना चाहिए. दिलचस्प बाता कि आज उन्हीं केशव महतो कमलेश को वित्त मंत्री नाकाबिल बताने पर तुले हैं.
कांग्रेस के एक बड़े नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि राधाकृष्ण किशोर को पुत्र मोह में पार्टी को असहज नहीं करना चाहिए और इस छीछालेदर के बाद उन्हें अपने बेटे के लिए मनमाफिक पद की लालसा अब छोड़ ही देनी चाहिए.
इस पूरे विवाद पर केशव महतो कमलेश बस इतना कहते हैं, "राधाकृष्ण किशोर को पूरा सम्मान दिया गया है. उन्हें अपनी बात पार्टी फोरम या वरिष्ठ नेताओं के समक्ष रखनी चाहिए थी. इसे सोशल मीडिया पर सार्वजनिक करने की आवश्यकता नहीं थी."
यहां एक बात यह भी दिलचस्प है कि किशोर की आपत्तियों और सवालों पर गौर करें तो समझ आता है कि वे न केवल प्रदेश अध्यक्ष की क्षमता पर सवाल उठा रहे हैं, बल्कि प्रदेश प्रभारी और राज्य सरकार के कामकाज को भी कटघरे में खड़ा कर रहे हैं. JTET में भोजपुरी, मगही, मैथिली और अंगिका को शामिल नहीं किए जाने पर कांग्रेस पार्टी ने विरोध नहीं किया, यह सीधे सरकार पर सवाल है. महिला आरक्षण पर होने वाले प्रदर्शनों को लेकर आक्रामक न होने पर किए गए सवाल भी सीधे तौर पर प्रदेश प्रभारी के ऊपर प्रश्नचिह्न हैं.