कान्हा से प्रोजेक्ट टाइगर तक : हेमेंद्र सिंह पवार ने कैसे बदली वन संरक्षण की दिशा
भारत के सबसे खूबसूरत बाघ अभ्यारण्यों में से एक कान्हा की कल्पना और उसे जमीन पर उतारने का काम हेमेंद्र सिंह पवार (एच.एस. पवार) ने ही किया था

29 मई को भारत के वन संरक्षण क्षेत्र से जुड़े लोगों को बड़ा झटका लगा, जब भारतीय वन सेवा (IFS) के सबसे सम्मानित और पुरस्कृत अधिकारियों में से एक हेमेंद्र सिंह पवार के निधन की खबर सामने आई. 89 साल की आयु में पवार ने आखिरी सांस ली.
वन्यजीवों और उनके आवासों के संरक्षण में पवार का योगदान बहुत ही महत्वपूर्ण था. यही कारण है कि युवा वन अधिकारी और संरक्षण कार्यकर्ता उनके निधन के बाद उनके किए गए ऐतिहासिक कामों को याद कर रहे हैं.
हेमेंद्र सिंह पवार का जन्म 1937 में बालाघाट जिले में हुआ था, जो उस समय सेंट्रल प्रोविंसेस एंड बेरार प्रांत का हिस्सा था. बाद में यह इलाका मध्य प्रदेश बना. उन्होंने 1950 के दशक के अंत में वन विभाग में सहायक वन संरक्षक के रूप में अपनी सेवा शुरू की.
1967 में दक्षिण मंडला के डिविजनल फॉरेस्ट ऑफिसर (DFO) के रूप में काम करते हुए उनकी संरक्षण संबंधी दूरदर्शिता स्पष्ट रूप से दिखी. उनके प्रयासों से ही कान्हा नेशनल पार्क, जो भारत के सबसे खूबसूरत बाघ अभ्यारण्यों में से एक है, बाद के वर्षों में फला-फूला और ज्यादा क्षेत्रों में इसा विस्तार हुआ.
पवार कान्हा नेशनल पार्क के क्षेत्राधिकारी थे. उस दौर में मंडला जिले में संरक्षण के दो दिग्गज अधिकारी तैनात थे- जिला कलेक्टर एम.के. रंजीत सिंह और डिविजनल फॉरेस्ट ऑफिसर हेमेंद्र सिंह पवार. इन दोनों के प्रयासों से भारत में पहली बार किसी वन्यजीव अभयारण्य या संरक्षित क्षेत्र से गांवों को बाहर शिफ्ट किया गया.
सौंफ और रौंदा ये दो गांव सबसे पहले वन्य जीव संरक्षण क्षेत्र से बाहर निकाले गए. खास बात यह है कि यह काम बिना किसी भारी-भरकम पैसे वाली पुनर्वास योजना के तैयार करने की कोशिश की गई. यह कोशिश सिर्फ अधिकारियों के जरिए बनाए गए विश्वास के बल पर ही संभव हो पाया.
कान्हा के पूर्व फील्ड डायरेक्टर और मध्य प्रदेश के पूर्व पीसीसीएफ जे.एस. चौहान ने कहा, "आज जिस रूप में कान्हा टाइगर रिजर्व है, उसकी नींव और रूपरेखा स्वर्गीय हेमेंद्र सिंह पवार ने ही तैयार की थी.” कान्हा में पवार ने स्विस जीव वैज्ञानिक डॉ. क्लॉड मार्टिन के साथ मिलकर बारहसिंघा की घटती आबादी को बचाने का खास कार्यक्रम चलाया. बारहसिंघा मध्य प्रदेश का राज्य पशु है. 1930 के दशक में इनकी संख्या लगभग 3,000 थी, जो घटकर सिर्फ 60 रह गई थी और वे केवल कान्हा में ही बचे हुए थे.
डॉ. क्लॉड मार्टिन दो वर्ष कान्हा में रहे. उन्होंने घास के मैदानों को फिर से हरा-भरा करने की योजना बनाई, जिससे जानवरों की संख्या बढ़ाने में मदद मिली. आजकल मध्य प्रदेश में कान्हा के बारहसिंघा को सतपुड़ा नेशनल पार्क में भी स्थानांतरित किया जा चुका है.
1973 में प्रोजेक्ट टाइगर शुरू होने के बाद कान्हा भारत के पहले नौ बाघ अभयारण्यों में शामिल था. पवार ने कान्हा में रहते हुए सुपखार और मुक्की इलाकों को पार्क में जोड़ने का काम किया. साथ ही उन्होंने फेन अभ्यारण्य को ‘सैटेलाइट कोर क्षेत्र’ बनाया ताकि बाघों की बढ़ती आबादी को सुरक्षित जगह मिल सके.
प्रदेश के पूर्व मुख्य वन्यजीव संरक्षक एच.एस. पाबला ने कहा, “जब मैं नया अधिकारी था, तब मुझे कान्हा में दो महान व्यक्तियों स्वर्गीय एच.एस. पवार और ए.एस. परिहार के साथ काम करने का मौका मिला. उस समय जंगलों और वन्यजीवों पर जो खतरे मंडरा रहे थे, उसे आज सोचना भी मुश्किल है. इन्हीं अधिकारियों की दूरदृष्टि की वजह से ये जंगल और कई खास वन्य जीव आज भी बचे हुए हैं.”
पाबला के मुताबिक, वे राज्य के वन्यजीव स्थानांतरण कार्यक्रम के मुख्य आर्किटेक्ट भी थे. उन्हीं के ईजाद किए गए वैज्ञानिक तरीकों से कई जानवरों की प्रजातियों को ज्यादा संख्या वाले क्षेत्रों से कम संख्या वाले क्षेत्रों में शिफ्ट किया जाता है.
1981 में पवार दिल्ली आ गए और प्रोजेक्ट टाइगर के नेशनल डायरेक्टर बने. 1985 में उन्होंने वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (WII) के पहले डायरेक्टर के रूप में कार्यभार संभाला और 1994 तक वहां सेवा की. कम लोग जानते हैं कि WII का पद संभालने के लिए उन्हें 1985 में IFS से इस्तीफा देना पड़ा.
उन्होंने यह कदम पूरी खुशी से उठाया क्योंकि वन्यजीव संरक्षण उनके जीवन का सबसे बड़ा जुनून था. 2013 में उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया. वे अब तक के इकलौते IFS अधिकारी हैं जिन्हें यह तीसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान मिला है.