पंखों में सेंसर, नींद पर नजर! आत्महत्याएं रोकने के लिए क्या है IIT कानपुर का प्लान?
IIT कानपुर ने आत्महत्याएं रोकने के लिए हॉस्टल के पंखों में बदलाव किए हैं, काउंसलिंग और ‘सेंटर फॉर मेंटल हेल्थ एंड वेलबीइंग’ जैसी पहलें शुरू की हैं लेकिन इनके स्थाई असर सवाल उठ रहे हैं

उत्तर प्रदेश के प्रमुख तकनीकी संस्थानों में शुमार IIT कानपुर इन दिनों एक ऐसे संकट से जूझ रहा है, जिसने न सिर्फ अकादेमिक जगत बल्कि पूरे समाज का ध्यान अपनी ओर खींचा है. पिछले 25 महीनों में कैंपस में नौ छात्रों की आत्महत्या के मामलों ने संस्थान की व्यवस्था, छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य और शैक्षणिक माहौल पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.
इन घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि समस्या केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि संस्थागत और संरचनात्मक भी है. इसी दबाव के बीच अब IIT कानपुर ने बहुस्तरीय कदम उठाने शुरू किए हैं, जिनमें तकनीकी, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक सभी पहलुओं को शामिल करने की कोशिश की गई है.
तकनीकी उपाय : पंखों से लेकर पाइप तक बदलाव
सबसे पहले जिस कदम ने सुर्खियां बटोरीं, वह है हॉस्टल के कमरों में स्प्रिंग-लोडेड सीलिंग फैन लगाने का निर्णय. यह कदम सीधे तौर पर उन घटनाओं को रोकने के उद्देश्य से उठाया गया है, जिनमें पंखे का इस्तेमाल कर छात्रों ने खुद को नुकसान पहुंचाया. इन डिवाइस को इस तरह डिजाइन किया गया है कि अगर पंखे पर एक तय सीमा से अधिक वजन पड़ता है, तो पंखा नीचे झुक जाता है और साथ ही अलार्म बज उठता है. इसके साथ ही, हॉस्टल के कमरों में लगे कपड़े सुखाने के पाइप हटाए जा रहे हैं. शुरुआती चरण में हॉल 1 से 3 तक के पुराने हॉस्टलों में यह काम लगभग पूरा हो चुका है, जहां करीब 1500 कमरे हैं.
संस्थान की योजना है कि सभी 14 हॉस्टलों में यह बदलाव लागू किया जाए. संस्थान के निदेशक प्रो. मनिंद्र अग्रवाल के अनुसार, ये कदम एक बाहरी विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों के आधार पर उठाए जा रहे हैं. उनका कहना है कि ये पूरी तरह एक एहतियाती कदम हैं, जिसका मकसद जोखिम को कम करना है, न कि समस्या के मूल कारणों को नजरअंदाज करना.
तकनीकी बदलावों के साथ-साथ संस्थान ने मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को भी मजबूत करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं. ‘सेंटर फॉर मेंटल हेल्थ एंड वेलबीइंग’ (CMHW) की स्थापना इसी का हिस्सा है. इस केंद्र में 10 मनोवैज्ञानिक, एक मनोचिकित्सक और तीन विशेषज्ञ डॉक्टर तैनात हैं, जो छात्रों, शिक्षकों और कर्मचारियों को सहायता प्रदान करते हैं. इसके अलावा, संस्थान ने ‘YourDOST’ नामक ऑनलाइन इमोशनल वेलनेस प्लेटफॉर्म के साथ साझेदारी की है, जिससे 24x7 काउंसलिंग सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है. इस पहल का उद्देश्य उन छात्रों तक पहुंच बनाना है, जो अपनी समस्याएं सीधे अपने परिचितों या संस्थान के लोगों के साथ साझा करने में सहज महसूस नहीं करते. प्रो. अग्रवाल का मानना है कि कई बार छात्रों को एक “न्यूट्रल स्पेस” की जरूरत होती है, जहां वे बिना किसी झिझक के अपनी बात रख सकें। यह व्यवस्था उसी जरूरत को ध्यान में रखकर बनाई गई है.
छात्रों का समर्थन और सवाल दोनों
इन उपायों को लेकर कैंपस के भीतर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं. छात्र जिमखाना के कुछ पदाधिकारियों का मानना है कि यह कदम छात्रों को किसी भी अतिवादी निर्णय से रोकने के लिए जरूरी है. उनके मुताबिक, यह एक सामूहिक प्रयास है, जिसमें प्रशासन और छात्र दोनों की भागीदारी है.
हालांकि, कुछ छात्र इन उपायों को पर्याप्त नहीं मानते. उनका कहना है कि समस्या केवल आसपास के स्ट्रक्चर या उपकरणों की नहीं है, बल्कि संस्थान के भीतर मौजूद दबाव, प्रतिस्पर्धा और संवाद की कमी से जुड़ी है. एक छात्र के शब्दों में, “यह एक सामूहिक विफलता है, जहां हर स्तर पर सुधार की जरूरत है.” संस्थान भी अब इस बात को स्वीकार करता दिख रहा है कि समस्या की जड़ें गहरी हैं. खासकर पीएचडी छात्रों और उनके सुपरवाइजर के बीच संबंध एक संवेदनशील मुद्दा बनकर उभरे हैं.
कई मामलों में छात्रों ने गाइड के साथ संवाद की कमी, दबाव और असहज माहौल की शिकायत की है. इसी को ध्यान में रखते हुए संस्थान अब शिकायत निवारण तंत्र को मजबूत करने और संवाद बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है. बाहरी विशेषज्ञों की मदद से इन संबंधों को बेहतर बनाने और विवादों को समय रहते सुलझाने की कोशिश की जा रही है.
हाल की एक घटना के बाद छात्रों का आक्रोश भी खुलकर सामने आया. कैंपस में विरोध प्रदर्शन हुए, प्रशासन का घेराव किया गया और मोमबत्ती जलाकर मृत छात्रों को श्रद्धांजलि दी गई. यह विरोध केवल शोक नहीं, बल्कि व्यवस्था में बदलाव की मांग भी था. बढ़ते दबाव के बीच संस्थान ने एक तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन किया, जिसकी अध्यक्षता GSVM मेडिकल कॉलेज के मनोरोग विभाग के प्रमुख डॉ. धनंजय कुमार कर रहे हैं. समिति ने छात्रों से बातचीत कर उनके अनुभव और समस्याओं को समझने की कोशिश की है.
कैंपस में स्टूडेंट की नींद पर शोध
इन सभी प्रयासों के बीच एक दिलचस्प और महत्वपूर्ण पहल भी सामने आई है- छात्रों की नींद और हॉस्टल के माहौल पर रिसर्च. सिविल इंजीनियरिंग विभाग की प्रोफेसर अनुभा गोयल के नेतृत्व में यह अध्ययन किया जा रहा है कि हॉस्टल का वातावरण छात्रों की नींद और मानसिक स्थिति को कैसे प्रभावित करता है. 500 से अधिक छात्रों पर किए गए सर्वे में लगभग 70 प्रतिशत छात्रों ने खराब नींद की शिकायत की. इसके पीछे मुख्य कारणों में गर्मी, उमस, खराब वेंटिलेशन और बंद खिड़कियां शामिल हैं. यह अध्ययन इस बात की ओर इशारा करता है कि मानसिक स्वास्थ्य केवल भावनात्मक या मनोवैज्ञानिक मुद्दा नहीं है, बल्कि इसमें भौतिक और पर्यावरणीय कारकों की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है.
रिसर्च का अगला चरण और भी उन्नत है, जिसमें छात्रों के कमरों में सेंसर लगाए गए हैं, जो तापमान, नमी और वेंटिलेशन जैसे पैरामीटर रिकॉर्ड करते हैं. साथ ही, छात्रों को स्मार्टवॉच दी गई हैं, जो उनकी नींद के पैटर्न को ट्रैक करती हैं. इस डेटा के जरिए रिसर्चर्स यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि इनडोर एनवायरनमेंट और नींद की गुणवत्ता के बीच क्या संबंध है. इसका उद्देश्य केवल समस्या की पहचान करना नहीं, बल्कि भविष्य में बेहतर हॉस्टल डिजाइन और रहने की व्यवस्था विकसित करना भी है.
पारंपरिक रूप से भारतीय तकनीकी संस्थानों में ध्यान मुख्य रूप से अकादेमिक प्रदर्शन पर केंद्रित रहा है. लेकिन अब धीरे-धीरे यह समझ विकसित हो रही है कि मानसिक स्वास्थ्य, नींद और भावनात्मक संतुलन भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं. प्रो. गोयल के अनुसार, अगर छात्र अच्छी नींद नहीं ले पा रहे हैं, तो उनका फोकस, समझ और प्रदर्शन प्रभावित होता है. ऐसे में, संस्थानों को केवल पढ़ाई नहीं, बल्कि समग्र विकास पर ध्यान देना होगा.