घोसी उपचुनाव : एनडीए बनाम इंडिया के पहले चुनाव में बसपा इतनी अहम क्यों है?
उत्तर प्रदेश की घोसी विधानसभा सीट पर होने जा रहे उपचुनाव को एनडीए और इंडिया के बीच पहला मुकाबला कहा जा सकता है जिसे बसपा की गैरमौजूदगी ने बेहद दिलचस्प बना दिया है

उत्तर प्रदेश में मऊ जिला मुख्यालय से 20 किलोमीटर उत्तर में घोसी विधानसभा क्षेत्र इस समय हाईवोल्टेज राजनीतिक जंग में तब्दील हो गया है. बीते 20 महीनों के दौरान भाजपा छोड़ सपा और फिर सपा छोड़ भाजपा का दामन थामने वाले पूर्व विधायक दारा सिंह चौहान के इस्तीफे ने घोसी विधानसभा सीट पर एक उपचुनाव थोप दिया है. जैसे-जैसे उपचुनाव में मतदान की तिथि 5 सितंबर नजदीक आ रही है घोसी विधानसभा सीट पर मुकाबला भाजपा के नेतृत्व वाले नेशनल डेमोक्रेटिक एलायंस (एनडीए) और विपक्ष के ‘इंडिया’ गठबंधन की जोर आजमाइश के बीच सिमट गया है.
भाजपा प्रत्याशी दारा सिंह चौहान को एनडीए के अन्य सहयोगी दलों अपना दल (एस), सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी, निषाद पार्टी का समर्थन हासिल है तो दूसरी ओर ‘इंडिया’ गठबंधन में शामिल दलों कांग्रेस, राष्ट्रीय लोकदल (रालोद), अपना दल (कमेरावादी) समेत सीपीआई (एम) और सीपीआई (एमएल) ने सपा उम्मीदवार सुधाकर सिंह को अपना समर्थन दिया है.
हालांकि घोसी विधानसभा उपचुनाव से बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की दूरी ने दलित मतदाताओं को इस चुनावी जंग में महत्वपूर्ण बना दिया है. राजनीतिक पार्टियों के अनुमान के मुताबिक घोसी विधानसभा सीट पर 90 हजार दलित मतदाता हैं जिनमें जाटव, खटीक, पासी मुख्य हैं. मुस्लिम मतदाता करीब 95 हजार हैं. पिछड़े वर्ग में 50 हजार राजभर, 45 हजार लोनिया चौहान, 40 हजार यादव, 20 हजार निषाद, 20 हजार भूमिहार, 8 हजार ब्राह्मण और 20 हजार वैश्य मतदाता हैं.
कांग्रेस और बसपा के चुनाव मैदान में नहीं होने से, मुस्लिम वोट सपा को मिलने की संभावना है. हालांकि सपा यह भी उम्मीद कर रही है कि राजपूत उम्मीदवार खड़ा करने से उसे भाजपा के सवर्ण वोट बैंक में सेंध लगाने में मदद मिलेगी. उधर, भाजपा अगड़ी और गैर यादव मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा अपनी ओर खींचकर बाजी मारने की फिराक में है. अगड़ी-पिछड़ी जातियों और मुस्लिम मतों के मतदाताओं के भाजपा और सपा के बीच बंटने के बाद बचे दलित मतदाता घोसी विधानसभा उपचुनाव में निर्णायक हो गए हैं.
भाजपा ने दलित बहुल गांवों में जमीनी स्तर पर अभियान चलाने के लिए एससी/एसटी मोर्चा के अपने कार्यकर्ताओं को तैनात किया है. भाजपा ने दलितों की उपजाति जाटव, खटीक, पासी के हिसाब से नेताओं की टोलियां बनाई हैं. ये टोलियां अपनी बिरादरी के दलित मतादाताओं के बीच जाकर पिछली सपा सरकार में दलितों के विरोध में किए गए कामों को गिना रही हैं. भाजपा एससी/एसटी मोर्चा के एक दलित नेता दीपक रावत बताते हैं, “पूर्व की सपा सरकार ने आरक्षण और आउटसोर्सिंग नौकरियों में कोटा के प्रावधान को खत्म करके दलित विरोधी कार्य किया था. ये सारी बातें दलित मतदाताओं के बीच उजागर करके सपा के दलित विरोधी चेहरे की पोल खोली जा रही है.”
वहीं दूसरी ओर भगवा खेमे के दलित नेता केंद्र की नरेंद्र मोदी और राज्य की योगी आदित्यनाथ सरकार के शासन में दलितों के हितों में किए गए कार्यों को भी जमकर गिना रहे हैं. यूपी भाजपा एससी/एसटी मोर्चा के अध्यक्ष रामचंद्र कनौजिया बताते हैं, “दलित कभी भी उस सपा को वोट नहीं देंगे जिसने अपने पिछले शासन के दौरान उनका दमन किया था.'' घोसी में दलित बहुल ग्रामीण इलाकों में अपनी पैठ मजबूत करने के लिए भाजपा बसपा के कुछ स्थानीय पूर्व पदाधिकारियों के भी संपर्क में है जो मतदान के पहले भगवा खेमे की राह पकड़ सकते हैं.
वहीं दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी भाजपा के आक्रामक प्रचार तंत्र से निबटने के लिए भावनात्मक कार्ड खेल रही है. पार्टी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक (पीडीए) मतदाताओं के बीच उम्मीदवार सुधाकर सिंह की साफ सुथरी और हर मौके पर जनता के साथ खड़े रहने वाली छवि के जरिए भाजपा उम्मीदवार दारा सिंह चौहान को एक कमजोर नेता साबित कर रही है. सपा ने पार्टी के दलित नेता इंद्रजीत सरोज, अवधेश प्रसाद, के. के. गौतम के साथ बाबा साहेब वाहिनी के कार्यकर्ताओं को भी दलित वोटों को जुटाने की जिम्मेदारी सौंपी है. मार्च में सपा के फ्रंटल संगठन का दर्जा मिलने के बाद बाबा साहेब वाहिनी की क्षमता का इम्तिहान घोसी विधानसभा उपचुनाव में दलित मतदाताओ के बीच होगा.
बसपा के प्रदेश अध्यक्ष विश्वनाथ पाल कहते हैं, "हमारे कार्यकर्ता और समर्थक घोसी उपचुनाव में मतदान से दूर रहेंगे. या अगर वे वोट देंगे तो नोटा दबाएंगे." अगर घोसी विधानसभा उपचुनाव में दलित मतदाता वाकई में बसपा के फरमान का पालन करते हुए चुनाव से दूर रहे तो यह साबित करेगा कि हाथी की अपने समर्थक मतों पर पकड़ बरकरार है. इसके बाद उपचुनाव के नतीजे जो भी रहें, यह ‘इंडिया’ गठबंधन में शामिल होने के लिए बसपा की राजनीतिक मोलभाव की शक्ति को मजबूत करेगा.
आंकड़ों से पता चलता है कि घोसी में बसपा का प्रदर्शन वर्ष 2007 के बाद से लगातार उतार-चढ़ाव वाला रहा है. तब यह सीट पार्टी के फागू चौहान ने जीती थी. 2012 में चौहान को सपा के सुधाकर सिंह ने 15,000 से अधिक वोटों के अंतर से हराया था. बाद में फागू चौहान भाजपा में चले गए और 2017 में जेल में बंद गैंगस्टर से नेता बने मुख्तार अंसारी के बेटे बसपा के अब्बास अंसारी को हराकर सीट जीती. 2019 में चौहान को बिहार के राज्यपाल के रूप में नियुक्त किया गया था और हाल ही में उन्हें मेघालय स्थानांतरित कर दिया गया.
वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में बसपा का प्रदर्शन और गिर गया जब पार्टी उम्मीदवार वसीम इकबाल 21.12 फीसद वोट शेयर के साथ तीसरे स्थान पर रहे. मऊ निवासी और पेशे से एडवोकेट अश्विनी सिंह कहते हैं, “बसपा का घोसी विधानसभा उपचुनाव से दूर रहना सपा को फायदा पहुंचा सकता है. घोसी में पिछले तीन विधानसभा चुनाव बसपा ने मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट दिया और तीनों बार 50 हजार से अधिक वोट हासिल किए. बसपा के मैदान में न रहने से मुस्लिम उम्मीदवार तो सपा को एकतरफा वोट करेगा.” अश्विनी के मुताबिक वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा को अच्छी संख्या में दलित मतदाताओं ने वोट किया था. इसकी एक बड़ी वजह बसपा के पूर्व नेताओं की सपा में मौजूदगी है.
अश्विनी आगे यह भी बताते हैं, “बसपा के दलित मतदाता के लिए अब सपा उतनी अछूत नहीं रह गई है जितनी आज से 10 वर्ष पहले थी. ऐसे में अगर एक तरफ भाजपा अपनी योजनाओं और सपा के नकारात्मक छवि को दलितों के बीच भुनाने की कोशिश कर रही है तो सपा को भी दलितों के बीच सत्ताविरोधी रुख और दारा सिंह चौहान को लेकर बने नकारात्मक माहौल का फायदा मिल सकता है.”
वैसे इस उपचुनाव में यह भी देखने वाली बात होगी कि बसपा के पूर्व नेता रहे दारा सिंह चौहान के लिए स्थानीय स्तर पर नाराजगी को दलित समुदाय कितना अनदेखा करता है. घोसी विधानसभा उपचुनाव का नतीजा इस पर भी बहुत कुछ निर्भर करेगा.