हुगली नदी के इतिहास से लोगों को कैसे जोड़ रहा है एक QR कोड!

पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिला प्रशासन की ‘गंगा ट्रेल्स’ नाम की यह पहल नदी तट को एक इंटरैक्टिव शिक्षण स्थल में बदलने की कोशिश है

सांकेतिक तस्वीर

पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना में हुगली नदी के किनारों को डिजिटल रूप दिया जा रहा है. नागरिकों को नदी के भूगोल, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व से जोड़ने की एक कोशिश के तहत जिला प्रशासन ने ‘गंगा ट्रेल्स’ नाम की QR-आधारित जन-जागरूकता पहल शुरू की है. 

इसका उद्देश्य नदी तट को एक इंटरैक्टिव शिक्षण स्थल में बदलना है. इस पहल के तहत नदी तट पर लगाए गए QR कोड स्कैन करके लोग अपने मोबाइल फोन पर स्थान विशेष से जुड़ी ऑडियो कहानियां सुन सकते हैं. इसके लिए किसी ऐप को डाउनलोड करने की जरूरत नहीं है. 

कहानी की इस रोचक शैली के जरिए परियोजना लोगों को यह समझाने की कोशिश करती है कि हुगली सिर्फ एक जलमार्ग नहीं बल्कि एक जीवंत पारिस्थितिकी तंत्र है. यह साझा विरासत का भंडार है और ऐसी धरोहर है जिसकी सामूहिक रूप से देखभाल की जानी चाहिए.

अधिकारियों का कहना है कि इस पहल को तकनीक, पर्यावरण शिक्षा और विरासत की जानकारी को जोड़कर तैयार किया गया है. इसका उद्देश्य सभी आयु वर्ग के लोगों के लिए सीखने की प्रक्रिया को आसान और रोचक बनाना है. इस डिजिटल ट्रेल को चार हिस्सों में बांटा गया है. हर हिस्सा नदी और क्षेत्र के संबंध के एक अलग पहलू को समझाता है.

हेरिटेज ट्रेल आगंतुकों को हुगली नदी तट के ऐतिहासिक विकास की यात्रा पर ले जाता है. इसमें गांधी घाट, लाट बागान, दुई पैसा घाट और धोबी घाट जैसे स्थलों को शामिल किया गया है. ऑडियो कहानियों के जरिए लोग नदी किनारे के विकास को समझ सकते हैं और जान सकते हैं कि इन स्थानों ने इलाके के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन को किस तरह आकार दिया.

‘फ्रीडम’ ट्रेल भारत की आजादी की लड़ाई में बैरकपुर की केंद्रीय भूमिका पर केंद्रित है. इसके जरिए लोग बैरकपुर छावनी, 1824 के सिपाही विद्रोह, मंगल पांडे की विरासत और 1857 के विद्रोह से पहले की घटनाओं से जुड़ी कहानियों को जान सकते हैं. इससे नदी तट को भारत के औपनिवेशिक शासन विरोधी आंदोलन की व्यापक कहानी से जोड़कर समझने में मदद मिलती है.

‘रिवर एंड इकोलॉजी’ ट्रेल प्रकृति पर ध्यान केंद्रित करतr है. ऑडियो कथाओं के माध्यम से आगंतुकों को हुगली की जलीय जैव विविधता से परिचित कराया जाता है. इसमें विभिन्न मछली प्रजातियां, पक्षी और संकटग्रस्त गंगा नदी डॉल्फिन शामिल हैं. यह ट्रेल प्रदूषण और आवास क्षरण जैसी चुनौतियों को भी सामने लाता है और संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाने का प्रयास करता है.

चौथा हिस्सा है-  कल्चर एंड कम्युनिटी ट्रेल. यह लोगों के दैनिक जीवन पर नदी के स्थाई प्रभाव को दिखाती है. इसमें पानीहाटी डांडा महोत्सव जैसी परंपराएं, तीर्थ मार्ग, नदी पर निर्भर आजीविकाएं और समुदायों की पहचान व सांस्कृतिक परंपराओं को आकार देने में हुगली की भूमिका को रेखांकित किया गया है.

जिला अधिकारियों का मानना है कि कहानी कहने और स्थान आधारित शिक्षा को जोड़कर यह पहल नागरिकों और नदी के बीच गहरा भावनात्मक संबंध बना सकती है. इसका उद्देश्य केवल जानकारी देना नहीं है. बल्कि लोगों को जिम्मेदार व्यवहार के लिए प्रेरित करना भी है. इसमें स्वच्छता बनाए रखना, प्लास्टिक कचरा कम करना, जैव विविधता की रक्षा करना और नदी संरक्षण के बारे में जागरूकता फैलाना शामिल है.

उत्तर 24 परगना की जिलाधिकारी शिल्पा गौरिसारिया ने कहा, "हम लोगों में गंगा के महत्व के प्रति जागरूकता बढ़ाना चाहते हैं. केंद्र सरकार की नमामि गंगे पहल के तहत हम ऐसे और काम करने तथा घाटों का सर्वांगीण विकास करने की योजना बना रहे हैं."

प्रशासन गंगा ट्रेल्स को केवल विश्व पर्यावरण दिवस (5 जून) की पहल के रूप में नहीं देखता. अधिकारियों का कहना है कि इस मॉडल को उत्तर 24 परगना और अन्य क्षेत्रों में आर्द्रभूमियों, जैव विविधता पार्कों, इको-टूरिज्म स्थलों, विरासत क्षेत्रों और शैक्षिक कार्यक्रमों में भी लागू किया जा सकता है.

एक परिचित सार्वजनिक स्थल को डिजिटल शिक्षण अनुभव में बदलकर गंगा ट्रेल्स यह दिखाता है कि तकनीक का उपयोग पर्यावरण जागरूकता और विरासत संरक्षण को लोगों की रोजमर्रा की भागीदारी का हिस्सा बनाने के लिए कैसे किया जा सकता है. इस तरह यह हुगली नदी तट को केवल गुजरने की जगह से बदलकर ऐसी जगह बनाना चाहता है, जहां लोग रुकें, सीखें और उस नदी से फिर जुड़ें जिसने सदियों से बंगाल के इतिहास को आकार दिया है.

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