जयंत चौधरी पश्चिमी यूपी से बाहर निकल पूर्वांचल में ताकत क्यों दिखाना चाहते हैं?
जयंत चौधरी की RLD पूर्वी उत्तर प्रदेश के देवरिया में 15 मार्च को एक रैली करने जा रही है

पूर्वी उत्तर प्रदेश के जिले देवरिया में 15 मार्च को प्रस्तावित रैली को लेकर राष्ट्रीय लोकदल (RLD) ने जिस तरह की तैयारी शुरू की है, उसने उत्तर प्रदेश की सियासत में एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है- क्या यह सिर्फ संगठन विस्तार की कवायद है या फिर एनडीए के भीतर अपनी राजनीतिक हैसियत बढ़ाने की रणनीति.
पश्चिमी उत्तर प्रदेश की जाट राजनीति से निकली पार्टी अब पूर्वांचल में ताकत आजमा रही है, और इसके राजनीतिक अर्थ दूर तक जाते दिख रहे हैं. केंद्रीय मंत्री और राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष जयंत चौधरी देवरिया की रैली को पूर्वांचल में पार्टी की नई शुरुआत के तौर पर पेश कर रहे हैं.
उनके साथ राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) त्रिलोक त्यागी और प्रदेश अध्यक्ष रामाशीष राय मंच साझा करेंगे. राय का कहना है, “देवरिया की रैली सिर्फ एक जिला कार्यक्रम नहीं है. हम पूर्वी उत्तर प्रदेश में अपने संगठन को नई ऊर्जा देना चाहते हैं. आने वाले हफ्तों में आजमगढ़, गाजीपुर और मऊ में भी बड़े कार्यक्रम होंगे.” राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि BJP सांसद शशांक मणि त्रिपाठी की मौजूदगी रैली को अलग महत्व दे सकती है.
2024 के लोकसभा चुनाव के बाद RLD के एनडीए में शामिल होने से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट वोटों के समीकरण बदले थे. अब अगर BJP और RLD के नेता पूर्वांचल में साझा मंच पर दिखाई देते हैं, तो यह गठबंधन की मजबूती का संकेत होगा. लेकिन इसके भीतर छिपी राजनीति और दिलचस्प है.
RLD की जड़ें पूर्व प्रधानमंत्री और किसान नेता चौधरी चरण सिंह की विरासत से जुड़ी हैं. पश्चिमी उत्तर प्रदेश की जाट-मुस्लिम राजनीति लंबे समय तक इसकी पहचान रही. RLD और BJP का रिश्ता हमेशा उतार-चढ़ाव भरा रहा है. वर्ष 2009 में दोनों दल गठबंधन में थे और जयंत चौधरी मथुरा से सांसद बने. लेकिन 2014 में गठबंधन टूटा और RLD का खाता तक नहीं खुला. 2019 में भी जब RLD ने सपा-बसपा गठबंधन में चुनाव लड़ा, तो उसे एक भी सीट नहीं मिली. वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में RLD ने सपा के साथ मिलकर मुकाबला किया. पार्टी को 8 सीटें मिलीं और वह पश्चिमी यूपी में फिर से प्रासंगिक हो गई. 2024 के लोकसभा चुनाव में BJP के साथ गठबंधन कर RLD ने नई दिशा ली.
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट वोटों के एक हिस्से को एनडीए के पक्ष में लामबंद करने में उसकी भूमिका को BJP ने भी सार्वजनिक रूप से सराहा. राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि इसी अनुभव ने जयंत चौधरी को यह भरोसा दिया कि अगर पार्टी पश्चिम तक सीमित रहेगी तो उसकी राजनीतिक धमक सीमित रहेगी. राजनीतिक विशेषज्ञ प्रोफेसर आर.के. मिश्रा कहते हैं, “RLD समझती है कि सिर्फ अपने गढ़ को बचाकर वह लंबे समय तक प्रासंगिक नहीं रह सकती. पूर्वांचल में सक्रियता दो मकसद पूरे करती है. एक, पार्टी को राज्यव्यापी पहचान मिलती है. दो, गठबंधन की राजनीति में उसकी उपयोगिता बढ़ती है.” उनके मुताबिक, अगर पार्टी कुछ जिलों में भी संगठन खड़ा कर लेती है तो 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सीट बंटवारे में उसका दावा मजबूत होगा.
असल में वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद से RLD पूर्वी यूपी में पांव पसारने की रणनीति बनाने में जुट गई थी. पिछले वर्ष 23 जून, 2025 को, जयंत ने पूर्वांचल क्षेत्र में पार्टी का असर बढ़ाने के मकसद से वाराणसी में पार्टी कार्यकर्ताओं, युवाओं और स्थानीय नेताओं के साथ बातचीत के सेशन किए थे. इससे पहले, मथुरा में अपनी स्टेट एग्जीक्यूटिव मीटिंग में, पार्टी ने खास तौर पर ज़मीनी स्तर पर लोगों को इकट्ठा करने और बस्ती, बलिया और सोनभद्र समेत पूर्वी UP के जिलों में अपना विस्तार करने पर फोकस किया था.
हालांकि पूर्वांचल का सामाजिक गणित पश्चिमी उत्तर प्रदेश से बिल्कुल अलग है. यहां गैर-यादव ओबीसी, सवर्ण, उप-जातियों में बंटा पिछड़ा वर्ग और बड़ी दलित आबादी चुनावी समीकरण को जटिल बनाती है. BJP का मजबूत संगठन, समाजवादी पार्टी का पारंपरिक वोट बैंक और BSP का जातीय नेटवर्क पहले से मौजूद है. ऐसे में RLD के लिए जगह बनाना चुनौतीपूर्ण होगा. RLD के राष्ट्रीय सचिव अनुपम मिश्रा कहते हैं, “हर पार्टी अपने पारंपरिक इलाके से आगे बढ़ना चाहती है. पूर्वी उत्तर प्रदेश में हमारी मौजूदगी पहले भी रही है. हम बूथ स्तर तक संगठन खड़ा कर रहे हैं. यह सिर्फ चुनावी स्टंट नहीं, बल्कि दीर्घकालिक रणनीति है.” वे यह भी जोड़ते हैं कि पार्टी सामाजिक गठबंधन को व्यापक बनाने पर काम कर रही है, जिसमें दलित, मुस्लिम और गैर-यादव ओबीसी समुदायों से संवाद बढ़ाया जा रहा है.
विश्लेषकों का मानना है कि ‘एजेजीआर’ यानी अहीर-जाट-गुर्जर-राजपूत समीकरण को आगे बढ़ाकर ‘डी-एमएजेजीआर’ यानी दलित-मुस्लिम-अहीर-जाट-गुर्जर-राजपूत फॉर्मूले की चर्चा इसी दिशा का संकेत है. BJP जहां गैर-यादव ओबीसी वोटों को समेटने की कोशिश में है और समाजवादी पार्टी पीडीए फॉर्मूले पर जोर दे रही है, वहीं RLD खुद को तीसरे सामाजिक प्रयोग के तौर पर पेश करना चाहती है. देवरिया निवासी और राजनीतिक विश्लेषक सीमा अग्रवाल कहती हैं, “यह दबाव की राजनीति का सॉफ्ट मॉडल है. RLD खुलकर BJP को चुनौती नहीं दे सकती क्योंकि वह गठबंधन का हिस्सा है. लेकिन अगर वह नए इलाकों में संगठन खड़ा करती है तो सीट बंटवारे में उसकी आवाज मजबूत होगी. यह दबाव सीधे बयानबाजी से नहीं, बल्कि जमीन पर उपस्थिति से बनेगा.”
देवरिया की रैली को इसी नजर से देखा जा रहा है. अगर भीड़ उम्मीद के मुताबिक जुटती है और स्थानीय स्तर पर संगठन सक्रिय दिखता है, तो यह संदेश जाएगा कि RLD पूर्वांचल में गंभीर है. अगर कार्यक्रम प्रतीकात्मक रह जाता है तो इसे सीमित प्रभाव की कवायद माना जाएगा. उत्तर प्रदेश की राजनीति में जहां हर चुनाव से पहले नए सामाजिक समीकरण गढ़े जाते हैं, वहां RLD की लुक-ईस्ट रणनीति एक महत्वपूर्ण प्रयोग है. देवरिया की रैली पश्चिम से पूरब की ओर बढ़ते एक राजनीतिक कारवां का प्रतीक है, जो सिर्फ भूगोल नहीं, बल्कि शक्ति संतुलन भी बदलने की कोशिश कर रहा है.