ट्रंप टैरिफ से उबर रहे गुजरात के हीरा और सिरेमिक उद्योग पर कैसे पड़ी ईरान युद्ध की मार

ईरान-इजरायल के बीच जारी जंग के कारण गुजरात का हीरा व्यापार और सिरेमिक उद्योग गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर

अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच लंबे खिंच रहे युद्ध ने गुजरात के हीरा व्यापार और सिरेमिक उद्योग में फिर से दहशत फैला दी है. इन क्षेत्रों से जुड़े ज्यादातर कारोबारी निर्यात पर निर्भर हैं और अपनी आजीविका के लिए पूरी तरह इसी पर टिके हुए हैं.

पिछले महीने अमेरिका के जरिए लगाए गए भारी टैरिफ को वापस लेने या काफी कम करने के बाद इन क्षेत्रों से जुड़े कारोबारियों की समस्याएं कम होने लगी थीं. यह उद्योग छह महीने से अधिक की आर्थिक मुश्किलों से उबर ही रहे थे कि अब एक और जंग ने उनके लिए नई चुनौती खड़ी कर दी है.

दुनिया भर में हीरे, रत्न और आभूषणों की सप्लाई चेन में भारत की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है. ऐसा इसलिए क्योंकि दुनिया के हर 10 हीरों में से लगभग 9 को काटने और पॉलिश करने का काम भारत करता है. कच्चे माल और बाजारों के लिए भारतीय कारोबारी दुबई और इजरायल जैसे बाहरी केंद्रों पर बहुत अधिक निर्भर हैं.

सूरत से निकलने वाले करीब 70 फीसद कच्चे और पॉलिश किए हुए हीरे दुनिया के अन्य हिस्सों तक दुबई के रास्ते से गुजरकर जाते हैं. मतलब साफ है कि हीरे और आभूषणों की सप्लाई चेन में दुबई बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. इसके अलावा, भारत इजरायल के आभूषण उद्योग को कटे और पॉलिश किए हुए हीरे निर्यात करता है, जबकि वहां से कच्चे हीरों का आयात करता है.  

खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के देश और मध्य पूर्व एवं उत्तरी अफ्रीका (MENA) क्षेत्र न केवल भारत के रत्न एवं आभूषण के लिए महत्वपूर्ण निर्यात क्षेत्र हैं, बल्कि भारतीय कंपनियों ने यहां व्यवसायिक हित को ध्यान में रखते हुए अपनी कई ब्रांच भी स्थापित की हैं. इसके अलावा, कंपनियों ने यहां क्षेत्रीय कार्यालय बनाने के साथ मैन्यूफैक्चरिंग और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क सहित अन्य व्यापारिक क्षेत्रों में निवेश किए हैं.  

इसका तात्कालिक प्रभाव सप्लाई चेन के ठप पड़ने के कारण देखने को मिल रहा है. UAE के हवाई क्षेत्र डिस्टर्ब होने के कारण भारत, दुबई और इजरायल के बीच कच्चे और पॉलिश किए हुए हीरों की आवाजाही प्रभावित हुई है. इन सबकी वजह से आपूर्ति बाधित हो रही है और निर्यात में देरी हो रही है. सूरत डायमंड एसोसिएशन के पूर्व प्रमुख दिनेश नवाडिया का कहना है कि भारत प्रतिदिन सूरत और मुंबई से दुबई को 400-500 खेप निर्यात करता है और 200-300 आयात करता है, जो फिलहाल पूरी तरह से ठप हो गया है.

जेम एंड ज्वैलरी एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल (GJEPC) के अध्यक्ष किरीट भंसाली के मुताबिक, डायमंड जेम एंड ज्वैलरी सेक्टर के लिए स्थिति गंभीर और चिंताजनक है. भंसाली कहते हैं, "इस तरह की रुकावटें इस क्षेत्र में उत्पादन कार्यक्रम को धीमा कर सकती हैं. प्रोडक्शन की लागत बढ़ सकती हैं. बीमा का बोझ बढ़ना एक अन्य अलग और महत्वपूर्ण वजह है. इस अतिरिक्त अनिश्चितता से छोटे और मध्यम आकार की हीरा कंपनियों पर दबाव बढ़ जाता है, जिनमें से कई कम मुनाफे पर काम करती हैं."

अप्रैल 2024 से मार्च 2025 के बीच भारत का इजरायल को निर्यात करीब 55 करोड़ डॉलर रहा, जबकि आयात 26 करोड़ डॉलर का था. इजरायल उच्च मूल्य वाले उत्पादों, जैसे कि सॉलिटेयर डायमंड और विशेष आभूषणों के लिए एक उभरता हुआ बाजार है. यह बात सिर्फ हीरे तक सीमित नहीं है, बल्कि दुबई सोने की आपूर्ति के लिए भी प्रमुख केंद्र है. ऐसे में मीडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव का भारत में सोने की उपलब्धता और कीमतों पर भी प्रभाव पड़ सकता है.

GJEPC का दुबई स्थित इंडिया ज्वैलरी एक्सपोजिशन सेंटर (IJEX) और सऊदी अरब ज्वैलरी एक्सपोजिशन (SAJEX) इस क्षेत्र के कारोबारियों के लिए मध्य पूर्व में किए गए दीर्घकालिक निवेश के उदाहरण हैं.

2024-25 में दुबई को निर्यात का मूल्य 7,86.80 करोड़ डॉलर था, जबकि इसी अवधि में आयात 11,00 करोड़ डॉलर रहा. खाड़ी क्षेत्र में बड़ी संख्या में भारतीय प्रवासी भी रहते हैं, जिनमें से कई रत्न और आभूषण व्यापार से सीधे जुड़े हुए हैं.

भंसाली ने कहा, “इन गहरे संबंधों को देखते हुए, किसी भी प्रकार की दीर्घकालिक अस्थिरता का व्यापारिक माहौल, माल की आवाजाही, कच्चे माल के आयात, तैयार माल के निर्यात पर बुरा असर पड़ सकता है. यही कारण है कि GJEPC इस क्षेत्र के कारोबारी और सरकार के साथ लगातार संपर्क में है. हम स्थिति का आकलन करके रत्न और आभूषण निर्यात पर संभावित प्रभाव का मूल्यांकन करेंगे और सरकार से उसी के हिसाब से उचित कदम उठाने का आग्रह करेंगे.”  

इस बीच, होर्मुज स्ट्रेट से भारत को LPG और पेट्रोलियम की आपूर्ति बाधित होने के कारण गुजरात के मोरबी जिले में सिरेमिक उद्योग को भी भीषण संकट का सामना करना पड़ रहा है. इस उद्योग से जुड़े लोगों का दावा है कि उनके पास केवल कुछ दिनों का ही ऊर्जा भंडार है, जिसके बाद अगर सरकार घरेलू खपत को प्राथमिकता देते हुए उद्योग को आपूर्ति बंद कर देती है, तो लगभग 500 इकाइयां बंद हो जाएंगी.

सिरेमिक टाइल निर्माण में अत्यधिक ऊर्जा की खपत होती है. सिरेमिक के भट्टे 1,000-1,200 डिग्री सेल्सियस के तापमान पर लगभग निरंतर चलते रहते हैं. ईंधन की लागत आमतौर पर उत्पादन लागत का 30-40 फीसद होती है, इसलिए प्राकृतिक गैस या प्रोपेन की आपूर्ति में किसी भी प्रकार की रुकावट उत्पादन, मूल्य निर्धारण और निर्यात प्रतिस्पर्धा पर असर डालती है. इनका वार्षिक कारोबार 50,000 करोड़ रुपए है और यह प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लगभग 3,50,000 लोगों को रोजगार प्रदान करता है.

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