गुजरात सरकार में मंत्री के बेटों ने कैसे हड़पे मनरेगा के करोड़ों रुपए?
गुजरात का यह घोटाला राज्य की BJP सरकार के साथ-साथ केंद्र सरकार को भी सवालों के घेरे में ला देता है, जो भ्रष्टाचार के मामले में पश्चिम बंगाल जैसे विपक्षी राज्यों को कार्रवाई की धमकी देती है

गुजरात के दाहोद जिले में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के तहत 71 करोड़ रुपए के भ्रष्टाचार का मामला सामने आया है. इस गबन के मामले में पुलिस ने पंचायत एवं कृषि राज्य मंत्री बच्चूभाई खाबड़ के बेटे को गिरफ्तार किया है.
जनवरी 2021 से दिसंबर 2024 तक आदिवासी बहुल इलाके देवगढ़ बारिया और धनपुर के लिए यह पैसा मनरेगा फंड से आवंटित किया गया था. लेकिन, व्यवस्थागत कमजोरियों के कारण यह पैसा भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया.
भ्रष्टाचार की इस घटना के कारण देश में बेहतरीन प्रशासनिक मॉडल के रूप में लंबे समय से पहचाने जा रहे गुजरात में सरकार की जवाबदेही को लेकर सवाल उठने लगे हैं.
मध्य प्रदेश की सीमा से सटा यह पिछड़ा क्षेत्र दाहोद अपनी आदिवासी आबादी के रोजगार के लिए पूरी तरह से मनरेगा पर निर्भर है. यहां से बड़ी संख्या में लोग सीमित स्थानीय अवसरों के कारण दिहाड़ी मजदूरी के लिए पलायन करके शहर की ओर जाते हैं.
सरकारी ऑडिट और स्थानीय लोगों की शिकायतों के जरिए उजागर हुआ यह घोटाला इस बात पर ध्यान दिलाता है कि कैसे धोखाधड़ी के इन तौर-तरीकों ने राज्य के सबसे गरीब समुदाय की आजीविका को कमजोर कर दिया है. साथ ही इस घटना ने भ्रष्टाचार में शामिल सरकारी अधिकारियों और राजनीतिक रूप से जुड़े व्यक्तियों की मिलीभगत को उजागर किया है.
इस घोटाले में फर्जी परियोजनाओं को दिखाने के लिए गलत दस्तावेज बनाए गए थे. इतना ही नहीं अवैध कंपनियों के खाते में पैसे ट्रांसफर हुए.
इस मामले की जानकारी देते हुए पुलिस अधिकारियों ने बताया है कि इस भ्रष्टाचार की घटना में मुख्य आरोपी बलवंत खाबड़ और किरण खाबड़ हैं. ये दोनों गुजरात सरकार में मंत्री बच्चूभाई खबाड़ के बड़े और छोटे बेटे हैं.
बलवंत खाबड़ पर आरोप है कि उसने अपने भाई के साथ मिलकर कथित तौर पर अपनी दो कंपनियों ‘श्री राज कंस्ट्रक्शन कंपनी’ और ‘श्री राज ट्रेडर्स’ के माध्यम से धोखाधड़ी की घटना को अंजाम दिया.
इन संस्थाओं ने कथित तौर पर अनिवार्य बोली प्रक्रियाओं में भाग लिए बिना भुगतान प्राप्त किया था. मनरेगा फंड से श्री राज ट्रेडर्स के लिए 30.04 करोड़ रुपए और श्री राज कंस्ट्रक्शन कंपनी के लिए 82 लाख रुपए भेजे गए थे, जो गबन किए गए कुल धन का करीब 40 फीसद से अधिक है.
जानकारी के मुताबिक, अप्रैल 2025 में दाहोद में जिला ग्रामीण विकास एजेंसी (DRDA) के निदेशक बीएम पटेल के नेतृत्व में ऑडिट और फील्ड निरीक्षण की प्रक्रिया शुरू हुई. इसी दौरान धोखाधड़ी का पता चला है.
जांच में पता चला कि कुवा, रेधाना और सिमामोई जैसे गांवों में सड़कें, चेक वॉल और पत्थर के बांध जैसी परियोजनाओं के लिए पैसा आवंटित किया गया है. इन योजनाओं को पूरा होने की बात कहकर पैसा भी निकाल लिया गया, जबकि इन गांवों में वो योजनाएं या तो अस्तित्व में नहीं थीं या अधूरी थीं.
ग्रामीणों को जब इस तरह की योजनाओं के बारे में पता चला तो उन्होंने ऑडिट करने के लिए आए अधिकारियों से अपनी शिकायत की. इसके बाद की गई जांच में 32-35 कंपनियों को केवल कागज पर काम दिखाकर फर्जी तरीके से पैसा लेने का आरोपी बनाया गया.
24 अप्रैल को DRDA निदेशक बीएम पटेल ने दाहोद पुलिस में एक प्राथमिकी दर्ज की, जिसमें सरकारी कर्मचारियों और फर्म मालिकों सहित अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ धोखाधड़ी, जालसाजी और विश्वासघात के आरोप लगाए.
जांच में अधिकारियों और नेताओं के बीच मिलीभगत का पता चला, जिसमें अधिकारियों ने टेंडरिंग प्रोटोकॉल को दरकिनार कर फर्जी बिलों को मंजूरी दी. इससे राज्य में प्रशासनिक चूक की गहरी जड़ें उजागर हुईं.
दाहोद घोटाले ने राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया है, जिससे विपक्षी दलों को बीजेपी के स्वच्छ शासन के दावे पर सवाल खड़ा करने का मौका मिल गया है. कांग्रेस विधायक अमित चावड़ा ने 5 मार्च को गुजरात विधानसभा के बजट सत्र के दौरान दाहोद में मनरेगा अनियमितताओं के बारे में चिंता जताई थी, जिसमें 2023-24 में 27 शिकायतों का हवाला दिया गया था.
राज्य सरकार ने 18.41 लाख रुपए से जुड़े सिर्फ एक मामले को स्वीकार किया और जिम्मेदार अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई का दावा किया था. हालांकि, डीआरडीए की एफआईआर और उसके बाद हुई गिरफ्तारियों के बाद धोखाधड़ी का पैमाना नकारा नहीं जा सकता.
कांग्रेस ने इसी साल जनवरी में मनरेगा में अनियमितताओं की जांच के लिए एक समिति का गठन किया था. अब इश समिति ने भाजपा पर खाबड़ और उनके परिवार को बचाने का आरोप लगाया है.
कांग्रेस विधायक चावड़ा का अनुमान है कि यह घोटाला 100 करोड़ रुपए से भी ज्यादा की हो सकती है. उन्होंने नल से जल जैसी योजनाओं के तहत भी दाहोद तालुकों में इसी तरह की धोखाधड़ी का आरोप लगाया है.
चावड़ा ने कहा, "यह भ्रष्टाचार की घटना प्रदेश के सबसे गरीब लोगों की एक व्यवस्थित लूट है." उन्होंने खबाड़ को मंत्रिमंडल से हटाने की मांग करते हुए एक विशेष जांच दल (एसआईटी) से जांच की मांग की है.
विपक्ष का ध्यान दाहोद के आदिवासी समुदायों पर है. इस इलाके में इनकी आबादी अच्छी खासी है. यही वजह है कि इस घोटाले को जोरशोर से उठाकर कांग्रेस आगामी चुनाव में इसका लाभ उठाना चाह रही है.
इस मामले में भाजपा की प्रतिक्रिया संयमित रही है. इससे पता चलता है कि पार्टी को मामले की गंभीरता का अंदाजा है. वहीं, देवगढ़ बारिया से चार बार विधायक रहे और ओबीसी कोली समुदाय के प्रमुख नेता खाबड़ अब तक इस पूरे मामले पर चुप हैं.
पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का सुझाव है कि खाबड़ को संभावित कैबिनेट फेरबदल में हटाया जा सकता है, जो संभवतः नए राज्य भाजपा अध्यक्ष की नियुक्ति के बाद हो सकती है. इस कदम का उद्देश्य उस राज्य में राजनीतिक नुकसान को कम करना होगा, जहां भाजपा ने प्रशासनिक क्षमता का प्रदर्शन करके प्रभुत्व बनाए रखा है.
एक ओर पश्चिम बंगाल जैसे विपक्षी शासित राज्यों में कथित मनरेगा अनियमितताओं के खिलाफ केंद्र सरकार ने त्वरित कार्रवाई की है. वहीं, दूसरी तरफ गुजरात के इस मामले को लेकर किसी भी तरह के उच्च स्तरीय जांच का अभाव नजर आ रहा है.
राजनीतिक रूप से यह घोटाला आदिवासी मतदाताओं के बीच भाजपा की विश्वसनीयता को कम कर सकता है. जबकि इस आबादी ने पिछले एक दशक में उसे काफी मजबूती दी है.
इस मुद्दे पर कांग्रेस की आक्रामक प्रतिक्रिया ने आदिवासी समुदायों के साथ उसके ऐतिहासिक संबंधों को मजबूत करने का काम किया है. इससे कांग्रेस जनता के असंतोष का लाभ उठाने की स्थिति में आ गई है.
इस बीच, दाहोद घोटाले ने पूरे भारत में चलाई जाने वाली मनरेगा योजना में धोखाधड़ी की पोल खोल दी है. पश्चिम बंगाल में 2021-23 में फर्जी जॉब कार्ड और गलत तरीके से रिपोर्ट की गई परियोजनाओं के जरिए 2,000 करोड़ रुपए गबन करने की बात सामने आई थी. केंद्र ने अनियमितताओं और भ्रष्टाचार की वजह से 2022 में मनरेगा फंड को रोकने की बात कही थी.
इसी तरह झारखंड के पलामू और लातेहार जिलों में 2016-2018 में 500 करोड़ रुपए का घोटाला सामने आया था. इस घोटाले में फर्जी लाभार्थियों को भुगतान करना शामिल था.
इसी तरह, ओडिशा के कोरापुट और रायगढ़ जिलों में 2012-2014 में 100 करोड़ रुपये का घोटाला हुआ, जिसमें फर्जी कर्मचारी को भुगतान किए गए थे. परियोजना की लागत भी बढ़ाई गई थी.
2013 में नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश में 8,000 करोड़ रुपये की अनियमितताएं सामने आई थीं. इस घोटाले में फर्जी जॉब कार्ड, गैर-मौजूद श्रमिकों को भुगतान और गैर-मनरेगा परियोजनाओं में धन का डायवर्जन भी शामिल था.
इनमें से ज्यादातर मामलों में स्थानीय सरकारी अधिकारियों की लंबी जांच के बाद गिरफ्तारी हुई है, लेकिन हाई-प्रोफाइल राजनीतिक लोगों की कोई भूमिका सामने नहीं आई है. यही वजह है कि इस तरह की अनियमितताओं पर रोक नहीं लग पाई और इस तरह से ये मामले फिर से सामने आ रहे हैं.