यूपी में 2027 से पहले मुस्लिम राजनीति कैसी करवट ले रही?

नसीमुद्दीन सिद्दीकी के कांग्रेस छोड़ने, ओवैसी की बढ़ती सक्रियता और सपा में आज़म खान के बाद नेतृत्व के संकट के बीच यूपी में मुस्लिम राजनीति नए विकल्प तलाश रही है

यूपी के पूर्व मंत्री को धमकी भरा कॉल
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने 24 जनवरी को पार्टी से इस्तीफा दे दिया है

उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुसलमान हमेशा निर्णायक कारक रहे हैं, लेकिन पिछले एक दशक में उनकी राजनीतिक भूमिका लगातार बदलती और सिमटती दिखी है. 2017 के विधानसभा चुनावों के बाद से मुसलमान सत्ता के केंद्र से बाहर होते चले गए.

अब, जब 2027 का विधानसभा चुनाव धीरे-धीरे नजदीक आ रहा है, मुस्लिम राजनीति एक बार फिर राजनीतिक दलों के एजेंडे में लौटती दिख रही है. फर्क बस इतना है कि इस बार तस्वीर पहले से कहीं ज्यादा जटिल, बिखरी और अनिश्चित है.

नसीमुद्दीन सिद्दीकी का इस्तीफा : कांग्रेस के लिए झटका, संकेत कई

वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी का 24 जनवरी को कांग्रेस से इस्तीफा इसी बदलते परिदृश्य का बड़ा संकेत है. आठ साल कांग्रेस में रहने के बाद, 72 समर्थकों के साथ पार्टी छोड़ना सिर्फ संगठनात्मक असंतोष नहीं, बल्कि यूपी कांग्रेस में मुस्लिम नेतृत्व की सीमाओं को भी उजागर करता है. सिद्दीकी का यह कहना कि वे अपनी इच्छा के अनुसार काम नहीं कर पा रहे थे, कांग्रेस के भीतर उनको हाशिये पर धकेले जाने की भावना को दिखाता है. दिलचस्प यह है कि उन्होंने राहुल गांधी या प्रदेश अध्यक्ष अजय राय के खिलाफ कोई सीधी शिकायत नहीं की, लेकिन 20 जनवरी को राहुल गांधी से मुलाकात न हो पाना राजनीतिक संदेश जरूर देता है. 

कांग्रेस में मीडिया सेल के पूर्व चेयरमैन और पश्चिमी यूपी के क्षेत्रीय अध्यक्ष जैसे पदों के बावजूद, सिद्दीकी खुद को असरहीन महसूस कर रहे थे. उनका संभावित झुकाव आज़ाद समाज पार्टी (ASP) और चंद्रशेखर आज़ाद की ओर माना जा रहा है. अगर ऐसा होता है, तो यह सिर्फ पार्टी बदलना नहीं होगा, बल्कि मुस्लिम और दलित राजनीति के नए मेल की कोशिश भी होगी. 

हालांकि ASP नेतृत्व अभी औपचारिक तौर पर कुछ कहने से बच रहा है, लेकिन इतना साफ है कि सिद्दीकी जैसे नेता का कांग्रेस से जाना पार्टी के लिए संगठनात्मक और प्रतीकात्मक दोनों स्तरों पर नुकसान है. सहारनपुर के कांग्रेसी सांसद इमरान मसूद इस वक्त यूपी में पार्टी का सबसे बड़ा मुस्ल‍िम चेहरा हैं लेकिन पूरे प्रदेश में उनका प्रभाव होने का सवाल नकारात्मक ही आता है.
 
ओवैसी और AIMIM : स्थानीय से राज्य स्तर तक की महत्वाकांक्षा

इसी बीच, ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) की यूपी में बढ़ती सक्रियता ने राजनीतिक हलकों में हलचल बढ़ा दी है. बिहार में सीमित सफलता और महाराष्ट्र के नगर निगम चुनावों में बेहतर प्रदर्शन के बाद AIMIM यूपी में पंचायत और स्थानीय निकाय चुनावों पर फोकस कर रही है. असदुद्दीन ओवैसी खुलकर कह रहे हैं कि अभी विधानसभा चुनावों की बात करना जल्दबाजी है, लेकिन यह भी साफ है कि पार्टी इस बार पहले से ज्यादा सीटों पर लड़ने की तैयारी में है. राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि AIMIM स्थानीय निकाय चुनावों में मुस्लिम मतदाताओं के लिए एक अच्छा विकल्प बनी हुई है, लेकिन UP विधानसभा और लोकसभा चुनावों में पार्टी अभी तक अपना खाता नहीं खोल पाई है. 

2017 के UP स्थानीय निकाय चुनावों में, AIMIM ने 78 उम्मीदवार उतारे थे और 29 सीटें जीती थीं, जिनमें फ़िरोज़ाबाद में सबसे ज़्यादा 11 सीटें और मुस्लिम बहुल आज़मगढ़ में 3 सीटें शामिल थीं, जो SP का गढ है. 2022 के UP विधानसभा चुनावों में, AIMIM ने 100 ज़्यादातर मुस्लिम बहुल सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे लेकिन सिर्फ़ 0.43 फीसदी वोट हासिल किए. इससे पहले, 2017 के विधानसभा चुनावों में, पार्टी ने 38 सीटों पर चुनाव लड़ा था, जिनमें से 37 सीटों पर उसकी ज़मानत ज़ब्त हो गई थी. 

राज्य में 2023 के स्थानीय निकाय चुनावों में, AIMIM ने पांच नगर पालिका परिषद सीटें और नगर निगम में 75 पार्षद जीते थे. सपा के भीतर भी AIMIM को लेकर चर्चा शुरू हो चुकी है. अखिलेश यादव द्वारा हाल में बुलाई गई सांसदों की बैठक में पार्टी की संभावित भूमिका पर बात होना बताता है कि सपा अब ओवैसी फैक्टर को गंभीरता से देख रही है. हालांकि आधिकारिक बयान यही है कि 2027 के लिए गठबंधन की बात अभी जल्द है, लेकिन पर्दे के पीछे समीकरणों पर नजर रखी जा रही है.

आज़म खान के बाद सपा की चुनौती 

समाजवादी पार्टी लंबे समय तक यूपी में मुस्लिम राजनीति का सबसे बड़ा केंद्र रही है. आज़म खान इसके सबसे बड़े चेहरा थे. रामपुर से लेकर लखनऊ तक, उनकी पकड़ ने सपा को मुस्लिम वोटों का स्वाभाविक ठिकाना बना दिया था. लेकिन आज़म खान के जेल जाने के बाद सपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह मुस्लिम समाज को कौन सा चेहरा दे. 

2022 के विधानसभा चुनावों में सपा के 34 मुस्लिम विधायक जीते, जो 2017 के मुकाबले सुधार था. लेकिन इनमें से कोई भी नेता आज़म खान जैसी व्यापक स्वीकार्यता और आक्रामक राजनीतिक शैली का प्रतिनिधित्व नहीं करता. नतीजा यह है कि मुस्लिम वोट सपा के साथ तो है, लेकिन नेतृत्व के स्तर पर एक खालीपन साफ दिखता है. संभल विवाद, प्रशासनिक कार्रवाइयों और कानून-व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर सपा को मुस्लिम समाज के बीच लगातार सक्रिय रहना पड़ा है. फिर भी, यह सवाल बना हुआ है कि क्या सपा सिर्फ “कम नुकसान” का विकल्प बनकर रह जाएगी, या मुस्लिम राजनीति को कोई नई दिशा दे पाएगी.

BJP की दोहरी रणनीति : कार्रवाई भी, पसमांदा भी

राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि BJP सरकार की नीतियों और कार्रवाइयों ने मुस्लिम समाज के भीतर असंतोष को जन्म दिया है. मदरसों पर कार्रवाई, धार्मिक स्थलों और आयोजनों को लेकर प्रशासनिक सख्ती, और संभल जैसे मामलों में पुलिस-प्रशासन की भूमिका को लेकर नाराजगी खुलकर सामने आई है. यह असंतोष विपक्षी दलों के लिए अवसर भी है. लेकिन BJP ने भी इस असंतोष को अनदेखा नहीं किया है. पसमांदा मुसलमानों को लेकर पार्टी की सक्रियता इसी रणनीति का हिस्सा है. सम्मेलन, संवाद और योजनाओं के जरिए यह संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि BJP मुस्लिम समाज को एकरूप नहीं, बल्कि वर्गों में देखती है. 

पसमांदा मुसलमानों को सामाजिक न्याय के विमर्श से जोड़ना BJP के लिए नया नहीं, लेकिन अब इसे ज्यादा आक्रामक ढंग से आगे बढ़ाया जा रहा है. यह रणनीति मुस्लिम वोटों में सीधी सेंधमारी से ज्यादा, विपक्षी एकजुटता को कमजोर करने की कोशिश के रूप में देखी जा रही है. अगर मुस्लिम समाज के भीतर विभाजन गहरा होता है, तो उसका फायदा आखिरकार BJP को मिल सकता है.

पुरानी जमीन की तलाश में BSP

बहुजन समाज पार्टी (BSP), जिसने कभी दलित-मुस्लिम समीकरण के दम पर सत्ता हासिल की थी, अब उसी जमीन को फिर से तलाशने में जुटी है. मायावती द्वारा मुस्लिम नेताओं के साथ बैठक और समर्थन की अपील इसी दिशा में उठाया गया कदम है. हालांकि BSP की संगठनात्मक ताकत पहले जैसी नहीं रही, लेकिन पार्टी नेतृत्व मानता है कि मुस्लिम वोटों के बिना यूपी में कोई बड़ा राजनीतिक पुनरुत्थान संभव नहीं. नसीमुद्दीन सिद्दीकी जैसे नेताओं का BSP से कांग्रेस और अब संभावित रूप से किसी नए मंच की ओर जाना, यह दिखाता है कि BSP मुस्लिम नेतृत्व को बनाए रखने में पहले ही कमजोर पड़ चुकी है. इसके बावजूद, मायावती मुस्लिम समाज में अपनी पुरानी विश्वसनीयता को फिर से जगाने की कोशिश कर रही हैं.

प्रभावी मुस्लिम नेतृत्व का अभाव और नया राजनीतिक माहौल

राजनीतिक विश्लेषक अजीजुल हलीम बताते हैं, “यूपी की मौजूदा राजनीति की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि मुस्लिम समाज के पास कोई सर्वमान्य, प्रभावी और राज्यव्यापी नेता नहीं है. आज़म खान जेल में हैं, सपा के पास पूरे प्रदेश में प्रभावी सर्वमान्य मुस्ल‍िम नेता नहीं है, नसीमुद्दीन सिद्दीकी नई राह तलाश रहे हैं, AIMIM अभी भी सीमित प्रभाव वाली ताकत है, और कांग्रेस व BSP अपने-अपने संकटों से जूझ रही हैं.” इस शून्य ने मुस्लिम राजनीति को व्यक्तियों से हटाकर मुद्दों की ओर मोड़ दिया है. शिक्षा, रोजगार, सुरक्षा, धार्मिक स्वतंत्रता और प्रशासनिक निष्पक्षता जैसे सवाल अब ज्यादा अहम हो रहे हैं. राजनीतिक दल इन्हीं मुद्दों के जरिए मुस्लिम वोटों को साधने की कोशिश कर रहे हैं.

ऐसे में 2027 का विधानसभा चुनाव यूपी की मुस्लिम राजनीति के लिए सिर्फ एक और चुनाव नहीं होगा, बल्कि यह तय करेगा कि मुसलमान एकजुट राजनीतिक ताकत के रूप में उभरेंगे या अलग-अलग विकल्पों में बंटे रहेंगे. 

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