गुजरात में बढ़ती बाबूशाही भूपेंद्र पटेल सरकार के लिए कैसे बन रही मुसीबत?

गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल से कई विधायकों ने अधिकारियों के व्यवहार को लेकर शिकायत की है

गुजरात के CM भूपेंद्र पटेल (File Photo: ITG)
गुजरात के CM भूपेंद्र पटेल (File Photo: ITG)

गुजरात में विधायकों और अधिकारियों के बीच का टकराव अब खुलकर सामने आ गया है. वडोदरा जिले के पांच BJP विधायकों ने स्थानीय अधिकारियों के खिलाफ गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल को पत्र लिखा है.

इसके अलावा, ये सभी विधायक खुलकर मीडिया के सामने आकर अधिकारियों की आलोचना कर रहे हैं. विधायकों ने जिला कलेक्टर समेत कई बड़े अधिकारियों पर मनमानी करने और जमीनी हकीकतों को छिपाने का आरोप लगाया है.

विधायकों का कहना है कि ये नौकरशाह आम नागरिकों और निर्वाचित प्रतिनिधियों दोनों को दरकिनार कर रहे हैं. गांधीनगर में मुख्यमंत्री के निजी सचिव को सौंपे गए पत्र में कलेक्टर, उप जिला विकास अधिकारी, पुलिस आयुक्त, पुलिस अधीक्षक जैसे अधिकारियों के खिलाफ शिकायत की गई है.

इस पत्र के मुताबिक, अधिकारी सीएम मुख्यालय और सचिवों के लिए अच्छी रिपोर्ट तैयार कर भेज देते हैं, जबकि जमीनी हकीकत कुछ और होती है. अधिकारियों का यह व्यवहार शासन को कमजोर करता है और BJP सरकार की छवि को भी नुकसान पहुंचाता है.

पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले पांच विधायकों में शैलेश मेहता (डभोई विधानसभा), केतन इनामदार (सावली विधानसभा), धर्मेंद्र सिंह वाघेला (वाघोड़िया विधानसभा), अक्षय पटेल (करजन विधानसभा) और चैतन्यसिंह ज़ाला (पादरा विधानसभा) हैं. उनका तर्क है कि कुछ अधिकारी निर्वाचित प्रतिनिधियों और आम लोगों के साथ अपमानभरा व्यवहार करते हैं.

इसके कारण इन अधिकारियों के साथ काम करना मुश्किल हो गया है. अधिकारी सटीक और समस्याओं से जुड़ी जानकारी के बजाय मनगढ़ंत बातों को उच्च अधिकारियों तक पहुंचाते हैं.

उनका यह भी दावा है कि बार-बार की गई स्थानीय समन्वय बैठकों और आपसी बातचीत में इस बात का जिक्र करने के बावजूद, उनके व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आया है. वडोदरा के सांसद हेमांग जोशी ने कहा कि विधायकों की चिंताओं पर गौर किया जाएगा, लेकिन उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि प्रशासनिक उदासीनता की इस समस्या से कैसे निपटा जाएगा.

मुख्यमंत्री ने विधायकों की शिकायतों पर औपचारिक रूप से कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन सूत्रों के मुताबिक पत्र में उठाए गए मुद्दों को मुख्यमंत्री कार्यालय ने गंभीरता से लिया है. इस पत्र में प्रशासनिक उत्तरदायित्व की कमी, काम-काज के तौर तरीके में अस्पष्टता, फैसला लेने में मनमानी और लोकतांत्रिक मूल्यों में कमी का आरोप अधिकारियों पर लगाया गया है.  

विधायकों का कहना है कि इसका व्यापक असर BJP कार्यकर्ताओं के मनोबल पर पड़ता है. इसके कारण संगठन में स्पष्ट रूप से आंतरिक तनाव दिख रहा है. यही वजह है कि सांसदों को अपने मुख्यमंत्री से अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने का सार्वजनिक रूप से आह्वान करना पड़ रहा है.

पिछले तीन दशकों से गुजरात में BJP सत्ता में है. धीरे-धीरे पिछले 20 वर्षों में सभी नगर निगमों और लगभग 90 फीसद नगर पालिकाओं और जिला एवं तालुका पंचायतों में इस पार्टी का शासन रहा है. यह पत्र-व्यवहार एक उभरते हुए पैटर्न का हिस्सा है. 

पिछले साल विरामगाम के विधायक हार्दिक पटेल ने अपने निर्वाचन क्षेत्र में जल निकासी की लगातार समस्या को लेकर मुख्यमंत्री को पत्र लिखा था. इस पत्र में उन्होंने आंदोलन की चेतावनी दी थी और साथ ही यह बताने की कोशिश की थी कि वे खुद प्रशासनिक बाधाओं का सामना कर रहे हैं.

BJP के वरिष्ठ नेता और भरूच सांसद मनसुख वसावा ने भी अधिकारियों के खिलाफ सार्वजनिक रूप से शिकायत की है. 2025 में उन्होंने एक आदिवासी व्यक्ति का आत्महत्या नोट अपलोड किया था, जिसकी मौत कथित तौर पर पुलिस उत्पीड़न से जुड़ी थी.

गुजरात में विधानसभा चुनाव दिसंबर 2027 में होने हैं, लेकिन 17 नगर निगमों में से 16 के चुनाव इस फरवरी-मार्च में होने की संभावना है. तीन दशकों तक सत्ता में रहने के बाद BJP को भारी जनविरोधी लहर का सामना करना पड़ रहा है. नदी के पुलों और शहर के फ्लाईओवरों के ढहने या बारिश या भीषण जलभराव के कारण सड़कों और राजमार्गों के खराब होने जैसी जर्जर बुनियादी ढांचे की समस्याओं के लिए प्रशासनिक उदासीनता को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है.

सबसे हालिया पुल दुर्घटना जुलाई 2025 में वडोदरा के बाहरी इलाके पादरा में महिसागर नदी पर हुई थी. इस दुर्घटना में बाईस लोगों की मौत हो गई थी. पुल की मरम्मत को लेकर पिछले पांच वर्षों में कई शिकायतें की गई थीं, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई.

कुछ BJP सांसदों ने गुप्त बातचीत में बताया है कि पार्टी का हाई कमान निर्वाचित प्रतिनिधियों की बजाय नौकरशाही के माध्यम से अधिक शासन करता है, जिससे अधिकारियों के पास शक्ति तो है, लेकिन समस्या ये है कि व्यावहारिक रूप से उनकी जवाबदेही खत्म हो जाती है. इसलिए काम-काज को लेकर वे उतना जवाबदेह नहीं होते.

एक विधायक ने कहा, “प्रशासनिक अधिकारी शोक संतप्त नागरिकों के प्रति जवाबदेह नहीं हैं और न ही उन्हें वोट मांगने की जरूरत है. इसके अलावा, किसी घातक दुर्घटना जैसी गंभीर स्थिति में दोषी अधिकारी पर लगभग कभी मुकदमा नहीं चलाया जाता. केवल जांच के नतीजे आने तक उसे निलंबित कर दिया जाता है, जिसमें दशकों लग सकते हैं.”

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