बिहार : जाति-धर्म की राजनीति से दूरी का दावा करने वाले प्रशांत किशोर क्या अब उसी रास्ते जा रहे हैं?
कभी जाति-धर्म छोड़कर बच्चों के भविष्य के नाम पर लोगों को वोट देने के लिए प्रेरित करने वाले प्रशांत किशोर पिछले कुछ दिनों से जाति और धर्म का समीकरण जुटाते दिख रहे हैं. आखिर क्या है इसकी वजह...

प्रशांत किशोर, संस्थापक - जन सुराज
"आंकड़े सबके सामने हैं. सबसे गरीब, सबसे पिछड़ा, जो भाई सबसे पीछे छूट गया है...वे दलित समाज के लोग हैं. दूसरा जो अति पिछड़ा समाज है...आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक तरीके से करीब-करीब दलितों के बराबर ही उसकी स्थिति है. और तीसरे, जो मुस्लिम समाज के लोग हैं, वो भी...सच्चर कमिटी की रिपोर्ट से नहीं कह रहा, गांव-गांव जाकर देखा है, दलितों के बाद अगर सबसे ज्यादा गरीब और बदहाल कोई दिखा तो वे मुसलमान भाई दिखे."
प्रशांत किशोर ये बातें 28 जुलाई, 2024 को पटना के बापू सभागार में कह रहे थे. मौका था जनसुराज अभियान को एक राजनीतिक दल का रूप देने से पहले आयोजित राज्य स्तरीय बैठक का, जिसमें अभियान से जुड़े पूरे बिहार के हजारों लोग जुटे थे. उस बैठक में उन्होंने अपने समर्थकों की राय लेते हुए तय किया कि उनकी पार्टी का पहला अध्यक्ष दलित समाज का कोई काबिल व्यक्ति होगा, दूसरा अति पिछड़ा समाज का और तीसरा मुस्लिम संप्रदाय से जुड़ा कोई व्यक्ति. पिछड़ा और सवर्ण समाज के लोगों का नंबर इसके बाद आएगा.
इस टिप्पणी और जनसुराज अभियान के इस फैसले के बाद राजनीतिक टिप्पणीकारों ने इसे DEM समीकरण का नाम दिया, और कहा कि प्रशांत किशोर भले ही सबकी राजनीति का नाम ले रहे, मगर उनका फोकस डी से दलित, ई से ईबीसी यानी अति पिछड़ा और एम से मुस्लिम समाज पर होगा.
जाति आधारित गणना के लिहाज से इन तीनों समूहों की आबादी क्रमशः 19.65, 36.01 और 17.70 फीसद है. इसके बाद सिर्फ 11 फीसदी के करीब सवर्ण हिंदू और 25 फीसदी के करीब पिछड़े हिंदू ही रह जाते हैं.
यह प्रशांत किशोर का बदला हुआ रूप है. उन्होंने दो अक्तूबर, 2024 को अपनी पार्टी की स्थापना की घोषणा की है. जैसे-जैसे यह तारीख नजदीक आती जा रही है, उनका फोकस जाति, धर्म और लिंग से जुड़े समूहों पर बढ़ रहा है. इसे लेकर वे लगातार बैठकें और घोषणाएं कर रहे हैं. जरा इनकी बानगी देखें...
13 जुलाई, 2024 को प्रशांत किशोर ने घोषणा की कि उनकी पार्टी हर जिले में कम से कम एक महिला को विधानसभा में टिकट देगी, और न्यूनतम 40 महिला उम्मीदवार चुनाव में उतारेगी. उन्होंने कहा कि आज तक बिहार में किसी पार्टी ने 30 से अधिक महिलाओं को टिकट नहीं दिया है.
14 जुलाई, 2024 को उन्होंने पटना के हज भवन में मुसलमानों के एक समारोह में शिरकत की जिस समारोह का नाम 'बिहार का सियासी मंजरनामा और मुसलमान' था. इस समारोह में उन्होंने कहा, "बिहार के मुसलमान लालटेन में तेल बनकर जल रहे हैं, जबकि रोशनी कहीं और हो रही."
इसके बाद मोनाजिर हसन समेत कई मुसलमान नेता राजद छोड़कर जनसुराज के साथ आए. इससे परेशान राजद के प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह को चिट्ठी जारी करनी पड़ी. प्रशांत के अभियान से कर्पूरी ठाकुर की पोती डॉ. जागृति और राजद से हाल ही में अलग हुए अति पिछड़ों के नेता रामबली चंद्रवंशी जुड़े. इन दोनों के अभियान में शामिल होने को उन्होंने ठीक से प्रचारित कराया.
प्रशांत किशोर ने जनसुराज पदयात्रा की शुरुआत दो अक्तूबर, 2022 को की थी. इसके एक साल पूरे होने पर जब इंडिया टुडे की टीम उनकी पद यात्रा को कवर करने मुजफ्फरपुर जिले के महना टाडा गांव में गई थी, तो वहां मौजूद ग्रामीणों की भीड़ से वे कह रहे थे, "आपने जात के नाम पर वोट दिया, धर्म के नाम पर वोट दिया, मगर कभी अपने बच्चों के भविष्य के नाम पर वोट नहीं दिया. जिस रोज आप अपने बच्चों के नाम पर वोट देना सीख जाएंगे, इस देश की राजनीति भी ठीक हो जाएगी, बिहार भी बदलने लगेगा और आपका भी भविष्य संवरेगा." ऐसा वे अपनी हर जनसभा में कहते रहे.
जनवरी, 2024 से पहले उन्होंने कभी अपने किसी सार्वजनिक संबोधन में जाति के आधार पर राजनीति करने के संकेत नहीं दिये. 20 जनवरी, 2024 को उन्होंने कर्पूरी ठाकुर जयंती के मौके पर बापू सभागार में आयोजित जनसुराज अभियान के समारोह में सार्वजनिक घोषणा की कि उनकी पार्टी राज्य में 75 सीटों पर अति पिछड़ा समाज के लोगों को टिकट देगी. उसके बाद से उनका जाति, धर्म और लिंग आधारित अस्मिताओं की राजनीति की तरफ झुकाव बढ़ता जा रहा है.
इस मसले को खोलते हुए राजनीतिक विश्लेषक रमाकांत चंदन कहते हैं, "प्रशांत किशोर का आगाज तो बढ़िया था, मगर अंजाम तक आते-आते वे भी समीकरण वाली पार्टी तैयार करने लगे हैं. संभवतः बिहार में घूमते हुए उन्हें यह जमीनी हकीकत समझ में आने लगी है कि जाति-धर्म के बिना वे छोटी-मोटी सफलता तो हासिल कर सकते हैं, धमाकेदार सफलता चाहिए तो यहां जाति समीकरण बनाना ही होगा. इसलिए वे दलित, अति पिछड़ा और मुसलमानों का समीकरण बना रहे हैं. वे पहले भी दूसरी पार्टियों के लिए जातीय समीकरण तैयार करते रहे हैं. वे आंकड़ों के खिलाड़ी हैं, इसलिए यह उनके लिए कोई नयी बात नहीं है. मगर सवाल बिहार की जनता का है, जो उनमें नई राजनीति की संभावना देख रही थी, अब वे भी अगर जात-धर्म की राजनीति कर रहे तो वो दूसरों से अलग कैसे."
वरिष्ठ पत्रकार हेमंत जनसुराज अभियान के दलित प्रेम को दिखावा करार देते हैं. वे कहते हैं, "प्रशांत किशोर के अभियान से शुरुआत में सवर्ण और हिंदुवादी लोग जुड़े, दलित और पिछड़े इनके लिए फुट सोल्जर सरीखे ही रहे. मगर अब चुनाव के वक्त वे दलितों से प्रेम दिखा रहे हैं. अति पिछड़ों और मुसलमानों के समर्थक दिख रहे हैं. यह उसी तरह का दिखावा है, जैसा दिखावा बीजेपी दलितों और अदिवासियों को प्रतिनिधित्व देने के नाम पर करती है."
हालांकि कुछ विश्लेषक उनकी इस राजनीति में किसी तरह की बुराई का अंश नहीं पाते. बहुजनों की पत्रिका सबाल्टर्न के संपादक महेंद्र सुमन कहते हैं, "प्रशांत किशोर जातीय अस्मिता की राजनीति कर रहे यह कहना गलत होगा. दरअसल वे कांशीराम के उस विचार को आगे ले जाने की कोशिश कर रहे, जिसमें उन्होंने कहा था, जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी भागीदारी. वे तो यही कह रहे हैं कि जिस समाज की जितनी भागीदारी है, वे उसे उसी अनुरूप में टिकट देंगे. बिहार में सामाजिक राजनीति करने वाले दल कभी इस विचार को ठीक से लागू नहीं कर पाए. प्रशांत किशोर अगर ऐसा करने का प्रयास कर रहे तो बुरा क्या है."
मगर टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज, पटना के पूर्व निदेशक पुष्पेंद्र इसे इतना सहज नहीं मानते. वे कहते हैं, "हमें यह समझना होगा कि प्रशांत किशोर राजनीति के ऐसे खिलाड़ी हैं जो देश के अलग-अलग और कई दफा परस्पर विरोधी विचारधारा वाले दलों को सेवाएं देते रहे हैं. उन्हें चुनावी जीत के लिए विचारधारा का इस्तेमाल करना आता है. वे आज धर्मनिरपेक्ष बयान लिख सकते हैं, तो कल दंगा भड़काऊ और परसों मिसोजेनिस्ट बयान भी जारी करना जानते हैं."
वे आगे कहते हैं, "उनकी राजनीतिक विचारधारा बहुत साफ नहीं है इसलिए अगर वे दलितों, अति पिछड़ों और मुसलमानों को आगे बढ़ाने की बात कर रहे, महिलाओं को प्रतिनिधित्व का वादा कर रहे तो यह उनकी वैचारिकी है या चुनावी गणित यह देखने की बात होगी. मेरे हिसाब से तो वे बिहार के उन समाजों के बीच घुसपैठ करने की कोशिश कर रहे, जहां अभी विरोधाभास की स्थिति है. और उनके इस कदम का सबसे अधिक नुकसान राजद, कांग्रेस और वामदलों को होगा, कुछ हद तक जदयू को भी नुकसान झेलना पड़ेगा."
हालांकि प्रशांत किशोर इन आरोपों का खंडन करते हुए कहते हैं, "बिहार के लोगों के बीच चर्चा है कि जिसकी जितनी संख्या है उस हिसाब से भागीदारी दी जाएगी. तो इस हिसाब से दूसरे दलों और प्रशांत किशोर में फर्क क्या है? फर्क ये है कि जन सुराज का मानना है कि हर समाज में काबिल लोग हैं और हर काबिल आदमी किसी न किसी समाज का है. अगर बांटने वाले की नीयत में खोट न हो तो ये व्यवस्था, ये सामंजस्य बनाया जा सकता है. जिसकी जितनी संख्या है उसमें से उतने काबिल लोगों को मंच पर बैठाया जाए यही जन सुराज की परिकल्पना है."
प्रशांत आगे समझाते हुए बताते हैं, "किसी भी समाज से आने वाले लोगों की संख्या से ज्यादा न कम हिस्सेदारी मिले यह जन सुराज की पहली प्राथमिकता होगी. आप अपना हक लीजिए, दूसरे की मत मारिए. बिहार में आकर कुछ लोग हमें कहते हैं कि यादव जी लोग हमें वोट नहीं देंगे. वोट दें या न दें अगर समाज में 15 फीसद लोग यादव समाज के हैं तो ये जन सुराज की जिम्मेदारी है कि इसको बनाने वालों में, इसके पदाधिकारियों में, इसको चलाने वालों में, इसके टिकट में फीसद यादव समाज की भागीदारी भी होनी चाहिए. इस भावना को हम सबको आत्मसात करना होगा."