ईरान युद्ध ने कैसे बिगाड़ दिया राजस्थान की शादियों का मेन्यू?
होटल मालिकों को लगा था कि खाड़ी के तनाव से दुबई की लग्जरी शादियां राजस्थान की तरफ मुड़ेंगी

जैसे ही राजस्थान के पैलेस होटल्स और हेरिटेज रिसॉर्ट्स 'डेस्टिनेशन-वेडिंग' के सीजन के लिए कमर कस रहे थे, ईरान युद्ध ने राज्य की इन शाही दावतों पर एक अनचाहा ग्रहण लगा दिया है. होटल मालिकों ने शायद सोचा होगा कि वेस्ट एशिया के जियो-पॉलिटिकल तनाव की वजह से दुबई और अबू धाबी की लग्जरी शादियां जयपुर, उदयपुर और जोधपुर की तरफ मुड़ जाएंगी. लेकिन इसके उलट, कमर्शियल LPG की किल्लत एक नई चुनौती बनकर उभर रही है.
खाड़ी संकट से जुड़े एनर्जी इम्पोर्ट में रुकावट के बीच, ऑयल मार्केटिंग कंपनियों ने घरों की खपत को प्राथमिकता देने के लिए 19 किलो वाले कमर्शियल सिलेंडरों की सप्लाई रोकनी शुरू कर दी है. कैटरर्स और होटलों के लिए, यह इससे बुरे वक्त पर नहीं हो सकता था. अगर सप्लाई और कम होती है, तो शादियों के मेन्यू छोटे हो सकते हैं, खाना पकाने की लागत बढ़ सकती है और राजस्थान की फलती-फूलती डेस्टिनेशन-वेडिंग इंडस्ट्री के पूरे अर्थशास्त्र पर अप्रत्याशित दबाव आ सकता है.
इस युद्ध की तपिश युद्ध के मैदान से बहुत दूर तक महसूस की जा रही है. इस टकराव ने ग्लोबल एनर्जी मार्केट्स को हिला कर रख दिया है, Strait of Hormuz से गुजरने वाले शिपिंग रूट्स को रोक दिया है और पूरी खाड़ी के एविएशन कॉरिडोर्स में उथल-पुथल मचा दी है.
राजस्थान के लिए, इसका सीधा और तगड़ा असर हो रहा है. राज्य की अर्थव्यवस्था प्रवासी मजदूरों, एक्सपोर्ट मार्केट्स, टूरिज्म और एनर्जी सप्लाई चेन के जरिए वेस्ट एशिया से बहुत गहराई से जुड़ी है. जैसे-जैसे यह संकट बढ़ रहा है, इसका असर कई सेक्टर्स में महसूस किया जाने लगा है - रेमिटेंस पर निर्भर गांवों से लेकर एक्सपोर्ट के गोदामों और रेस्टोरेंट की रसोइयों तक.
सबसे बड़ी और फौरी चिंता प्रवासी मजदूरों की सुरक्षा की है. दक्षिणी राजस्थान के आदिवासी जिले - डूंगरपुर, बांसवाड़ा और प्रतापगढ़ - लंबे समय से खाड़ी देशों में रोजगार पर निर्भर रहे हैं. इन इलाकों के हजारों मजदूर कुवैत और दूसरे खाड़ी देशों के कंस्ट्रक्शन, हॉस्पिटैलिटी और सर्विस सेक्टर्स में काम करते हैं. अधिकारियों का अनुमान है कि राजस्थान के करीब 30,000 मजदूर अभी कुवैत में हैं, जहां फ्लाइट्स रुकने और बढ़ते तनाव ने भारी अनिश्चितता पैदा कर दी है. ये प्रवासी मजदूर हर साल रेमिटेंस के तौर पर करीब 5,000 करोड़ रुपए घर भेजते हैं, जिससे हजारों ग्रामीण परिवारों का गुजारा चलता है.
इधर घर पर भी घबराहट बढ़ रही है. इन जिलों के परिवार वहां के हालात पर बारीक नजर रखे हुए हैं. उन्हें डर है कि अगर युद्ध लंबा खिंचा तो नौकरियां जा सकती हैं या फिर वेस्ट एशिया के पुराने संकटों की तरह लोगों को सुरक्षित निकालने का अभियान चलाना पड़ सकता है. राजस्थानियों के कुछ छोटे ग्रुप्स ने पहले ही लौटना शुरू कर दिया है. युद्ध की वजह से फ्लाइट्स रुकने के बाद, हाल ही में दुबई से सौ से ज्यादा तीर्थयात्रियों और ट्रैवलर्स (जिनमें जोधपुर के 106 लोग शामिल थे) को कोच्चि और अहमदाबाद के रास्ते वापस लाया गया. अजमान में, जयपुर के बिजनेसमैन धीरज जैन ने डिप्लोमैटिक मिशन्स के साथ तालमेल बिठाते हुए वहां फंसे करीब 200 भारतीयों को अस्थायी रूप से पनाह दी.
इस अनिश्चितता का एक और बड़ा शिकार राजस्थान का एक्सपोर्ट सेक्टर हुआ है. राज्य के कुल एक्सपोर्ट का करीब 10 प्रतिशत - हैंडीक्राफ्ट, फर्नीचर, टेक्सटाइल, पत्थर और जूलरी - खाड़ी के बाजारों में जाता है. शिपिंग में रुकावट और इंश्योरेंस की बढ़ती लागत ने ट्रेड को सुस्त करना शुरू कर दिया है. जोधपुर की विश्व प्रसिद्ध लकड़ी के फर्नीचर और मेटल हैंडीक्राफ्ट इंडस्ट्रीज पर इसकी सबसे तगड़ी मार पड़ी है. एक्सपोर्टर्स का कहना है कि लॉजिस्टिक्स के अनिश्चित होने से उनके गोदाम बिना भेजे गए माल से भरते जा रहे हैं.
जयपुर की जेमस्टोन और जूलरी इंडस्ट्री को भी इन झटकों का अहसास हो रहा है. 'पिंक सिटी' रंगीन जेमस्टोन की कटिंग और ट्रेडिंग के लिए दुनिया के सबसे अहम सेंटर्स में से एक है, और इसका ज्यादातर बिजनेस दुबई और हांगकांग जैसे हब से होकर गुजरता है. जयपुर चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के मानद सचिव अजय काला कहते हैं कि वेस्ट एशिया के एयर रूट्स बंद होने से ट्रेड फ्लो पर पहले ही असर पड़ने लगा है. एयरलाइंस के अपनी फ्लाइट्स को युद्ध वाले इलाकों से डायवर्ट करने के कारण कार्गो शिपमेंट धीमे और महंगे होते जा रहे हैं.
एक्सपोर्टर यह भी बता रहे हैं कि इंटरनेशनल एग्जीबिशन में अमेरिकी और मिडिल-ईस्ट के खरीदारों की भागीदारी कम हो गई है. सोने की बढ़ती कीमतों ने पहले ही ग्लोबल जूलरी डिमांड को सुस्त कर रखा है, उस पर से ये जियो-पॉलिटिकल तनाव इस सेक्टर के लिए अनिश्चितता की एक और परत जोड़ रहे हैं, जो पूरे राजस्थान में हजारों कारीगरों और छोटे एक्सपोर्टर्स का पेट पालता है.
टूरिज्म, जो राजस्थान की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा पिलर है, उस पर भी मिला-जुला असर दिख रहा है. यूरोप और नॉर्थ अमेरिका से आने वाले कई इंटरनेशनल ट्रैवलर्स दुबई या दोहा जैसे वेस्ट एशियन एविएशन हब के जरिए भारत पहुंचते हैं. एयरलाइंस के रूट बदलने और टिकटों के दाम बढ़ने से टूर ऑपरेटर्स का कहना है कि कुछ यात्री अपना प्लान टाल रहे हैं. जयपुर की ट्रैवल फर्म 'राजपूताना हॉलिडे मेकर्स' के संजय कौशिक बताते हैं कि ऑपरेटर्स को जयपुर, जोधपुर और उदयपुर जैसे डेस्टिनेशंस के लिए 'लास्ट-मिनट कैंसिलेशन' में बढ़ोतरी दिख रही है, वह भी ऐसे समय में जो आमतौर पर एक बहुत बिजी सीजन होता है.
हालांकि, यह संकट एक अनचाहा मौका भी ला रहा है. कुछ लग्जरी शादियां और कॉर्पोरेट इवेंट्स जो पहले दुबई या अबू धाबी में प्लान किए गए थे, अब उनके लिए राजस्थान पर विचार किया जा रहा है. राज्य के पैलेस, हेरिटेज होटल्स और हॉस्पिटैलिटी इंफ्रास्ट्रक्चर इसे 'हाई-एंड' सेलिब्रेशंस के लिए एक आकर्षक और सुरक्षित विकल्प बनाते हैं. लेकिन यह मौका भी हाथ से निकल सकता है अगर कमर्शियल रसोइयों को प्रभावित करने वाली LPG की किल्लत जारी रही.
पूरे भारत में, ऑयल मार्केटिंग कंपनियों ने कमर्शियल LPG सिलेंडरों की सप्लाई को सीमित करना शुरू कर दिया है, जिनका इस्तेमाल रेस्टोरेंट, होटल, कैटरर्स और बैंक्वेट हॉल बड़े पैमाने पर करते हैं. राजस्थान में, जयपुर की गैस एजेंसियों को कथित तौर पर कमर्शियल सिलेंडरों के नए अलॉटमेंट को धीमा करने या रोकने के निर्देश मिले हैं. रेस्टोरेंट और होटल अब अपने पुराने स्टॉक के भरोसे हैं, और रिफिल में दो से आठ दिन तक की देरी हो रही है.
इस किल्लत से निपटने के लिए कुछ रेस्टोरेंट ने पहले ही मेन्यू छोटा करना या इलेक्ट्रिक और इंडक्शन कुकिंग सिस्टम का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है. होटल मालिकों की चेतावनी है कि अगर यह रुकावट एक हफ्ते से ज्यादा चली, तो बैंक्वेट हॉल और शादी के वेन्यू का काम बुरी तरह प्रभावित हो सकता है. बढ़ती कीमतों ने यह दबाव और बढ़ा दिया है. 19 किलो वाले कमर्शियल LPG सिलेंडर की कीमत लगभग 115 रुपये बढ़ गई है, जिससे देशभर में रेस्टोरेंट्स और कैटरर्स की ऑपरेटिंग कॉस्ट बढ़ गई है. कई दूसरे राज्यों में तो यह संकट और भी गहरा है. महाराष्ट्र और कर्नाटक के रेस्टोरेंट एसोसिएशन ने चेतावनी दी है कि अगर सप्लाई रुकी रही तो खाने-पीने की जगहें अस्थाई रूप से बंद हो सकती हैं, जबकि बेंगलुरु के होटल संगठनों ने रसोइयां बंद होने की चेतावनी दी है.
इस युद्ध से मिल रहे एनर्जी के झटके राजस्थान की पूरी अर्थव्यवस्था में महंगाई को भी हवा दे रहे हैं. ग्लोबल क्रूड की कीमतों में उछाल के बाद, जयपुर में पेट्रोल की कीमतें 105 रुपये प्रति लीटर को पार कर गई हैं जबकि डीजल 91 रुपये प्रति लीटर के करीब पहुंच गया है. महंगे ईंधन से खेती की पैदावार और कारखानों में बनने वाले माल, दोनों का ट्रांसपोर्टेशन का खर्च बढ़ रहा है.
कई बाजारों में सब्जियों के दाम पहले ही बढ़ चुके हैं, जबकि भीलवाड़ा के टेक्सटाइल और चित्तौड़गढ़ के सीमेंट प्लांट जैसी 'एनर्जी-इंटेंसिव' इंडस्ट्रीज अपनी बढ़ती लागत के लिए कमर कस रही हैं. देशभर में घरेलू LPG की कीमतें भी 60 रुपये प्रति सिलेंडर बढ़ गई हैं, जिससे घर का खर्च और बढ़ गया है. जयपुर में, बुकिंग पीरियड को एक हफ्ते के लिए बढ़ा दिया गया है.
राजस्थान के लिए, ईरान का यह टकराव बताता है कि लोकल अर्थव्यवस्थाएं ग्लोबल जियो-पॉलिटिक्स के साथ कितनी गहराई से उलझी हुई हैं. प्रवासी मजदूर, एक्सपोर्ट इंडस्ट्रीज, टूरिज्म का फ्लो और यहां तक कि रेस्टोरेंट्स की रसोइयां भी खाड़ी से गुजरने वाली सप्लाई चेन से जुड़ी हैं. अगर तनाव कम होता है और होर्मुज जलडमरूमध्य से शिपिंग स्थिर हो जाती है, तो इनमें से कई रुकावटें अस्थाई साबित हो सकती हैं. लेकिन अगर यह युद्ध लंबा खिंचता है, तो यह कई गहरे बदलाव ला सकता है- जैसे महंगी एनर्जी, ठप पड़े ट्रेड रूट्स और लेबर माइग्रेशन की भारी अनिश्चितता.