बीमारी, इंसानी दखल और उद्योग; गिर के शेरों के सामने तिहरा संकट!
मई के आखिर से अब तक संक्रमण के कारण कम से कम 13 एशियाई शेरों की मौत हो चुकी है. इनमें 10 शावक भी शामिल हैं

पिछले कुछ हफ्ते गुजरात के एशियाई शेरों के लिए बेहद उथल-पुथल भरे रहे हैं. रहस्यमय मौतों का एक सिलसिला, इंसानों के साथ बढ़ते संघर्ष और शेरों के आवास वाले इलाके में औद्योगिक परियोजनाओं के खिलाफ फिर से शुरू हुए विरोध ने सौराष्ट्र प्रायद्वीप में दुनिया में बची इस प्रजाति की एकमात्र जंगली आबादी के भविष्य को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.
सबसे बड़ी चिंता गिर के पूरे इलाके से सामने आई शेरों की असामान्य मौतें हैं. मई के आखिर से लगभग 10 दिनों के भीतर गिर सोमनाथ और अमरेली जिलों में कम से कम 13 शेरों, जिनमें 10 शावक भी शामिल हैं, की मौत बेबेसियोसिस और कैनाइन डिस्टेंपर वायरस के कारण हुई.
वायरस और मौतों को लेकर यह स्थानीय लोगों का दावा है हालांकि वन विभाग इससे सहमत नहीं है. विभाग ने केवल आठ मौतों की पुष्टि की है और उनकी वजह 'मौसमी बीमारी' बताई है. इस घटना ने 2018 में फैले सीडीवी संक्रमण की यादें ताजा कर दी हैं जिसमें 20 से ज्यादा शेर मारे गए थे.
बेबेसियोसिस एक परजीवी बीमारी है जो किलनियों (ticks) के जरिए फैलती है. कुछ रिपोर्टों में वायरल संक्रमण की आशंका भी जताई गई है. मुख्य वन्यजीव संरक्षक जयपाल सिंह ने कहा कि गुजरात बायोटेक्नोलॉजी रिसर्च सेंटर समेत विभिन्न प्रयोगशालाओं में भेजे गए नमूनों की जांच में पता चला है कि ‘कुछ’ मौतें बेबेसियोसिस के कारण हुईं जबकि कुछ की मौत निमोनिया से पैदा हुई जटिलताओं के कारण हुई.
इस बीच अमरेली जिले की जाफराबाद तहसील में एक अन्य शेर की मौत रेबीज से हुई. इससे एशियाई शेरों के सामने मौजूद खतरे का एक नया पहलू सामने आया है. जाफराबाद का यह रेबीज संक्रमित शेर असामान्य रूप से आक्रामक हो गया था. बताया गया कि उसने एक ऑटो रिक्शा का पीछा किया. इसके बाद अधिकारियों को सड़क बंद करनी पड़ी और उसे पकड़ने व बचाने के लिए अभियान चलाना पड़ा.
शेर को बेहोश किए जाने से पहले ही उसकी मौत हो गई. बाद में पशु चिकित्सकीय जांच में रेबीज की पुष्टि हुई. इससे बीमारी के फैलने, इंसान-शेर संघर्ष बढ़ने और गिर में वन्यजीवों के स्वास्थ्य की निगरानी को लेकर चिंता बढ़ गई है.
सिंह ने कहा कि किसी शेर में रेबीज होना बहुत दुर्लभ है. लेकिन क्षेत्र के प्रकृतिविदों का कहना है कि पिछले एक साल में कम से कम तीन ऐसी घटनाएं हुईं जिनमें शेर अचानक आक्रामक हो गए और स्थानीय लोगों पर हमला कर दिया. ऐसे शेरों को वन विभाग पकड़ लेता था लेकिन इसकी वजह कभी सार्वजनिक नहीं की जाती थी. इसलिए उनका मानना है कि इस आक्रामक व्यवहार की वजह रेबीज रही होगी.
2025 की शेर गणना के अनुसार गुजरात में एशियाई शेरों की संख्या 2020 के 674 से बढ़कर 2025 में 891 हो गई. यानी पांच साल में 32 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई. अमरेली जिले में सबसे ज्यादा शेर दर्ज किए गए. यहां उनकी संख्या 2020 के 339 से बढ़कर 2025 में 406 हो गई जो लगभग 20 प्रतिशत की वृद्धि है. इससे अमरेली गिर क्षेत्र में सबसे अधिक शेरों वाला जिला बन गया है. खेती की जमीन, शहर और औद्योगिक इकाइयां अब शेरों के आवास से लगभग जुड़ चुकी हैं. ऐसे में ये बड़े मांसाहारी जानवर व्यवहारिक रूप से इंसानों के साथ ही रह रहे हैं.
ज्यादातर शेर आसानी से मिलने वाले शिकार पर निर्भर हैं. इनमें खेतों में पाले जाने वाले पशु, मरे हुए मवेशी या डेयरी किसान गांवों के बाहरी इलाकों में फेंकने वाले पशुओं के शव शामिल हैं. क्षेत्र के एक वन्यजीव विशेषज्ञ ने कहा, "शेरों का भोजन अक्सर स्थानीय कुत्तों के साथ साझा होता है. जाफराबाद क्षेत्र में प्राकृतिक शिकार लगभग नहीं के बराबर है. इसलिए यहां के शेर लगभग पूरी तरह मवेशियों पर निर्भर हैं."
वन्यजीव जीवविज्ञानी और बड़ी बिल्लियों के विशेषज्ञ रवि चेल्लम कहते हैं, "शेरों में रेबीज मिलना किसी को हैरान नहीं करना चाहिए. इंसानों के प्रभुत्व वाले इलाकों में रहने वाले शेर लगातार पालतू और आवारा जानवरों के संपर्क में रहते हैं. यह सब जानते हैं कि शेर लोगों द्वारा फेंके गए पालतू जानवरों के शव खाते हैं. कई पालतू जानवर, खासकर कुत्ते, भी इन्हीं शवों को खाते हैं. इससे शेरों में बीमारी फैलने का बहुत बड़ा खतरा पैदा होता है. यह एक टिक-टिक करता टाइम बम है."