CAG का खुलासा, गुजरात में जंगल की जमीन पर बिना नियम-कायदे काम हो रहे!
CAG की रिपोर्ट के मुताबिक, गुजरात में पर्यावरण नियमों का खुलेआम उल्लंघन हो रहा है, जिसे कानूनों की पुरानी व्याख्याओं या नियमों की अनदेखी से छिपाया जा रहा है

गुजरात के वन्य क्षेत्रों या जंगल की जमीन पर कई नए प्रोजेक्ट्स पर काम सरकारी अनुमति मिलने से पहले ही शुरू हो जाते हैं. प्रदेश में वन्यजीवों के रहने वाले इलाकों में धड़ल्ले से सड़कें बनाई जा रही हैं. इतना ही नहीं, वन्यजीवों के लिए सुरक्षित क्षेत्रों में फैक्टरियों के लिए जमीनें भी आवंटित की जा रही हैं.
यह सब नियमों का ठीक से पालन किए बिना हो रहा है. एक तरह से जंगल क्षेत्रों में निर्माण कार्य को खुलेआम बढ़ने दिया जा रहा है. CAG ने अपनी हालिया रिपोर्ट में गुजरात सरकार की इन गलतियों उठाया है. यह रिपोर्ट 25 मार्च को विधानसभा में पेश की गई.
रिपोर्ट में उदाहरण देते हुए बताया गया है कि डांग जिले में एक वन्यजीव अभयारण्य से गुजर रहे स्टेट हाईवे को चौड़ा करने का काम जून 2024 में पूरा कर लिया गया. हैरानी की बात यह है कि इसके लिए जिम्मेदार लोगों और अधिकारियों ने भारत सरकार की अनुमति तक नहीं ली.
इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए तय की गई शर्तें, जैसे जानवरों के लिए क्रॉसिंग (पुल या रास्ते) बनाना, उसका भी पालन नहीं किया गया. डांग जिला तेंदुओं, रीछ आदि के लिए वन्यजीव गलियारा है. ऑडिट रिपोर्ट बताती है कि प्रदेश में नियमों की धड़ल्ले से अनदेखी हो रही है.
कई प्रोजेक्ट्स में 21 हेक्टेयर से ज्यादा जंगल की जमीन बिना पहले अनुमति के ही दूसरे कामों के लिए दे दी गई है. राज्य की एजेंसियों ने दस साल पहले दी गई पुरानी अनुमतियों पर भरोसा किया और नई सख्त नियमों को नजरअंदाज कर दिया, जिनमें सड़क की मौजूदा सीमा के अंदर काम के लिए भी केंद्र सरकार की मंजूरी जरूरी है. नतीजा यह हुआ कि कानून क्या कहता है और जमीन पर क्या हो रहा है, उसके बीच का फर्क लगातार बढ़ता जा रहा है.
इको-सेंसिटिव जोन्स यानी राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव अभयारण्यों के चारों ओर बने बफर क्षेत्रों में भी निर्माण कार्य तेजी से हो रहे हैं. दरअसल, इन क्षेत्रों में वन्यजीवों को शहरों की गतिविधियों से बचाने के लिए सुरक्षा का इंतजाम किया जाता है. ऑडिट रिपोर्ट में ऐसी कम से कम 22 संदिग्ध मंजूरियां मिलने की बात कही गई है.
इन गतिविधियों को या तो पूरी तरह प्रतिबंधित होना चाहिए था या बहुत सख्ती से नियंत्रित किया जाना चाहिए था. इन 22 मामलों में से 19 उद्योगों से संबंधित थे और 3 इको-टूरिज्म से. इनमें पेट्रोल पंप, एग्रो-प्रोसेसिंग यूनिट और खतरनाक सामग्री से जुड़ी स्टोरेज सुविधाएं शामिल थीं.
रिपोर्ट में कहा गया है कि वन विभाग के अधिकारियों की आपत्तियों के बावजूद और बिना उचित कारण बताए NOCs (नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट) जारी कर दिए गए. कई मामलों में चालाकी दिखाते हुए औद्योगिक कामों को व्यावसायिक बता दिया गया, ताकि सख्त जांच न हो. ऐसा कई सारे प्रोजेक्ट को मंजूरी देने के लिए किया गया है.
सोलर प्रोजेक्ट्स को भी कम प्रभाव वाली श्रेणी में रखकर मंजूरी दे दी गई. कुछ अप्रूवल सीनियर वन अधिकारियों की आपत्ति के बावजूद और बिना पर्यावरण प्रभाव की जांच किए दिए गए. इको-टूरिज्म के मामले में रिपोर्ट बताती है कि इको-सेंसिटिव जोन के नियमों के अनुसार टूरिज्म मास्टर प्लान बनाए बिना ही प्रस्ताव स्वीकार कर लिए गए और NOCs जारी कर दिए गए.
जिला स्तर की मॉनिटरिंग कमेटियों को भी नजरअंदाज कर दिया गया. CAG ने कहा कि नियम और प्रक्रियाएं तोड़ी गईं. कुछ प्रोजेक्ट्स का साइज छोटे स्तर की गतिविधियों की तय सीमा से ज्यादा था.
कम से कम 35 जगहों पर वन विभाग की जरूरी मंजूरी के बिना ही जमीन को गैर-कृषि उपयोग में बदल दिया गया. इनसे घर, दुकानें, होटल और अन्य वजहों से निर्माण की अनुमति मिल गई. यहां तक कि संरक्षित क्षेत्रों से सिर्फ एक किलोमीटर दूर के इलाकों में भी, जहां नियम सबसे कड़े हैं.
रिपोर्ट में कहा गया कि कई मामलों में वन विभाग की NOC लिए बिना ही अनुमति दे दी गई और जो काम बताया गया था, वह NOC में बताए काम से अलग था. इसका एक साफ-साफ उदाहरण है कि भावनगर के पास सौराष्ट्र का ब्लैकबक क्षेत्र. वहां एक लॉज बिना अनुमति के चलता रहा और बढ़ता रहा.
अदालत के आदेश के बावजूद भी उसे बंद नहीं किया गया. सैटेलाइट तस्वीरों में दिखा कि नई इमारतें बनती जा रही थीं, लेकिन अधिकारियों ने कुछ नहीं किया. इन नियमों को तोड़ने के अलावा, रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए बनी शर्तें नहीं मानी जा रही हैं. जानवरों के आने-जाने के रास्ते नहीं बनाए गए. इससे सौराष्ट्र के 10 जिलों में घूमने वाले एशियाटिक शेर और तेंदुओं के एक्सीडेंट और मौत का खतरा बढ़ गया है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि पर्यावरण नियमों का खुलेआम उल्लंघन हो रहा है. इन्हें लागू करने में लापरवाही बरती जा रही है. अक्सर गलत वर्गीकरण, पुरानी व्याख्याओं या नियमों की सीधी अनदेखी से इन उल्लंघनों को आसानी से छिपा लिया जाता है.