गुजरात के उद्योग बने गिर के शेरों के लिए खतरा!

वन्यजीव फोटोग्राफर-कार्यकर्ता ने मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल को पत्र लिखकर उद्योग जगत के कारण गिर में शेरों पर मंडरा रहे खतरों को उजागर किया है

गिर के शेर (फाइल फोटो)
गिर के शेर (फाइल फोटो)

गुजरात के गिर क्षेत्र में एशियाई शेरों के आवास स्थल पर खनन के कारण खतरा मंडराने लगा है. इसके कारण औद्योगिक और मानवीय विकास के बीच संतुलन बनाए रखने की मुश्किल एक बार फिर सामने आई है.

इस हवाले से वन्यजीव फोटोग्राफर और कार्यकर्ता भूषण पंड्या ने मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल को चिट्ठी लिखी है. उन्होंने अमरेली जिले के बाबरकोट रिजर्व फॉरेस्ट में एक सीमेंट कंपनी को चूना पत्थर की खदान खोलने की अनुमति देने पर चिंता जताई है.

भूपेंद्र पटेल राज्य वन्यजीव बोर्ड के अध्यक्ष हैं और भूषण पंड्या इसके पूर्व सदस्य रह चुके हैं. 75.94 हेक्टेयर में फैला यह क्षेत्र पूर्वी गिर वन विभाग के क्षेत्र में आता है. 2025 की जनगणना के मुताबिक, इस क्षेत्र में 54 शेर रहते थे. पंड्या ने सरकार से इस प्रस्ताव को तुरंत खारिज करने की मांग की है.

पंड्या ने लिखा, “पिछले तीन से चार महीनों में वन विभाग ने प्रस्तावित खनन क्षेत्र में ही लगभग 40 से 50 शेरों को देखा है, जिनमें शावक, किशोर शेर, शेरनियां और वयस्क नर शेर शामिल हैं. इस क्षेत्र में लगभग 5,000 स्वस्थ और विशाल हरे-भरे पेड़ हैं.”

उन्होंने आगे कहा, “खनन के लिए संरक्षित आरक्षित वन क्षेत्र में बदलाव करना होगा जो वन संरक्षण अधिनियम, 1980 का उल्लंघन है. इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि गिर राष्ट्रीय उद्यान और वन्यजीव अभयारण्य प्रबंधन योजना जो वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत तैयार किया गया एक कानूनी दस्तावेज है. इस तटीय वन को शेरों के आवागमन के लिए एक महत्वपूर्ण गलियारे के रूप में दिखाती है. इस संरक्षित क्षेत्र में बदलाव को मंजूरी दिए जाने से एक गलत और दुखद मिसाल कायम करेगा.”

पंड्या दलील देते हैं कि इसके कारण ईकोलॉजी में तेजी से बदलाव होंगे. बाबरकोट से विस्थापित शेर पिपावाव की ओर जाने के लिए मजबूर हो जाएंगे जिससे उन्हें व्यस्त रेलवे लाइन बार-बार पार करनी पड़ेगी. ट्रेनों की चपेट में आने से शेरों की मौत का मामला पहले से ही गुजरात हाई कोर्ट में विचाराधीन है. खनन से खारेपन की समस्या भी बढ़ेगी, जिससे आसपास की कृषि भूमि स्थाई रूप से खराब हो जाएगी.

अमरेली के शेर शांतिपूर्वक अपना इलाका साझा करते हैं. नीलगाय और जंगली सूअर का शिकार करते हैं और धारी, राजुला, पिपावाव और जाफराबाद में बिना किसी डर के घूमते हैं. इस क्षेत्र से शेरों के कारण या इनके साथ होने वाले किसी गंभीर घटना की शिकायत भी कम या ना के बराबर ही मिलती है. उन्होंने कहा कि अगर यह प्राकृतिक आवास हटा दिया जाए तो शेरों और इंसानों के संघर्ष का समीकरण पूरी तरह बदल जाएगा.

पंड्या ने नवंबर 2025 के सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का हवाला दिया जिसमें वन्यजीव गलियारों को बाधित करने वाली मानवीय गतिविधियों पर स्पष्ट रूप से प्रतिबंध लगाने का निर्देश दिया गया है. उन्होंने गुजरात हाई कोर्ट में चल रही एक स्वतः संज्ञान कार्यवाही (जनहित याचिका संख्या 284/2014 के तहत) का भी जिक्र किया जो शेरों की अप्राकृतिक मौतों पर केंद्रित है.

पत्र में एक ऐसे किस्सा का जिक्र है जो दिल दहला देने वाला है. पिछले साल, बाबरकोट के पास एक रिहायशी इलाके में एक शेरनी एक घर में घुस गई. पता चला कि वह घर एक खनन मजदूर का था जो पास ही की एक खदान में काम करता था जहां पुराने परमिट के तहत काम चल रहा था. पंड्या ने लिखा, "शेर बोल नहीं सकते लेकिन इस घटना से ऐसा लगता है मानो शेरनी खनिक के घर अपना आवास छिन जाने की शिकायत लेकर आई हो."

बाबरकोट खनन प्रस्ताव सौराष्ट्र की विकास महत्वाकांक्षाओं और यहां के शेरों के बीच दशकों से चले आ रहे संघर्ष का नया अध्याय है. जूनागढ़ जिले में गिर अभ्यारण्य से 15 किलोमीटर से भी कम दूरी पर एक सीमेंट कारखाना स्थित है; पांच राज्य राजमार्ग जंगल से होकर गुजरते हैं और इस क्षेत्र में रेत खनन लगातार बढ़ रहा है.

2022 में, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने बाबरकोट और जाफराबाद खदानों के लिए सीमेंट कंपनी की पर्यावरणीय मंजूरी रद्द कर दी थी. न्यायाधिकरण ने फैसला सुनाया था कि 50 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में फैले इस समूह के विस्तार के लिए केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की मंजूरी आवश्यक थी, जो कभी नहीं मिली. वर्तमान प्रस्ताव से संकेत मिलता है कि कंपनी उसी विवादित क्षेत्र में फिर से पैर जमाने की कोशिश कर रही है.

उम्र, बीमारी, शावकों की मृत्यु, खुले कुओं में गिरने, बिजली के झटके और दुर्घटनाओं के कारण इस क्षेत्र में कई शेरों की मृत्यु हुई. इन सबके बावजूद गुजरात में एशियाई शेरों की आबादी 2020 से 2025 के बीच 674 से बढ़कर 891 हो गई. गुजरात सरकार ने वन्यजीव संरक्षण के लिए एक कमान और नियंत्रण इकाई स्थापित करने के लिए 2025-26 के बजट में 40 करोड़ रुपए आवंटित किए हैं. इनमें रेलवे ट्रैक पर शेरों की मृत्यु को रोकना प्राथमिक उद्देश्य बताया गया है.

शेरों की बढ़ती आबादी ने संकट को और भी गंभीर बना दिया है. 891 शेरों में से 497 से अधिक अब गिर के संरक्षित क्षेत्रों से बाहर रहते हैं, और पिछले पांच वर्षों में शेरों के साथ मुठभेड़ में 20 से अधिक लोग मारे गए हैं. साथ ही पालतू जानवरों पर हमलों की संख्या लगभग दोगुनी हो गई है.

भारतीय वन्यजीव संस्थान के 2024 के एक अध्ययन में पाया गया कि 2012 और 2017 के बीच पालतू पशुओं पर शेरों के हमले की रिपोर्ट करने वाले गांवों की संख्या में औसतन 105 प्रति वर्ष की वृद्धि हुई. एक वन्यजीव कार्यकर्ता कहते हैं, "गिर में लगातार हो रहा खनन और इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण से शेरों को मानवीय बस्तियों की ओर जाने के लिए मजबूर कर रहा है जो उनके लिए अनुकूल नहीं हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि शेरों को राजमार्गों, रेलवे लाइनों, खुले कुओं और अवैध रूप से लगाए गए बिजली के बाड़ों जैसी बाधाओं को पार करना पड़ता है."

पंड्या का पत्र शेरों को लेकर एक खतरे की घंटी है. इस कॉरिडोर के एक हेक्टेयर जमीन को भी अगर किसी दूसरे मकसद से इस्तेमाल किया जाता है, तो यह सिर्फ एक कागजी अनुमति भर नहीं है. इस तरह के फैसलों से गुजरात के शेरों और लोगों के बीच पहले से ही बहुत पतली हो चुकी जगह और भी संकरी हो जाती है. ऐसी स्थिति में इंसान और शेरों को आपस में साथ रहना सीखना पड़ रहा है. शायद खदान पर काम करने वाले मजदूर के दरवाजे पर आई शेरनी एक चेतावनी थी.

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