क्या ‘वन डिस्ट्रिक्ट, वन कुज़ीन’ के जरिए वोट की थाली सजा रही योगी सरकार?
योगी सरकार ने “वन डिस्ट्रिक्ट वन कुजीन” (ODOC) के ज़रिये पारंपरिक व्यंजनों, हलवाइयों और कारीगरों को विकास और रोज़गार से जोड़ने की पहल की है

विधानसभा चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नया स्वाद घुल गया है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ‘विरासत संग विकास’ के अपने विजन को आगे बढ़ाते हुए अब सीधे रसोई और थाली को राजनीति के केंद्र में ला दिया है. ‘वन डिस्ट्रिक्ट, वन कुज़ीन’ यानी ODOC योजना केवल एक सांस्कृतिक या आर्थिक पहल नहीं रह गई है, बल्कि इसे BJP सरकार की जमीनी पहुंच मजबूत करने और सामाजिक समीकरण साधने के एक औज़ार के तौर पर देखा जा रहा है.
यूपी दिवस के मौके पर 24 जनवरी को इस योजना का औपचारिक शुभारंभ और उसके बाद लखनऊ के राष्ट्र प्रेरणा स्थल पर ODOC फूड कोर्ट की भारी भीड़ ने साफ संकेत दे दिया कि सरकार इस योजना को चुनावी साल में बड़े नैरेटिव के रूप में पेश करने जा रही है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बार बार इस बात पर जोर दे रहे हैं कि उत्तर प्रदेश ‘बीमारू राज्य’ की छवि से बाहर निकलकर अब भारत के ग्रोथ इंजन के तौर पर खड़ा है, और ODOC इसी बदलाव की अगली कड़ी है.
वन डिस्ट्रिक्ट, वन कुज़ीन क्या है
ODOC योजना के तहत उत्तर प्रदेश के सभी 75 जिलों से एक-एक पारंपरिक और ऐतिहासिक व्यंजन को चुना जाएगा. उस व्यंजन की ब्रांडिंग, पैकेजिंग, गुणवत्ता मानकीकरण, मार्केटिंग और ई कॉमर्स के जरिए देश और दुनिया के बाजारों तक पहुंच सुनिश्चित की जाएगी. सरकार का दावा है कि जैसे ODOP ने हस्तशिल्प और कुटीर उद्योगों को नई पहचान दी, वैसे ही ODOC स्थानीय हलवाइयों, कारीगरों और छोटे फूड वेंडर्स के लिए आजीविका का मजबूत जरिया बनेगा.
लखनऊ के लिए रेवड़ी, गजक और मलाई मक्खन, आगरा का पेठा, मथुरा और अयोध्या का पेड़ा, काशी की मलइयो, बाराबंकी की चंद्रकला, संडीला का लड्डू, कानपुर का समोसा, पूर्वांचल का बाटी चोखा और लिट्टी चोखा जैसे व्यंजन इस योजना की रीढ़ हैं. सरकार मानती है कि ये स्वाद केवल खाने की चीजें नहीं हैं, बल्कि इनके साथ स्थानीय इतिहास, परंपरा और सामाजिक पहचान जुड़ी हुई है.
लाभार्थी वर्ग कौन
ODOC का सबसे बड़ा सीधा लाभार्थी वह वर्ग है जो अब तक अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में काम करता रहा है. हलवाई, मिठाई बनाने वाले कारीगर, ठेले वाले, छोटे रेस्टोरेंट संचालक, घरेलू महिला उद्यमी और पारंपरिक फूड वेंडर्स. सरकारी आकलन के मुताबिक प्रदेश में करीब 20 से 25 लाख लोग सीधे तौर पर पारंपरिक खाद्य व्यवसाय से जुड़े हैं. जातिगत संरचना की बात करें तो इस सेक्टर में ओबीसी, दलित और अल्पसंख्यक समुदायों की बड़ी हिस्सेदारी है. हलवाई समुदाय में वैश्य उपजातियों के साथ साथ यादव, कुशवाहा, मौर्य, सैनी, नाई, धोबी और मुस्लिम समुदाय के कारीगर बड़ी संख्या में शामिल हैं. अकेले मुस्लिम समुदाय की भागीदारी मिठाई, कचौड़ी, समोसा, सेवइयां और पारंपरिक व्यंजनों में 30 से 35 फीसदी तक मानी जाती है. ओबीसी वर्ग की हिस्सेदारी 40 फीसदी से अधिक बताई जाती है.
राजनीतिक संदेश साफ है. सरकार बिना सीधे जाति की बात किए रोज़गार और विरासत के नाम पर उन तबकों तक पहुंच बना रही है जो चुनाव में निर्णायक भूमिका निभाते हैं.
शहरी और अर्ध शहरी सीटों पर निशाना
एक जिला, एक उत्पाद यानी ODOP के बाद ODOC को BJP सरकार की ‘डबल इंजन’ रणनीति का विस्तार माना जा रहा है. पार्टी नेताओं का तर्क है कि यह योजना केवल सब्सिडी या अनुदान तक सीमित नहीं है, बल्कि लोगों को आत्मनिर्भर बनाने की कहानी गढ़ती है. स्थानीय स्तर पर कारीगरों का रजिस्ट्रेशन, MSME से जोड़ना, FSSAI सर्टिफिकेशन और ई कॉमर्स प्लेटफॉर्म से लिंक करना BJP को यह कहने का मौका देता है कि सरकार रोज़गार दे रही है, मुफ्त नहीं.
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि ODOC के ज़रिए BJP खास तौर पर शहरी और अर्ध शहरी सीटों पर अपनी पकड़ मजबूत करना चाहती है. लखनऊ, कानपुर, आगरा, वाराणसी, मेरठ जैसे शहरों में लाखों परिवार खाद्य कारोबार से जुड़े हैं. इन इलाकों में ODOC को एक ‘लोकल गर्व’ के रूप में पेश किया जा रहा है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बार-बार यह कहते रहे हैं कि यह योजना किसी एक शहर की नहीं, पूरे प्रदेश की पहचान है. लखनऊ को यूनेस्को से गैस्ट्रोनॉमी सिटी का दर्जा मिलने को सरकार ने पूरे यूपी की जीत बताया. लखनऊ के एक राजनीतिक विश्लेषक आशु गौतम कहते हैं कि योगी सरकार सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को अब रोज़मर्रा की ज़िंदगी से जोड़ रही है. मंदिर, तीर्थ और विरासत के बाद अब खाना उस राजनीति का हिस्सा बन रहा है, जिससे आम आदमी भावनात्मक रूप से जुड़ता है.
एक अन्य विशेषज्ञ मानते हैं कि ODOC BJP के लिए ‘लो रिस्क, हाई रिवॉर्ड’ योजना है. अगर योजना चली तो रोज़गार और विरासत का श्रेय मिलेगा, और अगर नहीं चली तो भी इसका चुनावी नैरेटिव तुरंत नुकसान नहीं पहुंचाता.
विपक्ष की आपत्ति
समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने ODOC को चुनावी स्टंट करार दिया है. सपा नेता आशुतोष तिवारी का कहना है कि सरकार पहले से मौजूद बेरोज़गारी और महंगाई के मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए ‘जायके की राजनीति’ कर रही है. उनका आरोप है कि ODOP की तरह ODOC भी प्रचार तक सीमित रह जाएगी और असली लाभ बड़े ब्रांड और ठेकेदार ले जाएंगे. कांग्रेस नेताओं का कहना है कि बिना ठोस बजट और स्पष्ट क्रियान्वयन के यह योजना जमीन पर असर नहीं दिखाएगी. उनका सवाल है कि जिन छोटे हलवाइयों के पास दुकान तक नहीं है, वे FSSAI और पैकेजिंग के खर्च कैसे उठाएंगे.
BSP ने भी इस योजना में दलित उद्यमियों के लिए अलग प्रावधान न होने पर सवाल खड़े किए हैं. सरकार इन आरोपों को सिरे से खारिज करती है. MSME विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि ODOC में कारीगरों को प्रशिक्षण, सब्सिडी और तकनीकी सहायता दी जाएगी. इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पैकेजिंग के साथ मिलकर शेल्फ लाइफ बढ़ाने और सुरक्षित ट्रांसपोर्टेशन की ट्रेनिंग दी जा रही है. सरकार का दावा है कि अगले दो वर्षों में ODOC से कम से कम 5 लाख नए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोज़गार सृजित होंगे.