गाजीपुर में एक लड़की की मौत से शुरू हुई 'अगड़ा बनाम पिछड़ा' की राजनीतिक लड़ाई

गाजीपुर में एक किशोरी की मौत के बाद जांच, सियासत और जातीय ध्रुवीकरण आमने-सामने हैं, जहां अगड़ा-पिछड़ा समीकरण 2027 चुनाव से पहले नए सिरे से आकार ले रहा है

सांकेतिक फोटो

पूर्वांचल के गाजीपुर जिले में करंडा थाना क्षेत्र के कटरिया गांव में एक किशोरी की मौत से शुरू हुआ घटनाक्रम अब उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बड़े सामाजिक और जातीय विमर्श का केंद्र बन चुका है. 

यह मामला कानून-व्यवस्था, जांच और न्याय से आगे बढ़कर ‘अगड़ा बनाम पिछड़ा’ की उस बहस को फिर से जीवित कर रहा है, जिसने राज्य की राजनीति को दशकों तक प्रभावित किया है. 

कैसे हुई मामले की शुरुआत

15 अप्रैल को विश्वकर्मा परिवार की एक किशोरी का शव गंगा नदी में मिलने के बाद जो घटनाक्रम शुरू हुआ, वह धीरे-धीरे कई परतों में फैलता गया. पिता की तहरीर के आधार पर पुलिस ने हत्या का मुकदमा दर्ज करते हुए एक युवक हरिओम पांडेय को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. जांच के दौरान सामने आई कॉल डिटेल्स ने इस मामले को नया मोड़ दिया, जिसमें किशोरी और आरोपी के बीच पहले से जान-पहचान होने की बात सामने आई. वहीं पोस्टमार्टम रिपोर्ट में न तो शरीर पर किसी चोट के निशान मिले और न ही दुष्कर्म की पुष्टि हुई. 

हालां‍कि समाजवादी पार्टी (सपा) ने इस पूरी प्रक्रिया को मामला दबाने की साजिश बताया. पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष श्यामलाल पाल की तरफ से जारी एक पत्र में रेप के बाद हत्या जैसे गंभीर आरोप लगाए गए. यह पत्र जैसे ही सार्वजनिक हुआ, गांव में आक्रोश फैल गया और माहौल अचानक तनावपूर्ण हो गया. सपा ने शुरुआत से ही इस घटना को हत्या और दरिंदगी का मामला बताते हुए आक्रामक रुख अपनाया. पार्टी के पदाधिकारियों ने कलेक्ट्रेट पहुंचकर प्रदर्शन किया और जिलाधिकारी व पुलिस अधीक्षक को ज्ञापन सौंपते हुए कड़ी कार्रवाई की मांग की. 

तनाव उस समय और बढ़ गया, जब 22 अप्रैल को सपा का प्रतिनिधिमंडल पीड़ित परिवार से मिलने गांव पहुंचा. प्रशासन ने केवल 15 लोगों को ही अनुमति दी थी, लेकिन मौके पर 200 से अधिक लोग पहुंच गए. इसी बात को लेकर सपा कार्यकर्ताओं और प्रधान प्रतिनिधि के समर्थकों के बीच टकराव हो गया, जो जल्द ही हिंसक झड़प में बदल गया. पथराव की इस घटना में पूर्व मंत्री राम आसरे वर्मा और करंडा थानाध्यक्ष सहित दस से अधिक लोग घायल हो गए. घटना के बाद पुलिस ने सख्ती दिखाते हुए सपा के दो विधायकों जयकिशन साहू, वीरेंद्र यादव, जिलाध्यक्ष गोपाल यादव समेत 46 नामजद और करीब 200 अज्ञात लोगों के खिलाफ गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज किया. 

अब तक इस मामले में 16 लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है, जबकि बाकी आरोपियों की तलाश जारी है. प्रशासन ने स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पूरे जिले में निषेधाज्ञा लागू कर दी. किसी भी तरह के राजनीतिक जमावड़े, प्रदर्शन या बाहरी हस्तक्षेप पर रोक लगा दी गई. अधिकारियों का कहना है कि कुछ “बाहरी तत्व” माहौल को भड़काने की कोशिश कर रहे थे और सोशल मीडिया के जरिए अफवाहें फैल रही थीं, जिससे तनाव और बढ़ सकता था.

समाजवादी पार्टी ने इसे सिर्फ एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और पिछड़े वर्गों के उत्पीड़न के रूप में पेश किया है. पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इस मामले को जोर-शोर से उठाया, पीड़ित परिवार को आर्थिक सहायता देने की घोषणा की और खुद 29 अप्रैल को गाजीपुर जाने का कार्यक्रम बनाया. राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि सपा की यह सक्रियता अचानक नहीं थी, बल्कि इसके पीछे एक स्पष्ट राजनीतिक गणित दिखाई देता है-पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) समीकरण को फिर से मजबूत करना.

यूं उलझा जातिवादी राजनीतिक गणित 

हालांकि, इस रणनीति का दूसरा पहलू भी तेजी से सामने आया. गाजीपुर और आसपास के क्षेत्रों की सामाजिक संरचना में ब्राह्मण और ठाकुर समुदाय का प्रभाव भी कम नहीं है. ऐसे में जब आरोपी के तौर पर एक ब्राह्मण युवक का नाम सामने आया और उसे गिरफ्तार किया गया, तो सोशल मीडिया पर तरह-तरह की सूचनाएं फैलने लगीं. इनमें कई अपुष्ट और भ्रामक दावे भी शामिल थे, जिससे ब्राह्मण समाज में असंतोष पनपने लगा. यही वह बिंदु था, जहां यह मामला ‘पिछड़ा बनाम अगड़ा’ के व्यापक राजनीतिक विमर्श में बदलने लगा.

गाजीपुर निवासी राजनीतिक विश्लेषक रमेश सिंह मानते हैं कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में सामाजिक संतुलन सबसे महत्वपूर्ण तत्व है. अगर कोई दल किसी एक वर्ग के पक्ष में अत्यधिक झुकाव दिखाता है, तो दूसरा वर्ग स्वाभाविक रूप से उससे दूर हो जाता है. गाजीपुर में भी कुछ ऐसा ही होता दिखाई दे रहा है. सपा जहां पिछड़े वर्गों के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है, वहीं इससे ब्राह्मण और अन्य अगड़े वर्गों में दूरी बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है. 

इस स्थिति को भांपते हुए भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगी दलों ने भी अपनी रणनीति को सक्रिय कर दिया. सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के अध्यक्ष और योगी सरकार में कैबिेनेट मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने इस मामले को आत्महत्या करार देते हुए सपा के आरोपों को खारिज किया और इसे अनावश्यक रूप से जातीय रंग देने का प्रयास बताया. साथ ही, सरकार की ओर से पीड़ित परिवार को पांच लाख रुपए की आर्थिक सहायता, कृषि भूमि का पट्टा और आवास जैसी सुविधाएं तत्काल उपलब्ध कराई गईं. यह सिर्फ राहत नहीं थी, बल्कि एक राजनीतिक संदेश भी था कि सरकार संवेदनशील है और बिना तथ्यों के किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचना चाहती.

BJP ने भी इस पूरे घटनाक्रम को अलग नजरिए से पेश किया. पार्टी के वरिष्ठ नेता कलराज मिश्र ने सपा और कांग्रेस पर माहौल खराब करने का आरोप लगाया. उनका कहना था कि इस तरह के संवेदनशील मामलों को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल करना समाज के लिए खतरनाक है. BJP की कोशिश साफ दिखाई देती है कि वह इस मुद्दे को ‘अराजकता बनाम स्थिरता’ के फ्रेम में रखना चाहती है, ताकि व्यापक वर्गों का समर्थन बनाए रखा जा सके. 

दूसरी ओर, कांग्रेस ने इस मुद्दे पर अपेक्षाकृत अलग रास्ता अपनाया है. लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की राजनीति अक्सर ऐसे मामलों में पीड़ितों के साथ खड़े होने और सरकार से जवाब मांगने की रही है. गाजीपुर में भी कांग्रेस प्रशासनिक पारदर्शिता, निष्पक्ष जांच और पीड़ित परिवार के अधिकारों की बात कर रही है. हालांकि, संगठनात्मक स्तर पर कमजोर होने के कारण कांग्रेस का प्रभाव सीमित दिखता है, लेकिन वह इस मुद्दे को नैतिक दबाव बनाने के लिए जरूर इस्तेमाल कर रही है.

स्थानीय राजनीतिक समीकरण

गाजीपुर में समाजवादी पार्टी ने 2022 के विधानसभा चुनाव में मजबूत प्रदर्शन करते हुए पांच सीटों पर कब्जा किया, जबकि BJP खाता भी नहीं खोल सकी. यह परिणाम काफी हद तक उस समय के गठबंधन समीकरणों का असर था, जब सुभासपा सपा के साथ थी और राजभर वोट बैंक का झुकाव सपा के पक्ष में गया था. लेकिन अब हालात बदल चुके हैं. 

ओम प्रकाश राजभर की अगुवाई वाली सुभासपा के BJP के साथ आने की संभावनाओं ने 2027 के चुनावी मुकाबले को और पेचीदा बना दिया है. वर्ष 2017 के चुनाव इसका उदाहरण रहे हैं, जब BJP-सुभासपा गठबंधन को क्षेत्र में बढ़त मिली थी. वहीं 2022 में सुभासपा के सपा के साथ आने से पार्टी की सीटें दो से बढ़कर पांच हो गई थीं. यानी राजभर वोट बैंक का झुकाव सीधे तौर पर चुनावी नतीजों को प्रभावित करता रहा है. 

अब करंडा थाना क्षेत्र की इस घटना को सपा एक राजनीतिक मौके के रूप में भी देख रही है. पार्टी इस मुद्दे के जरिए पिछड़ी जातियों, खासकर अति पिछड़े वर्गों को अपने पक्ष में एकजुट करने की कोशिश में है, ताकि सुभासपा के अलग होने से हुए नुकसान की भरपाई की जा सके. सपा का फोकस साफ तौर पर पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) समीकरण को फिर से मजबूत करने पर है. रमेश सिंह के अनुसार, “सपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह पिछड़े वर्गों को साधते हुए अगड़े वर्गों को पूरी तरह नाराज न कर दे. अगर ध्रुवीकरण एकतरफा हो गया, तो इसका फायदा BJP-सुभासपा गठबंधन को मिल सकता है.” विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि BJP की रणनीति इस बार ‘संतुलन’ पर आधारित होगी. पार्टी एक तरफ राजभर जैसे पिछड़े नेतृत्व के साथ गठजोड़ कर अति पिछड़े वर्गों में पैठ बनाना चाहती है, वहीं दूसरी ओर पारंपरिक अगड़े वोट बैंक को भी मजबूत बनाए रखना चाहती है. 

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